दिल्ली में झुग्गी-झोपड़ी बस्तियों को तोड़ने व हटाने की प्रक्रिया

दिल्ली में झुग्गी-झोपड़ी बस्तियों को तोड़ने व हटाने की प्रक्रिया

सोनिया गांधी कैंप का मामला

सुभद्रा बांदा और शहाना शेख, अप्रैल 2014
Suggested Citation: Subhadra Banda and Shahana Sheikh, ‘The Case of Sonia Gandhi Camp: The Process of Eviction and Demolition in Delhi’s Jhuggi Jhopri Clusters’. A report of the Cities of Delhi project, Centre for Policy Research, New Delhi (April 2014).


सारांश

दिल्ली में बस्तियों को खाली कराने और उनके पुनर्वास की प्रक्रिया का गहरी प्रशासनिक चुनौतियों से ग्रस्त रही हैं। व्यापक रूप से हमने दो समस्याओं को चिन्हित किया है। पहली, एक नोडल एजेंसी होने के बावजूद, बस्तियों के पुनर्वास का काम विभिन्न सरकारी एजेंसियों के बीच तालमेल की कमी से बाधित होता है। दूसरी, झुग्गी-झोपड़ी बस्ती के निवासियों (जिनकी झुग्गियों को खाली कराया जाता है) के अधिकारों को लेकर स्पष्टता की कमी है। खास तौर पर इस बात को लेकर स्पष्टता की कमी है कि कौन पुर्नवास के योग्य है, और बस्ती को खाली कराने की प्रक्रिया क्या है। इसके अलावा, जमीनी स्तर पर झुग्गियों को खाली करने के दौरान जिस प्रक्रिया का पालन किया जाता है, वह नीतिगत और कानूनी दस्तावेजों से कई मायनों में अलग होती है।
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झुग्गी-झोपड़ी बस्ती निवासियों के लिये उनके घरों को ढहाये जाने और उन्हें दूसरी जगह बसाये जाने के अनुभव नये नहीं हैं। झुग्गी-झोपड़ी बस्तियां सार्वजनिक भूमि पर बसे हुये अनियोजित रिहायशी इलाके हैं, जिनमें दिल्ली की लगभग 15 फीसदी1 आबादी रहती है। 19602 के दशक से लेकर अब तक ऐसी बस्तियों को जबरन खाली कराने और पुर्नवासित करने के कई दौर आये हैं। सबसे हालिया दौर साल 2010 के राष्ट्रमंडल खेलों से ठीक पहले आया, जिसके दौरान 217 झुग्गी-झोपड़ी बस्तियों को तोड़ा गया। जिसकी वजह से लगभग 50,000 परिवार3 विस्थापित हो गये। सिविल सोसायटी समूह के एक बड़े हिस्से ने बस्तियों को इस तरह जबरन हटाये जाने की खुले तौर पर निंदा की। इन नागरिक समूहों ने बस्ती निवासियों को शहर के एक छोर पर बसी पुर्नवास कालोनियों में स्थानांतरित करने की पूरी रणनीति और ऐसा करने के तरीके, दोनों की निंदा की।

घरों को ढहाये जाने के मामलों का अदालतों ने संज्ञान लिया और कई विरोधाभासी आदेश भी जारी किये। सरकार की नीति भी बदली। स्लम नीति (जैसे राजीव आवास विकास योजना) के तहत राष्ट्रीय विकास का ध्यान रखते हुये दिल्ली सरकार ने घरों को खाली कराये जाने और पुर्नवास की प्रक्रिया को तर्कसंगत बनाने के लिये पुख्ता प्रयास किये।

यह रिपोर्ट साल 2013 में सोनिया गांधी कैंप4 के खाली कराने और तोड़े जाने के पूरे घटनाक्रम को प्रस्तुत करती है और उसकी पड़ताल करती है। हमारा विश्लेषण सोनिया गांधी कैंप के कुछ चुने हुये निवासियों, दिल्ली सरकार के लोक निर्माण विभाग(पीडब्ल्यूडी)—वह एजेंसी जिसने बस्ती में घरों को ढहाया था—के इंजीनियरों, दिल्ली आश्रय शहरी सुधार बोर्ड–-वह संस्था जिसे दिल्ली सरकार की ज़मीन पर बसी झुग्गी-झोपड़ी बस्तियों के पुर्नवास और स्थानांतरण के लिये ज़िम्मेदार नोडल एजेंसी के तौर पर जाना जाता है5—के प्रतिनिधियों और इसके साथ-साथ इलाके के निर्वाचित प्रतिनिधियों के साथ हुये साक्षात्कारों पर आधारित है। सोनिया गांधी कैंप में घरों को ढहाने की परिस्थितियों की पड़ताल वर्तमान कानूनी और नीतिगत ढांचों, ख़ासकर ‘राइट आफ वे’ (रस्ते का अधिकार), के सन्दर्भ में की गयी है। इस ‘राइट आफ वे’ के सिद्धांत के आधार पर ही सरकार ने इस बस्ती के तोड़े जाने को जायज़ ठहराने की कोशिश की।

कुल मिलाकर इस रिपोर्ट का निष्कर्ष यह है कि झुग्गी–झोपड़ी बस्तियों को खाली कराने और उनके पुर्नवास की प्रक्रिया अभी भी गहरी प्रशासनिक चुनौतियों से ग्रस्त है। हमने मुख्य रूप से दो समस्याओं पर रौशनी डालने का प्रयास किया है। पहली, एक नोडल एजेंसी होने के बावजूद, झुग्गी बस्तियों को पुनर्वासित करने की प्रक्रिया, विभिन्न सम्बंधित एजेंसियों के आपस में तालमेल की कमी से ग्रस्त है। दूसरी, जिन झुग्गी-झोपड़ी निवासियों के घरों को जबरन खाली कराया जाता है, उनके अधिकार पूरी तरह अस्पष्ट हैं। खासतौर पर, इस बात को लेकर स्पष्टता की ज्यादा कमी है कि कौन पुर्नवास के योग्य है और झुग्गी–झोपड़ी बस्तियों को खाली कराये जाने की प्रक्रिया क्या है। इसके अलावा इन बस्तियों को खाली कराये जाने के दौरान ज़मीनी स्तर पर होने वाली बहुत सी चीजें नीतिगत और कानूनी दस्तावेजों के अनुरूप नहीं हैं।

सोनिया गांधी कैंप—एक परिचय

सोनिया गांधी कैंप दक्षिण-पश्चिमी दिल्ली में बसे आर. के. पुरम इलाके के सेक्टर-7 में स्थित है। सोनिया गांधी कैंप दिल्ली शहरी आश्रय सुधार बोर्ड (डीयूएसआईबी) द्वारा औपचारिक तौर पर चिन्हित 685 झुग्गी-झोपड़ी बस्तियों में से एक है। कैंप केंद्र सरकार के कर्मचारियों के रहने के लिये सबसे पहले बनायी गयी आवासीय कॉलोनियों के ठीक बीचो-बीच स्थित है। यह कैंप, पूरी तरह नियोजित और सभी बुनियादी सुविधाएं प्राप्त करने वाली इस कालोनी में अनियोजित रूप से बसी हुयी कई बस्तियों में से एक है। जिस ज़मीन पर यह कैंप है, उसके मालिकाना हक को लेकर कुछ अस्पष्टता है। एक तरफ डीयूएसआईबी इस ज़मीन को केन्द्रीय शहरी विकास मंत्रालय के तहत आने वाली एजेंसी, लैंड एंड डेवलपमेंट ऑफिस के तहत अनुसूचित करता है तो वहीं पीडब्ल्यूडी के अधिकारी दावा करते हैं कि ज़मीन पर सीपीडब्ल्यूडी (केंद्रीय लोक अभियंता विभाग), का मालिकाना हक़ है। डीयूएसआईबी का अनुमान है कि ढहाने और जबरन खाली करवाने से पहले कैंप में 150 झुग्गियां थीं।

साल 2010 तक, कैंप को विभिन्न सेवायें मुहैया कराने की जिम्मेदारी, उस समय मौजूद दिल्ली नगर निगम (एमसीडी) के स्लम और जेजे विभाग की थी। साल 2010 के डीयूएसआईबी एक्ट ने नगर निगम के इस डिवीज़न (अनुखंड) को हटाकर इस ज़िम्मेदारी को दिल्ली सरकार के सुपुर्द कर दिया। इस प्रक्रिया के नतीजे में डीयूएसआईबी बना। नगर निगम और डीयूएसआईबी के अलावा पीडब्ल्यूडी भी कैंप में राज्य सरकार की ओर से काम करने वाली मुख्य संस्थाओं में से एक है।
कैंप में पीडब्ल्यूडी की भागीदारी साल 2011 और 2012 में तब शुरू हुयी जब कुछ सड़कों की जिम्मेदारी नगर निगम से पीडब्ल्यूडी (नगर निगम से राज्य सरकार को) को दे दी गयी। दिसंबर 2011 में खराब हालत का हवाला देते हुये दिल्ली सरकार की कैबिनेट के एक फैसले ने एमसीडी के अधिकार क्षेत्र में आने वाली 87 सड़कों को, जो 30 मीटर या तकरीबन 100 फीट चौड़ी थीं और इनकी कुल लम्बाई 221.46 किलोमीटर थी, देख-रेख के लिये पीडब्ल्यूडी को दे दिया।6 इसके बाद साल 2012 की शुरुआत में 60 फीट चौड़ी सभी एमसीडी सड़कों को भी इसमें शामिल कर उपरोक्त कार्यक्रम को विस्तार दे दिया गया।7 इस अतिरिक्त 645 किलोमीटर लम्बी सड़कों को पीडब्ल्यूडी को देने का काम अप्रैल 2012 में पूरा हुआ और इन सड़कों की मरम्मत के लिये पीडब्ल्यूडी को 250 करोड़8 रुपये का अनुदान दिया गया।9

सोनिया गांधी कैंप में घरों को ढहाया जाना

25 फरवरी 2013 को पीडब्ल्यूडी विभाग के इंजीनियरों ने सोनिया गांधी कैंप के निवासियों को बताया कि वे बस्ती का उत्तर-पूर्वी हिस्सा ढहाने जा रहे थे। निवासी बताते हैं कि उन्हें बताया गया कि झुग्गी-झोपड़ी बस्ती का ये हिस्सा पीडब्ल्यूडी की ज़मीन पर था और एक सड़क चौड़ी करने के लिये उन्हें उस ज़मीन की ज़रुरत थी। हालांकि निवासियों को न तो कोई आधिकारिक नोटिस और न ही किसी तरह का कोई आदेश दिखाया गया । जब पीडब्ल्यूडी के इंजीनियरों ने ये कहा कि वे फौरन मकानों को ढहाने का काम शुरू करना चाहते हैं तो निवासियों ने उनसे तैयारी का कुछ वक्त मांगा। इंजीनियर इस पर सहमत हो गये। एक सप्ताह बाद, 6 मार्च को पीडब्ल्यूडी इंजीनियर ढहाने का काम शुरू करने के लिये कैंप पहुंचे। जहां एक ओर कुछ लोगों ने अपने घरों से साजो-सामान हटाने का इंतजाम कर लिया था वहीं दूसरों ने जोर देकर कुछ और वक्त मांगा। निवासियों ने तब एक पत्र पर हस्ताक्षर किये जिसमें वे 30 मार्च तक घरों को खाली करने के लिये राजी हो गये थे। पत्र में कहा गया था कि अगर वे 30 मार्च तक ऐसा नहीं कर सके तो पीडब्ल्यूडी उनके घरों को ढहा देगा।10 हालांकि समुदाय के सदस्य कहते हैं कि पीडब्ल्यूडी ने पत्र को खुद तैयार किया और निवासियों से उस पर हस्ताक्षर करने को कहा जबकि पीडब्ल्यूडी स्टाफ का दावा है कि समुदाय के लोग पत्र तैयार करने में भागीदार थे।

निवासियों ने बताया कि उन्होंने ज़मीन से (जिसे पीडब्ल्यूडी अपना कह रही थी) 30 मार्च तक अपना सामान हटा लिया था, हालांकि न तो उस दिन पीडब्ल्यूडी की ओर से कोई भी झुग्गियों को ढहाने के लिये आया और न ही अप्रैल महीने के कुछ शुरुआती दिनों में कोई आया। इसके बाद निवासी अपनी झुग्गियों में वापस आ गये।

15 अप्रैल को पीडब्ल्यूडी ने सोनिया गांधी कैंप के एक हिस्से को ढहा दिया। लगभग 35 झुग्गियाँ, जो कथित तौर पर तमिल संगम रोड के लिये निर्धारित की गयी पीडब्ल्यूडी की ज़मीन पर थे, को बिना कोई पूर्व सूचना दिये ढहा दिया गया। झुग्गियों को तोड़े जाने के साथ-साथ, कैंप के निवासियों द्वारा इस्तेमाल किये जाने वाले शौचालयों में पानी की आपूर्ति वाले पाइप हटा दिये गये और इस तरह वे शौचालय बेकार हो गये। पुलिस झुग्गियों को ढहाने वाले बुलडोजरों के साथ आयी और निवासियों को एक बार फिर बताया गया कि उनकी झुग्गियों को सड़क चौड़ीकरण प्रोजेक्ट के लिये हटाया जा रहा है। पीडब्ल्यूडी इंजीनियरों ने जोर देकर कहा कि वे उस जगह पर आगे घरों को नहीं ढहायेंगे, साथ-साथ वे बुलडोजरों द्वारा इलाके को पूरी तरह साफ करने से पहले निवासियों को दो-तीन दिन का समय देंगे ताकि वे बचे हुये मलबे में से अपना का सामान निकाल लें।

एक हफ्ते बाद, 22 अप्रैल को, दो पीडब्ल्यूडी इंजीनियर आये और एक नयी, चौड़ी सड़क के लिये ज़मीन का सीमांकन कर गये। बस्ती के निवासियों ने दावा किया कि उन्हें सीमा दिखाने वाला कोई भी दस्तावेज या नक्शा नहीं दिखाया गया। ठीक उसी समय, पीडब्ल्यूडी द्वारा किराये पर रखा हुआ एक प्राइवेट कांट्रेक्टर कुछ मजदूरों और सामान के साथ वहां पहुंचा और उसने सीमा के साथ-साथ एक दीवार बनानी शुरू कर दी। इसके साथ-साथ एक बुलडोजर और एक ट्रक ने ढहायी हुयी झुग्गियों का मलबा हटाना शुरू कर दिया।

कारण और प्रतिक्रियायें

झुग्गियों को ढहाये जाने के बारे में सरकार की सफाई और जवाब तीन हिस्सों से आये- मामले में शामिल दिल्ली सरकार की दो एजेंसियां, पीडब्ल्यूडी व डीयूएसआईबी; और इलाके के विधायक; एक निर्वाचित जन-प्रतिनीधि, की ओर से।11 इन तीनों समूहों ने सोनिया गांधी कैंप में घटी घटनाओं के परस्पर-विरोधी ब्यौरे पेश किये, जिससे झुग्गियों को हटाने की प्रक्रिया के सन्दर्भ में नीतिगत अस्पष्टता की झलक मिलती है। झुग्गियों को ढहाने के कुछ दिन बाद, पीडब्ल्यूडी के एक वरिष्ठ इंजीनियर ने अप्रैल 2013 में दिए गए एक इंटरव्यू में यह दावा किया कि उनके विभाग ने किसी झुग्गी को नहीं ढहाया है, बल्कि विभाग ने सिर्फ “अतिक्रमण को हटाया” है। उन्होंने जोर देकर बताया कि पीडब्ल्यूडी की ज़मीन से अतिक्रमण हटाना और उसे खाली कराना उनका काम था। एक दूसरा पीडब्ल्यूडी इंजीनियर (जिसकी निगरानी में झुग्गियों को ढहाया गया था) इस बात पर कायम रहा कि विस्थापित परिवारों के पुर्नवास में पीडब्ल्यूडी की कोई भूमिका नहीं थी और यह जिम्मेदारी दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) या दिल्ली नगर निगम (एमसीडी) की थी।

वहीं दूसरी तरफ, डीयूएसआईबी के एक शीर्ष अधिकारी ने हमें बताया कि झुग्गियों को अंधाधुंध हटाया जाने पर ‘एनसीटीडी स्पेशल पावर्स एक्ट’12 ने लगाम लगा दी थी। अधिकारी ने बताया कि अगर किसी सरकारी प्रोजेक्ट के लिये कोई बस्ती ढहाये जाने की आवश्यकता है, तो जिस एजेंसी की ज़मीन पर वह बस्ती है, उसे ऐसा कोई भी कदम उठाने की पर्याप्त वजह देनी पड़ेगी। इसके साथ ही एजेंसी को निवासियों के रहने के लिये कोई वैकल्पिक इंतजाम करते हुये उनका पुर्नवास भी करना होगा।

सरकार की ओर से जो भी कारण इस मामले में दिये गये वह ‘राइट आफ वे’ की कुछ समझ पर आधारित रही। पीडब्ल्यूडी के जिस इंजीनियर ने झुग्गियों को ढहाने की प्रक्रिया की देख-रेख की थी, वह इस बात पर कायम रहा कि बस्ती को हटाना विभाग के सड़क चौड़ीकरण प्रक्रिया का एक आवश्यक हिस्सा था और उसने इस बात पर ज़ोर दिया कि ‘राईट ऑफ़ वे’ के आधार पर यह पूरी प्रक्रिया जायज़ थी। बस्ती हटाने से जुड़ी प्रचलित और विरोधाभासी वजहों की बात एक बार फिर तब ज़ाहिर हुई जब इस ही विभाग के एक वरिष्ठ इंजीनियर ने इस बात से इंकार किया कि उस समय कोई सड़क चौड़ीकरण प्रोजेक्ट चल रहा था। उसने फिर दोहराते हुये ये कहा कि पीडब्ल्यूडी ने यह कदम पूरी तरह से मौजूदा सड़कों से अतिक्रमण हटाने की मंशा से उठाया था। उसने खाली करायी गयी पीडब्ल्यूडी की ज़मीन के बहुत से संभावित उपयोग बताये। इसमें सीपीडब्ल्यूडी बाउंड्री तक सड़क का चौड़ीकरण करना, फुटपाथ का निर्माण करना, सड़क को सुधारना और यहां तक कि सार्वजनिक शौचालय बनाने के लिये किसी कंपनी को ज़मीन देने जैसे काम शामिल थे।

पीडब्ल्यूडी का तर्क जो भी रहा हो, डीयूएसआईबी के एक शीर्ष अधिकारी ने ज़ोर देकर बताया कि उन्हें यह यकीन था कि एनसीटीडी स्पेशल पावर्स एक्ट के तहत ऐसा कोई प्रावधान नहीं था जिसकी वजह से ‘राईट ऑफ़ वे’ के नाम पर बस्ती के निवासियों को पुनर्वास से वंचित रखा जा सके। उसने बताया कि पुरानी नीति में ‘राइट आफ वे’ का हवाला देकर हटाई गयी झुग्गियों के पुर्नवास का कोई प्रावधान नहीं था, लेकिन बाद में नीति में संशोधन कर इस अनुच्छेद को हटा दिया गया था।

अधिकारी ने बेहद यकीन से बताया कि अप्रैल 2013 तक, राईट ऑफ़ वे का हवाला देकर, बस्ती के निवासियों को बिना किसी पुनर्वास के उनके घरों को हटाना मान्य नहीं था। दूसरे शब्दों में, भले ही ‘राईट ऑफ़ वे’ का हवाला देते हुए बस्ती का हटाया जाना सही हो या न हो, पर यह बात तो तय है कि सरकार अपने इस कदम की वजह से बेघर हुए लोगों को वैकल्पिक जगह पर बसाने की ज़िम्मेदारी से नहीं बच सकती।

पीडब्ल्यूडी के अनुसार, ‘राईट ऑफ़ वे’ के नियमों के चलते झुग्गियों को हटाते वक्त नागरिकों और बाकी एजेंसियों को सूचित करना विभाग के लिए ज़रूरी नहीं था। जिस वरिष्ठ पीडब्ल्यूडी इंजीनियर से हमने बात की, वह इस बात पर कायम थे कि ‘राईट ऑफ़ वे’ के सन्दर्भ में अतिक्रमण हटाने की प्रक्रिया हर स्थिति में वही रहती और इस प्रक्रिया पर इस बात से कोई प्रभाव नहीं पड़ता कि अतिक्रमण करने वाला रिहायशी इलाका किस तरह का है। उसने बताया कि किसी भी स्थिति में, ‘राईट ऑफ़ वे’ के अनुसार, अतिक्रमण हटाने के लिए विभाग को नोटिस देने की ज़रुरत नहीं है, चाहे अतिक्रमण एक झुग्गी हो या बँगला।

इस वरिष्ठ इंजीनियर ने यह दलील भी दी कि किसी अतिक्रमण को हटाने से पहले पीडब्ल्यूडी को किसी भी सरकारी विभाग को अपनी योजना के बारे में बताना आवश्यक नहीं है। पीडब्ल्यूडी को सिर्फ इलाके के स्टेशन हाउस ऑफिसर को पुलिस मुहैया कराने के लिये कहना पड़ता है ताकि झुग्गियों को ढहाने के दौरान कोई हिंसा न भड़के। जिस इंजीनियर ने इस पूरी प्रक्रिया की देख-रेख की, ने बताया कि सुरक्षा प्रदान करने के अलावा, बस्ती ढहाने की प्रक्रिया में पुलिस की दूसरी कोई भूमिका नहीं है और यह कार्य केवल पीडब्ल्यूडी द्वारा ही किया जाता है। दोनों इंजीनियरों ने हमें बताया कि वे पीडब्ल्यूडी में “ऊपर से दिये गये आदेश” का पालन कर रहे थे।

एक साक्षात्कार में एक शीर्ष डीयूएसआईबी अधिकारी ने पूरी प्रक्रिया की अपनी समझ को हमसे बांटा। उन्होंने बताया कि पीडब्ल्यूडी को डीयूएसआईबी से विस्थापित हुए लोगों की पहचान और उन्हें पुर्नवासित करने के लिये कहना होता है। पीडब्ल्यूडी के लिये यह भी आवश्यक होता है कि वह पुर्नवास में मदद के लिये प्रति “योग्य” लाभार्थी परिवार के लिए डेढ़ लाख13 रुपये डीयूएसआईबी को दे।

समुदाय के कुछ सदस्य झुग्गियों को ढहाये जाने के एक दिन के भीतर ही आर. के. पुरम विधान सभा क्षेत्र के विधायक (जो 2008 से 2013 तक कार्यरत थी) के पास पहुंचे। विधायक ने लोगों को तोड़ी गयी झुग्गियों की एक सूची तैयार करने को कहा। साथ ही सूची के साथ अपनी पहचान से जुड़े दस्तावेज भी लगाने को कहा। एक बार सूची तैयार होने के बाद विधायक ने कहा कि वह प्रभावित लोगों के साथ पुर्नवास की मांग करने के लिये आयकर विभाग जायेगी। संभवतः वह आईटीओ के पास स्थित डीयूएसआईबी ऑफिस की ओर इशारा कर रही थी।

कैंप के विस्थापित निवासियों ने कुछ दिनों के बाद ढहायी गयी झुग्गियों का विवरण विधायक के ऑफिस में जमा कर दिया। उन्होंने सचेत किया कि किसी भी तरह की मदद या राहत मिलने में पांच से छह महीने का वक्त लग सकता है। उनके इस जवाब से निराश होकर समुदाय ने इस मामले को अदालत में ले जाने के लिये किसी वकील से संपर्क करने का निश्चय किया।

8 मई 2013 को कुछ निवासी विधायक के पास दोबारा पहुंचे। इस बार उन्होने यह आश्वासन दिया कि तोड़ी गयी झुग्गियों के बदले उन्हें पुर्नवास नीति के तहत नरेला14 में फ़्लैट दिये जायेंगे। उन्होने बताया कि 10 और/या 15 मई को सोनिया गांधी कैंप में एक रजिस्ट्रेशन कैंप लगाया जायेगा जहां पर जिनकी झुग्गियां तोड़ी दी गयी थी उनको ‘टाइम एलोटमेंट स्लिप’ दी जायेगी। उन्होने यह भी बताया कि हर लाभार्थी परिवार को फ़्लैट लेने के लिये 72,000 रुपये देने होंगे। विधायक ने लोगों को यह भी कहा कि फ़्लैट हासिल करने के लिए, तोड़ी गयी झुग्गियों के मालिकों को अपने मतदान प्रमाण प्रदान देने होंगे जों ये साबित कर सकें कि वे पिछले 8-10 सालों से सोनिया गांधी कैंप में रहे थे।

निवासियों को बताये गये दिनों पर कोई भी रजिस्ट्रेशन कैंप नहीं लगाया गया। एक बार फिर निवासी फ्लैटों के आवंटन की स्थिति का पता करने विधायक के पास पहुंचे। विधायक ने निवासियों को बताया कि उसने (विधायक ने) डीयूएसआईबी से यह पूछा कि जिन परिवारों की झुग्गियां तोड़ी गयी उन्हें पुनर्वास के रूप में दूसरी जगह घर क्यों नहीं दिए गए। डीयूएसआईबी ने जवाब में कहा कि झुग्गियों को ढहाने का काम पीडब्ल्यूडी द्वारा किया गया और जिसके बारे में पीडब्ल्यूडी ने डीयूएसआईबी कोई सूचना नहीं दी। इसी के चलते डीयूएसआईबी ने प्रभावित परिवारों के लिये कोई पुर्नवास योजना नहीं तैयार की।

demolition16 अप्रैल, कैंप को ढहाए जाने के एक दिन बाद, का नज़ारा
 

‘राइट आफ वे’: वर्तमान नीति और कानूनी ढांचा

सोनिया गांधी कैंप के मामले में सरकार का बस्ती को ढहाने का कदम ‘राईट ऑफ़ वे’ की अवधारणा पर आधारित था। इस नीति की सरकार की समझ क्या है और वास्तव में यह नीति क्या है, इस फ़र्क को समझना ज़रूरी है क्योंकि सरकार इसका इस्तेमाल दिल्ली की झुग्गी बस्तियों को हटाने के अपने कदम को जायज़ ठहराने के लिए करती है।

पीडब्ल्यूडी ने अपने कदम को सही ठहराने के लिए इस दलील का सहारा लिया कि जिन लोगों के घर सार्वजनिक राईट ऑफ़ वे में अतिक्रमण कर बने हैं, उन्हें पुर्नवास के योग्य नहीं समझा जायेगा। इस सन्दर्भ में सभी आवश्यक आदेशों और नीतियों की हमने समीक्षा की और यह पाया कि पीडब्ल्यूडी के दावे के उलट नीति यह है कि फुटपाथ, सड़क किनारों, रास्तों के आस-पास के इलाकों के झुग्गी-झोपड़ी बस्ती निवासियों को पुर्नवास का पात्र समझा जाये।

फरवरी 2013 में, दिल्ली सरकार ने पुनर्वास की ‘योग्यता’ के लिये कट-ऑफ तारीख को बढ़ाकर 4 जून 2009 कर दिया।15 इस सन्दर्भ में कट-ऑफ तारीख इस बात को साबित करने के लिए होती है कि कोई व्यक्ति किसी रिहायशी इलाके में इस तिथि विशेष से पहले से रह रहा है। दिसंबर 2011 से कट-ऑफ तारीख 31 जनवरी 2007 रही थी। इससे पहले कट-ऑफ तारीख 1 अप्रैल 2002 थी। दिल्ली सरकार के फरवरी आदेश ने एक नयी नीति बनायी। इस नीति में स्पष्ट तौर पर उस अनुच्छेद को हटा दिया गया जिसके अनुसार सड़क किनारों, फुटपाथ और सार्वजानिक ज़मीन पर बसी झुग्गी-झोपड़ी बस्तियों के निवासियों को पुर्नवास का हक़ नहीं था।

यह आदेश बेहद स्पष्ट ढंग से ‘राईट ऑफ़ वे’ पर वर्तमान नीति को स्थापित करता है। इसके बावजूद यह आवश्यक है कि दिल्ली सरकार और दिल्ली की बाकी एजेंसियों की पिछली नीतिगत स्थिति का विश्लेषण किया जाये। इस सन्दर्भ में कुछ कानूनी मामलों पर नज़र डालने से विभिन्न एजेंसियों के बीच कुछ अनियमिततायें तो उजागर होती ही है, साथ ही साथ सोनिया गाँधी कैंप के सन्दर्भ में पीडब्ल्यूडी की इस नीति पर समझ की कमी की वजह को भी बेहतर समझा जा सकता है।
दिल्ली म्यूनिसपल कॉर्पोरेशन एक्ट, 1957 के अनुच्छेद 42(पी) के अनुसार, दिल्ली नगर निगम (एमसीडी) को गलियों, पुलों और अन्य सार्वजनिक स्थानों पर बने अवरोधों को हटाने की ज़िम्मेदारी सौंपता है। हालांकि दिल्ली सरकार की झुग्गी-झोपड़ी बस्तियों के पुर्नवास से जुड़ी विभिन्न नीतियां इस नीति का विस्तार करती हैं। इनमें से पहली योजना 2000 पुर्नवास और सुधार स्कीम है, जो झुग्गी-झोपड़ियों के लिये थी। यह स्कीम 1 अप्रैल 2000 से प्रभाव में आयी और इसने कट-ऑफ़ तारीख’ को जनवरी 1991 से बढ़ाकर नवम्बर 1998 कर दिया। इस आदेश में ऐसी कोई भाषा नहीं थी जो रास्ते या फुटपाथ पर रहने वाले लोगों को पुर्नवास के अयोग्य घोषित करे।

2003 में, दिल्ली उच्च न्यायालय ने ‘यूनियन ऑफ इंडिया बनाम वज़ीरपुर बर्तन निर्माता संघ’ मामले में ‘2000 स्कीम’ को खत्म कर दिया।16 इस निर्णय से सरकार को यह अधिकार मिल गया कि वह सार्वजनिक ज़मीन पर स्थित किसी अतिक्रमण को वहां के निवासियों को बगैर कोई वैकल्पिक आवास मुहैया कराये हटा सकती है। इस निर्णय को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गयी और न्यायालय ने यह फैसला दिया कि उच्च न्यायालय के निष्कर्ष ‘किसी भी उद्देश्य के लिये’ कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं होंगे। कुल मिलाकर इस आदेश से 1957 नीति की यथास्थिति फिर से कायम हो गयी।17 2010 में, दिल्ली उच्च न्यायालय ने सुदामा सिंह बनाम दिल्ली सरकार18 मामले में अंततः ‘रास्ते के अधिकार’ पर ऐतिहासिक फैसला किया। न्यायालय ने कहा-“सरकार ऐसी कोई भी नीति [न्यायलय के सामने] पेश में असफल रही है जिसमें ‘रास्ते के अधिकार’ के आधार पर झुग्गी निवासियों को अयोग्य माना गया हो। दूसरे शब्दों में, दिल्ली उच्च न्यायालय ने झुग्गियों के हटाये जाने के मामलों पर, जिसमें पीडब्ल्यूडी और एमसीडी जैसी एजेंसियां ये दावा कर रही थीं कि निवासियों ने रास्ते पर अतिक्रमण किया था, यह निर्णय दिया कि झुग्गियों को खाली करवाने में नीति का उल्लंघन हुआ। रास्ते पर अतिक्रमण माने जाने वाले घरों के निवासियों को पुर्नवास का अधिकार हासिल है या नहीं, न्यायालय ने इस सवाल का बेहद स्पष्ट और निर्णायक जवाब दिया।19

न्यायालय ने आगे कहा कि अगर इस सन्दर्भ में निवासियों को पुर्नवास से वंचित करने की कोई नीति है तब भी यह नीति केवल उन निवासियों पर लागू होगी जिन्होंने “जान-बूझकर अपनी झुग्गियां किसी मौजूदा सड़क, फुटपाथ इत्यादि,” पर बना ली हैं, और “निश्चित तौर पर यह नीति उन झुग्गी निवासियों पर लागू नहीं होती जो पिछले कई दशकों से किसी खुली ज़मीन पर रह रहे हैं” खासकर तब जब यह पाया जाये कि ज़मीन का वह हिस्सा मास्टर प्लान के तहत भविष्य में किसी सड़क के निर्माण के लिए चुना गया है। रास्ते के अधिकार को साबित करने के लिये जो एक मात्र दस्तावेज पेश किया गया, वह दिल्ली सरकार के शहरी विकास के मुख्य सचिव द्वारा भेजा गया एक पत्र था। इस पत्र में उप-राज्यपाल के कुछ मौखिक निर्देशों का ज़िक्र था जिनके अनुसार रास्ते के अधिकार पर रह रहे झुग्गी-निवासियों को स्थानांतरण का कोई अधिकार हासिल नहीं था। न्यायालय ने इस दस्तावेज को यह कहकर खारिज कर दिया कि दस्तावेज से यह नहीं समझा जा सकता था कि “किस प्रकार वह ‘रास्ते के अधिकार’ पर किसी नीतिगत निर्णय पर पहुँचने में सहायक होगा”।

11 फरवरी 2010 को आये इस फैसले के जवाब में, सुप्रीम कोर्ट में अपील की गयी लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने 31 जुलाई 2013 को इस अपील को खारिज कर दिया गया। इस समय, दिल्ली उच्च न्यायालय का सुदामा सिंह फैसला कानून के तौर पर मौजूद है और यह जिन निवासियों की झुग्गियां राह के अधिकार का हवाला देकर ढहा दी जाती हैं, उनके पुर्नवास के अधिकार की रक्षा करता है।

हालांकि कुछ समय तक नीतियों में इस फैसले का पालन नहीं किया गया। सुदामा सिंह फैसले से एक हफ्ते पहले20 3 फरवरी 2010 को दिल्ली सरकार की कैबिनेट ने एक निर्णय (संख्या 1613) को पास करते हुये ज़ोर देकर कहा कि “न्यायालय के आदेश के अनुसार वे झुग्गी-झोपड़ी निवासी जो अनाधिकृत रूप से सड़क किनारों, फुटपाथों, राह के अधिकार, सामुदायिक इलाकों और रेलवे के सेफ्टी ज़ोन्स में रह रहे हैं” पुर्नवास के योग्य नहीं होंगे। दूसरे शब्दों में, राज्य सरकार ने ऐसी नीति बनायी जो इस नीति के बनने के ठीक एक हफ्ते बाद आये केंद्र सरकार के सुदामा सिंह फैसले के ठीक उलट थी। यह विरोधाभास फरवरी 2013 तक बना रहा जब राज्य सरकार ने अपनी नीति को सुदामा सिंह फैसले के अनुरूप बना दिया।

इसके आलावा अगस्त 2010 की एक घटना भी न्यायिक आदेश और सरकारी नीति के बीच अंतर को रेखांकित करती है। सुदामा सिंह फैसले के अनुरूप और राज्य सरकार की वर्तमान नीति के खिलाफ जाते हुये न्यायालय ने यह आदेश दिया कि दिल्ली में मुख्य रोड पर बने एक टीले पर रहे ग़दर लोहिया समुदाय के निवासी पुर्नवास के पात्र हैं। इन निवासियों को पुर्नवास मुहैया कराने की जिम्मेदारी दिल्ली नगर निगम को दी गयी।21

इन तीन सालों (2010 से 2013) के दौरान इस सन्दर्भ में जो भी अस्पष्टता रही हो, यह स्पष्ट था कि अप्रैल 2013 तक पीडब्ल्यूडी का रुख और दिल्ली सरकार की नीति एक दूसरे के विपरीत थे। पीडब्ल्यूडी का दावा था कि वे रास्ते के अधिकार में बाधा पैदा करने वाले अतिक्रमण को बगैर कोई नोटिस दिये हटा सकते थे और इस प्रकार विस्थापित हुए निवासी पुनर्वास के योग्य नहीं थे। जबकि इस पर दिल्ली सरकार की वर्तमान नीति, जो अदालत के सुदामा सिंह निर्णय के अनुरूप थी, इसके उलट थी।

कुछ राष्ट्रीय नीतियों में भी झुग्गी-झोपड़ी बस्तियों को हटाने और उनकी पुर्नवास नीति पर दिशा-निर्देश मिलते हैं। स्लमों/झुग्गी-झोपड़ी निवासियों के पुर्नवास के लिये शुरू की गयी राष्ट्रीय योजना- राजीव आवास योजना (आरएवाई) स्लम-निवासियों को संपत्ति का अधिकार देने की अपनी तरह की पहली योजना है। जून 2009 में घोषित की गई राजीव आवास योजना का लक्ष्य ऐसे राज्यों को वित्तीय मदद मुहैया कराना है जो स्लम-निवासियों को आवास और बुनियादी और सामाजिक सुविधायें मुहैया कराने, स्लम पुर्नवास और सस्ते मकान बनाने के लिये संपत्ति का अधिकार देने के इच्छुक हैं।22 राजीव आवास योजना का पहला चरण जून 2011 में शुरू हुआ और यह जवाहरलाल नेहरू राष्ट्रीय शहरी नवीनीकरण मिशन (JNNURM) का एक विस्तार है, जिसके ज़रिये यह मिशन निम्न आय वर्गों के लिए घर मुहैया कराने की कोशिश करता है।

राजीव आवास योजना के पहले चरण को आर्थिक मामलों की कैबिनेट समिति ने मंजूर किया23 और इसके तहत कुछ सुधारों की शर्तों के साथ राज्यों को वित्तीय मदद देने की बात कही गयी। इन शर्तों के मुताबिक केंद्र से आर्थिक मदद प्राप्त करने के लिए राज्यों को झुग्गी-झोपड़ी निवासियों को मॉडल प्रापर्टी अधिकार देने वाले बिल (2011) और स्लम-मुक्त शहर योजना (स्लम फ्री सिटी प्लान) को अपनाना होगा। वर्तमान में कुछ ही राज्यों ने आवश्यक कानून को लागू किया है, लेकिन राजीव आवास योजना के तत्वाधान में कुछ पायलट प्रोजेक्ट शुरू हुये हैं। इस सन्दर्भ में, दिल्ली में उपरोक्त शर्तों में से केवल एक शर्त पूरी की गयी है। दिसंबर 2011 में डीयूएसआईबी ने दिल्ली को साल 2015 तक स्लम मुक्त शहर बनाने के लिये एक कार्य-योजना को मंजूरी दी और बड़ी संख्या में झुग्गी-झोपड़ी बस्तियों को स्थानांतरित करना तय किया।24 हालांकि ये योजना सार्वजनिक नहीं की गयी है और साफ तौर पर यह एक ऐसा लक्ष्य है जो डीयूएसआईबी के ट्रैक रिकार्ड के बिलकुल विपरीत है। पिछले दो सालों में डीयूएसआईबी ने 600 से भी अधिक झुग्गी-झोपड़ी बस्तियों में से सिर्फ 8 को स्थानांतरित किया है।

स्पष्ट तौर पर राजीव आवास योजना और अन्य राष्ट्रीय नीतियों का उद्देश्य सुधार, समावेशी और प्रगतिशील नीतियां बनाने का है जो जबरन विस्थापन से स्लम-निवासियों के अधिकारों की रक्षा कर सके है। सोनिया गांधी कैंप और ऐसे ही अन्य मामलों में पीडब्ल्यूडी और दिल्ली सरकार का रूख़ इस राष्ट्रीय रुझान के अनुरूप नहीं हैं। इन मामलों में लगातार स्लम निवासियों के अधिकारों को ताक पर रखकर राज्य की प्राथमिकताओं को वरीयता दी गयी है।

 
 

पुर्नवास: वर्तमान नीति और कानूनी ढांचा

हालांकि सरकारी आदेशों और कानून में पुर्नवास के लिये योग्यता के मापदंडों और इससे जुडी अन्य महत्वपूर्ण बातों उल्लेख है, जैसे कि पुनर्वास के योग्य निवासी किन सेवाओं के हकदार होंगे और पुर्नवास के लिये पात्र समझे जाने वाले परिवारों का सर्वेक्षण कैसा किया जाना है। पर ऐसा कोई दस्तावेज़ नहीं है जो झुग्गियों को हटाने की नीति को स्पष्ट रूप से स्थापित करे। इस सन्दर्भ में प्रासंगिक आदेशों और कानूनों की समीक्षा के आधार पर हमने दिल्ली सरकार की किसी एजेंसी की ज़मीन से झुग्गियों को खाली कराने की औपचारिक प्रक्रिया पर प्रकाश डालने की कोशिश है।

फरवरी 2013 में दिल्ली सरकार के एक आदेश ने डीयूएसआईबी को दिल्ली नगर निगम और दिल्ली सरकार के विभागों/एजेंसियों की ज़मीन पर मौजूद झुग्गी-झोपड़ी बस्तियों के पुर्नवास और स्थानांतरण के लिये नोडल एजेंसी के रूप में स्थापित किया। इस आदेश के अनुसार, जिन मामलों में बस्तियां केंद्र सरकार की ज़मीन पर है, उन स्थितियों में पुर्नवास और स्थानांतरण करने की अनुमति केंद्र सरकार को दी गयी और इन मामलों में यदि केंद्र चाहे तो यह ज़िम्मेदारी डीयूएसआईबी को भी दी जा सकती थी। यह आदेश सर्वेक्षण की प्रक्रिया, झुग्गी-झोपड़ी बस्ती निवासियों द्वारा फ़्लैट आवेदन की पात्रता और लोगों की शिकायत निवारण प्रक्रिया का भी उल्लेख करता है। सोनिया गांधी कैंप के मामले में ज़मीन पर मालिकाना हक़ पीडब्ल्यूडी का था जो जीएनसीटीडी का एक विभाग है। इसलिये फरवरी के आदेश के मुताबिक, इस बस्ती से लोगों को स्थानांतरित करने का जिम्मा डीयूएसआईबी का था। यह स्पष्ट है कि पीडब्ल्यूडी ने एकपक्षीय ढंग से काम करते हुये स्थापित नीति का उल्लंघन किया।

हालांकि वर्तमान नीतिगत ढांचा यह स्पष्ट तौर पर कहता है कि जिन निवासियों के घर ‘राइट आफ वे’ पर हैं, उन्हें हटाया जा सकता है, पर स्थानांतरण स्कीम के तहत ऐसे निवासी रहने के वैकल्पिक इंतजाम के हकदार हैं। डीयूएसआईबी और तर्क के आधार पर भी यह माना जायेगा कि इस पूरी प्रक्रिया का पालन झुग्गियों को खाली कराने से पहले होना चाहिये। ये एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके लिये ज़मीन के मालिकाना हक़ वाली एजेंसी और डीयूएसआईबी के बीच तालमेल की आवश्यकता है। डीयूएसआईबी खुद यह स्वीकार करती हैं कि जिन एजेंसियों की ज़मीन पर झुग्गियां होती है वे अक्सर झुग्गियों को खाली कराने का काम डीयूएसआईबी से मदद मांगे बगैर खुद करने लगती हैं। सोनिया गांधी कैंप मामले में भी ऐसा ही हुआ। जिसने निवासियों को सुरक्षा प्रदान करने के उद्देश्य से जारी किये गये उपरोक्त आदेश को ही इस सन्दर्भ में निष्प्रभावी बना दिया गया।25 अदालतों द्वारा पूर्व में दिए गए फैसलों के अनुसार यह अनिवार्य है कि झुग्गियों को हटाने वाली एजेंसी निवासियों के स्थानांतरण और पुनर्वास की योग्यता तय करे और यह सब झुगियाँ हटाने से पहले किया जाए। प्रेम सिंह बनाम दिल्ली सरकार के केस में वसंत कुंज26 की एक झुग्गी-झोपड़ी बस्ती के 106 निवासी उच्च न्यायालय पहुंचे और स्थानांतरण का कोई इंतजाम करने से पहले एमसीडी द्वारा उनकी झुग्गियों को हटाये जाने पर रोक लगाने की मांग की। इस पर न्यायालय ने कहा—‘डीयूएसआईबी को प्रत्येक याचिकाकर्ता के मामले को देखना चाहिए और अगर [किसी भी मामले में] वह स्थानांतरण के अधिकार के दावे से संतुष्ट नहीं है तो वह ऐसा आदेश जारी करे जिसमें यह लिखा हो कि दस्तावेज पेश किये गये थे अथवा नहीं और अगर दस्तावेज पेश किये गये थे तो उनके नामंजूर होने की वजह बताई जाये’।27 दूसरे शब्दों में, न्यायालय ने न सिर्फ यह कहा कि निवासियों को स्थानांतरण के लिये आवेदन करने की पात्रता हासिल है, बल्कि यह भी अनिवार्य किया कि अगर उन्हें स्थानांतरण के योग्य नहीं माना जाता है तो उन्हें इसका कारण बताया जाए। न्यायालय ने यह भी पाया कि नीति में शिकायत निवारण का कोई प्रावधान नहीं है और डीयूएसआईबी को इस कमी को पूरा करना चाहिये।28 हालांकि तब से डीयूएसआईबी ने इस कमी को तो पूरा किया है, लेकिन ऐसा कोई प्रावधान नहीं बनाया है जिससे निवासियों को यह सूचित किया जा सके कि उन्हें स्थानांतरण/पुनर्वास का पात्र क्यों नहीं समझा गया।

साल 2011 के राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र कानून (स्पेशल प्रोविज़न) दूसरा अधिनियम ने अतिक्रमण और अनाधिकृत निर्माण29 के खिलाफ की जाने वाली कार्रवाइयों के सभी आदेशों को 31 दिसंबर 2014 तक रद्द कर दिया। इसके अनुसार ऐसा करना इसलिये आवश्यक है क्योंकि दिल्ली की 685 झुग्गी-झोपड़ी बस्तियों (जिनमें सोनिया गांधी कैंप भी शामिल है) के पुनर्वास काफी समय लेगा। इस आदेश को गौर से पढ़ने पर यह पता लगता है कि कानून झुग्गी-झोपड़ी बस्तियों को एक सीमा तक ही सुरक्षा प्रदान करता है।30

इस कानून में लिखा है कि 2021 के मास्टर प्लान और कुछ “विशेष सार्वजानिक परियोजनाओं” को लागू करने के लिए झुग्गियों को हटाने की अनुमति है। हालांकि यह कानून निवासियों के घर यदि “गलियों, लेनों, फुटपाथों और पार्कों” का अतिक्रमण करके बने हैं, तब उन्हें हटाये जाने से संरक्षण नहीं प्रदान करता। लेकिन यह कानून कहीं भी ऐसे निवासियों को स्थानांतरण/पुनर्वास के अयोग्य नहीं मानता है, न ही वह निवासियों के उचित प्रक्रिया के अधिकार को क्षीण करता है।

स्थानांतरण या पुर्नवास की ज़्यादातर प्रक्रिया झुग्गी-झोपड़ी बस्तियों के सरकारी सर्वेक्षणों पर टिकी होती है। इन सरकारी सर्वेक्षणों के ज़रिये निवासियों की ‘पात्रता’ तय की जाती है। सामान्य रूप से इस पूरी प्रक्रिया की समग्रता का पता सर्वेक्षणों की पारदर्शिता से चलता है। इस तरह की बहुत सारी व्यवस्थायें हैं जो झुग्गी-झोपड़ी बस्तियों के सर्वेक्षणों को तय करती हैं। डीयूएसआईबी अधिनियम का सेक्शन 9 बोर्ड को झुग्गी-झोपड़ी निवासियों की संख्या और बस्ती में मौजूद सेवाओं का स्तर जानने के लिये विस्तृत सर्वेक्षण करने अधिकार देता है।31 इसके अनुसार प्रत्येक स्थानीय प्राधिकरण और सरकार के प्रत्येक विभाग का यह दायित्व है कि वे इन सर्वेक्षणों को कराने के लिये अपने अधिकार क्षेत्र में मौजूद हर आवश्यक सूचना को उपलब्ध करवायें।32 यह कानून डीयूएसआईबी को दो तरह के सर्वेक्षण करने की अनुमति देता है-झुग्गियों को खाली कराने से पहले होने वाला सर्वेक्षण ताकि ये पता लगाया जा सके कि किन निवासियों को स्थानांतरण की पात्रता हासिल है, और सामाजिक-आर्थिक सर्वेक्षण जो व्यापक और दूरगामी योजनाओं (जैसे स्लम मुक्त शहर) को ध्यान में रखकर किये जाते हैं।

फरवरी 2013 के कानून में सर्वेक्षण करने के लिये कुछ आवश्यक शर्तों का विवरण दिया गया है। इस कानून में कहा गया है कि डीयूएसआईबी या स्थानांतरण करने वाली एजेंसी को समुदाय में सर्वेक्षण का नोटिस कम से कम चार हफ्ते पहले बस्ती में लगा देना चाहिये। यह नोटिस ऐसी जगहों पर लगा होने चाहिए, जहां से यह स्पष्ट तरीके से नज़र आ जायें। यह सुनिश्चित करने के लिये कि सभी झुग्गी निवासियों को सर्वेक्षण की सूचना मिले, नोटिस के जारी होने वाले दिन से लेकर सर्वेक्षण के पूरे होने तक नियमित तौर पर लाउडस्पीकर अथवा ड्रमों को बजाकर सार्वजनिक घोषणा करायी जानी चाहिये।33 डीयूएसआईबी और जिस एजेंसी की ज़मीन पर झुग्गियां हो, को सर्वेक्षण इस तरह से करना चाहिये कि कोई भी योग्य झुग्गी-झोपड़ी निवासी इस प्रक्रिया में छूट न जाये। सर्वेक्षण के पूरा होने के बाद दस्तावेजों34 को 21 दिनों के भीतर डीयूएसआईबी के पास जमा करना होता है। नोटिस आगे कहता है कि अगर कोई वास्तविक पात्र उम्मीदवार छूट जाता है तो डीयूएसआईबी का मुख्य कार्यकारी अधिकारी उम्मीदवार विशेष के मामले के गुण-दोषों के आधार मामले को देख सकता है।35 ध्यान देने लायक बात तो यह है कि फरवरी 2013 की यह नीति कहीं नही कहती कि इस सर्वेक्षण के परिणामों को निवासियों के साथ साझा किया जाये।

राष्ट्रीय स्तर की नीति भी सामुदायिक भागीदारी के लिये कुछ ऐसे ही मानकों की बात कहती है। राजीव आवास योजना के दिशा-निर्देश भी इस बात को अनिवार्य बनाते हैं कि सर्वेक्षण करने के लिये “स्थानीय शहरी निकाय” को नगर निगम स्तर की विभिन्न संस्थाओं के साथ मिलकर काम करना चाहिये।36 यह दिशा-निर्देश समुदाय की भागीदारी को भी आवश्यक बनाते है: सर्वेक्षण को “समुदाय द्वारा पुष्ट” किया जाना चाहिये।37 इसका मतलब यह निकला जा सकता है कि सर्वेक्षण के नतीजों को निवासियों को उपलब्ध कराया जाये ताकि नतीजों की पुष्टि की जा सके और अगर कोई जानकारी गलत नज़र आये, तो उसे ठीक किया जा सके।

अदालत के कुछ हालिया फैसले, सर्वेक्षण के तरीकों पर हैं। सुदामा सिंह फैसले में जोर देकर कहा गया है- ‘झुग्गी निवासियों को वैकल्पिक आवास की सख्त जरुरत होती है, इसलिये सर्वेक्षण का काम उनकी इस जरुरत के मद्देनजर बेहद सावधानी से और जिम्मेदारी के साथ किया जाना चाहिये’।38 न्यायालय ने निर्देश दिया कि राज्य को स्थानांतरण करने जा रहे प्रत्येक निवासी के साथ सार्थक बातचीत करनी चाहिये। न्यायालय ने यह भी अनिवार्य किया कि सर्वेक्षण में शामिल एजेंसी या एजेंसियों को प्रत्येक झुग्गी निवासी के लिये एक अलग फोल्डर बनाना चाहिये। इस फोल्डर में उस निवासी से सम्बंधित सभी ज़रूरी दस्तावेज एक ही जगह रखे जायें। न्यायालय ने यह भी अनिवार्य किया कि विस्थापित होने वाले सभी निवासियों को बुनियादी सुविधायें भी मिलनी चाहिये। न्यायालय ने जोड़ा कि सर्वेक्षण करने वाली टीम को एक निश्चित समयावधि के दौरान इलाके में कई बार जाना होगा और इसके लिये टीम को ठीक प्रकार से घोषणा करवानी होगी।39

हालांकि ज़मीनी और व्यवहारिक स्तर पर झुग्गी-झोपड़ी बस्तियों के सर्वेक्षण की प्रक्रिया काफी समस्याग्रस्त रही है। इसमें न तो उपरोक्त नीतियों द्वारा निर्देशित पारदर्शिता दिखायी पड़ती है, और न ही समुदायों की भागीदारी। उदाहरण के तौर पर, बलजीत नगर40 में झुग्गियों को ढहाने के बाद न्यायालय ने यह जानने के लिये कि कौन निवासी स्थानांतरण के पात्र है, सर्वेक्षण का आदेश दिया।41 बलजीत नगर में लगातार किये गये कई फील्ड दौरों और साक्षात्कारों से यह पता चला कि ये सूचियां निवासियों को उपलब्ध नहीं करायी गयी। निवासियों ने कहा कि अपने दस्तावेज हासिल करने के लिये उन्हें सूचना के अधिकार के तहत याचिका दायर करनी पड़ी। हमने पाया कि कठपुतली कॉलोनी42 में भी यही स्थिति थी। इस कॉलोनी में आरटीआई की लम्बी जद्दोजहद से गुजरने के बाद निवासियों को स्थानांतरण के पात्र उम्मीदवारों की सूची मिल सकी।

यह प्रक्रिया सीधे तौर पर सुदामा सिंह फैसले का उल्लंघन करती है। इस फैसले में एक सुव्यवस्थित व्यवस्था दी गयी थी। इसके तहत सर्वेक्षण के बाद तैयार होने वाली अंतिम सूची की सार्वजनिक तौर पर घोषणा होनी चाहिये। इस तैयार सूची को सभी निवासियों—भले ही वे स्थानांतरण के पात्र हों अथवा नहीं— से प्रभावी रूप से साझा किया जाना चाहिये। ताकि अगर किसी निवासी का नाम सूची से गलत ढंग से हटा दिया गया है तो वह उसे चुनौती दे सके और सर्वेक्षण के दौरान हुयी गलतियों को ठीक किया जा सके। ये नियम न्याय का प्राकृतिक सिद्धांत कहे जाने वाले प्रशासनिक नियम से ही निकला है। इसके अनुसार किसी भी पक्ष की चुनौती को सुने बिना उसके विरुद्ध कोई आदेश नहीं जारी किया जा सकता।43 फरवरी 2013 का आदेश इसके लिये कुछ बेहद प्रभावशाली प्रावधान करता है। इसके अनुसार अगर कोई वास्तविक पात्र निवासी प्रक्रिया में छूट जाता है तो इस मामले को डीयूएसआईबी का मुख्य कार्यकारी अधिकारी स्वयं देखेगा और हर मामले पर अलग से निर्णय लेगा। वर्तमान में जिस प्रकार यह नीतियां लागू की जा रही हैं वह इस प्रावधान को प्रभावहीन बना देता हैं। वास्तव में अगर किसी निवासी को अयोग्य घोषित किया गया है तो वह उसको तभी चुनौती दे सकता है जब उसे सर्वेक्षण सूची में अपनी स्थिति के बारे में पता हो।

हालांकि इस सन्दर्भ में सरकारी एजेंसियों ने निवासियों को उनकी स्थिति बताने के लिये कुछ प्रयास किये हैं, लेकिन ये सभी प्रयास बेहद अस्पष्ट और अनियमित रहे हैं। बहुत सी हालिया घटनाओं में, डीयूएसआईबी के रिकार्ड ये दिखाते हैं कि उसने योग्य और अयोग्य निवासियों की सूची को अपनी वेबसाइट पर जारी किया और बस्तियों में भी उन सूचियों को लगा कर निवासियों को सूचित किया। रिकार्ड ये भी दिखाते हैं कि निवासियों को ड्रमों की जरिये सूचित किया गया।44 रिकार्डों के अनुसार, उन निवासियों को दोबारा अवसर दिया गया जिनका सर्वेक्षण तो किया गया था लेकिन जो या तो अपना फ़ार्म नहीं भर सके थे और/या फिर पात्रता निर्धारित करने वाली समिति ने जिन्हें पुनर्वास के लिए अयोग्य घोषित कर दिया था। और ऐसा अधिकाधिक लाभार्थियों को शामिल करने के उद्देश्य से किया गया था।45 लेकिन बलजीत नगर और कठपुतली कॉलोनी, जहां पुनर्वास की पात्रता तय करने वाले सर्वेक्षण हाल में (साल 2010 और 2012) हुये हैं, के निवासियों के साथ हुये साक्षात्कारों से पता चलता है कि उन्हें सर्वेक्षणों के नतीजों बारे में नहीं बताया गया।

हालांकि झुग्गियों को खाली कराने के लिये नोटिस (अधिसूचना) जारी करना झुग्गियों को हटाये जाने की प्रक्रिया का एक आवश्यक चरण है, लेकिन अधिसूचना जारी करने से जुड़ी नीति अस्पष्ट और अधूरी है। हालांकि डीयूएसआईबी एक्ट में झुग्गियों को खाली कराने का नोटिस देने की प्रक्रिया दी गयी है, लेकिन यह तभी लागू होती है जब डीयूएसआईबी खुद झुग्गियों को खाली कराने का काम करता है। यह प्रक्रिया तब लागू नहीं होती जब ज़मीन के मालिकाना हक़ वाली कोई अन्य एजेंसी झुग्गियों को खाली कराने का काम खुद करती है। दूसरे शब्दों में, ऐसा एक भी सरकारी दस्तावेज नहीं है जिसमें नोटिस देने के प्रक्रिया का विवरण दिया हो जब ज़मीन पर मालिकाना हक़ पीडब्ल्यूडी जैसी एजेंसी का हो। इसके बजाय इस सन्दर्भ में निवासियों के लिए पर्याप्त नोटिस क्या हो सकता है, को समझने के लिए हमें डीयूएसआईबी अधिनियम में वर्णित दूसरी स्थितियों और पूर्व में कोर्ट के फैसलों का सहारा लेना होगा।

डीयूएसआईबी एक्ट ‘सार्वजनिक परिसरों’ में रह रहे लोगों के घरों को खाली कराने के लिए केवल पर्याप्त नोटिस की बात करता है। ‘पब्लिक प्रीमिसेस अनोथराइज्ड आक्यूपेंट्स ऐविक्शन एक्ट 1971 के अनुसार ‘सार्वजनिक परिसर’ कोई ज़मीन, इमारत या इमारत का हिस्सा हो सकती है। 1971 के इस एक्ट के अनुसार, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में इसका मतलब डीडीए, एमसीडी (भले ही ऐसे परिसरों पर सम्बंधित प्राधिकरण का मालिकाना हक़ हो या ऐसी ज़मीन पट्टेदारी पर हो) की किसी ज़मीन और राज्य या केंद्र सरकार से संबंध रखने वाली किसी एजेंसी के परिसरों से है।

डीयूएसआईबी एक्ट के अनुसार यह आवश्यक है कि सार्वजनिक ज़मीन और इमारतों में प्रवेश करने से पहले बोर्ड पूर्व अनुमति ले और इमारतों को खाली कराने के आदेश के साथ ऐसा करने का कारण भी दर्ज करना होगा। खाली कराने का नोटिस परिसर के किसी ऐसे हिस्से पर लगाना होगा जहाँ ये साफ़ देखा जा सके। अगर इस नोटिस के लगाये जाने के 15 दिन के बाद भी निवासी वो जगह खाली नहीं करते हैं तभी एजेंसियां परिसर को खाली कराने का कदम उठा सकती हैं।
इन पाबंदियों के बावजूद, स्लम पुर्नवास पर बने हालिया दिशा-निर्देशों में झुग्गियों को ढहाने/खाली कराने से पहले नोटिस देने को स्पष्ट रूप से आवश्यक नहीं बनाया गया है। वास्तव में, पिछले एक दशक में झुग्गियों को बगैर कोई पूर्व नोटिस जारी किये हुये ही खाली कराया गया है। एक मामले में, डीयूएसआईबी ने मोतीबाग़ की एक झुग्गी-झोपड़ी बस्ती से निवासियों को उनके घरों को खाली कराने से पांच दिन पहले सूचित किया था। हालांकि दिल्ली उच्च न्यायालय यह कह चुका है कि घरों को खाली कराते समय निवासियों की कठिनाइयों को कम करने के लिये उन्हें 21 दिन का नोटिस दिया जाना चाहिये। एक दूसरे मामले में, 30 दिनों का नोटिस दिया गया। वहीं दूसरी ओर इस मामले पर काम करने वाले एक्टिविस्ट कहते हैं कि समुदाय को संगठित होने/संभलने और झुग्गियों को खाली कराने के आदेश को चुनौती देने के लिये कम से कम दो महीने का वक्त दिया चाहिये। पुनर्वास के लिये योग्य उम्मीदवारों की सूची में नाम नहीं होने की स्थिति में भी चुनौती देने के लिये कुछ इतना ही समय चाहिये।

कोर्ट द्वारा दिए गए फैसले भी इस ओर इशारा करते है कि कितनी अवधि को पर्याप्त अधिसूचना/नोटिस माना गया है। सतबीर सिंह मामले में, न्यायालय ने निर्देश दिया कि झुग्गियों को खाली कराने के लिये 30 दिनों का नोटिस दिया जाये।46 तुगलकाबाद वेलफेयर एसोसियेशन मामले में न्यायालय ने कहा कि निवासियों के कष्टों का निवारण करने और झुग्गियों को खाली कराने में होने वाली मुश्किलों को कम करने के लिये 21 दिनों का नोटिस दिया जाये।47 कोर्ट के फैसले यह दिखाते हैं कि पुनर्वास की प्रक्रिया के जटिल होने के चलते झुग्गियों को खाली कराने से पहले दिए जाने वाले नोटिस की अवधि कम से कम 21 दिन होनी चाहिये। इस रिपोर्ट की शुरुआत में उद्धृत किये गये पत्र के अलावा सोनिया गांधी कैंप को ढहाने से पहले और कोई नोटिस नहीं दिया गया। वह पत्र—जिसको जारी करने वाली एजेंसी और अफ़सर भी स्पष्ट हैं— भी तब दिया गया जब झुग्गियों को ढहाने के लिये बिना-नोटिस पहुंचे पीडब्ल्यूडी इंजीनियरों के सामने निवासियों ने विरोध-प्रदर्शन किया।

झुग्गियों को खाली कराने के नोटिस और झुग्गियों को ढहाने के बीच सरकार के कदमों से ही निवासियों के अनुभव पर बहुत बड़ा असर पड़ता है। हालांकि नीतिगत स्तर पर कहीं इस बात का ज़िक्र नहीं है कि झुग्गियों को ढहाने से पहले कुछ सुविधायें मुहैया करायी जानी चाहिये, लेकिन कोर्ट के फैसले इस बात को अनिवार्य बनाते हैं कि झुग्गियों को खाली कराने का नोटिस देने के बाद और ढहाने से पहले कुछ प्रावधान किये जाने चाहिए। बलजीत नगर में ढहायी गयी झुग्गियों के मामले में न्यायालय ने झुग्गियों को ढहाये जाने के तुरंत बाद दिल्ली विकास प्राधिकरण को कुछ वरिष्ठ अधिकारियों की एक टीम बनाकर प्रभावित जगह का दौरा करने और प्रभावित हुए लोगों के लिए पीने के पानी, साफ-सफाई, अस्थायी (कामचलाऊ) आवास और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधायें मुहैया कराने का आदेश दिया था।48 न्यायालय ने यह भी माना था कि लोग मलबे के नीचे दबा अपना सामान नहीं हटा सकते, न्यायालय ने कहा कि दिल्ली विकास प्राधिकरण को लोगों को उनका सामान दोबारा हासिल करने में मदद करनी होगी। डीयूएसआईबी से इलाके का सर्वेक्षण करने और निवासियों के रहने की वैकल्पिक व्यवस्था करने को कहा गया।

 
 

विश्लेषण

पिछले कुछ सालों में झुग्गी-झोपड़ियों के मुद्दे पर काफी पुर्नविचार हुआ है, उनसे संबंधित नीतियों में काफी बदलाव भी आये हैं। हालांकि इस विषय पर कोर्ट के फैसलों, जो कानून के रूप इस्तेमाल किये गए, में विसंगति रही है। सुदामा सिंह फैसले से झुग्गी-झोपड़ी हटाने से जुड़े मुद्दे पर बेहद स्पष्ट नज़रिया मिलता है। अधिकार आधारित द्रष्टिकोण से प्रेरित सुदामा सिंह फैसला, उन व्यावहारिक प्रक्रियाओं का एक विस्तृत रोडमैप मुहैया कराता है, जिनका पालन झुग्गियों को खाली कराते और उनका पुनर्वास करते समय किया जाना चाहिये। कुछ हद तक न्यायालय के फैसले की झलक केंद्र सरकार की राजीव आवास योजना नीति और उसके नतीजे में बने मॉडल कानून में मिलती है। इस मॉडल कानून का उद्देश्य शहरी गरीबों को संपत्ति अधिकारों के रूप में सुरक्षा प्रदान करना है। हालांकि इस मॉडल को लागू करना मुश्किल रहा है। दिल्ली में जटिल प्रशासनिक ढांचे जिसमें अनेक एजेंसिया हैं और नतीजतन सम्बंधित कई नीतियों के चलते यह मॉडल कमजोर रहा है।

विभिन तत्वों की मौजूदगी
सोनिया गांधी कैंप को खाली कराने में दो एजेंसियां—पीडब्ल्यूडी और डीयूएसआईबी—शामिल रहीं। ये दोनों ही दिल्ली सरकार के विभाग हैं और दोनों ने ही ‘रास्ते के अधिकार’ यानी ‘राईट ऑफ़ वे’ की अलग-अलग व्याख्या पेश की। पीडब्ल्यूडी और डीयूएसआईबी दोनों ने इस बारे में अलग-अलग समझ जाहिर की कि क्या ज़मीन की मालिक एजेंसी को रास्ते के अधिकार पर बनी झुग्गी-झोपड़ी बस्तियों को बगैर वैकल्पिक आवास मुहैया कराये या पुनर्वासित किये, ढहाने का अधिकार है। दोनों एजेंसियों की समझ का यह अंतर इस बात को ध्यान में रखते हुये और महत्वपूर्ण हो जाता है कि साल 2011 और साल 2012 के बीच दिल्ली की 850 किलोमीटर से ज़्यादा लम्बी सड़कों की देख-रेख की जिम्मेदारी एमसीडी से हटाकर पीडब्ल्यूडी को दे गयी थी। इससे निश्चित तौर पर बाकी अनौपचारिक रिहायशी इलाके भी इस अस्पष्ट नीति के दायरे में आते हैं। इस बात पर जोर देना महत्वपूर्ण है कि मुद्दे पर इन एजेंसियों की अस्पष्टता के बावजूद फरवरी 2013 की दिल्ली सरकार की मौजूदा नीति इस मुद्दे पर पूरी तरह स्पष्ट है: जिन झुग्गी-झोपड़ी बस्ती निवासियों के घर रास्ते के अधिकार पर हैं, वे पुर्नवास के योग्य हैं।

सोनिया गांधी कैंप मामले में एक और मुख्य व्यक्ति, क्षेत्र का विधायक है। विधायक सामान्य तौर पर ये बात जानता था कि जिन परिवारों की झुग्गियां ढहायी गयी थी, उन्हें पुर्नवास का अधिकार हासिल था। हालांकि न तो उसे वर्तमान नीति के बारे में विस्तार से कुछ मालूम था और न ही वह झुग्गी-झोपड़ी बस्ती के निवासियों की ओर से हस्तक्षेप करने के लिये नीति की बारीकियों को जानती थी।

दिल्ली में बीते वक्त में झुग्गियों को ढहाने अलग-अलग मामलों को अक्सर यह कहकर सही ठहराया गया कि जिन एजेंसियों की ज़मीन पर ये झुग्गियां थी और जिन्होंने झुग्गियों को हटाने का काम किया था (आमतौर पर दिल्ली सरकार और केंद्र सरकार के अधीन) वो स्लम और जेजे विभाग (जो तब एमसी डी का हिस्सा हुआ करता था।) की तुलना में एक दूसरे स्तर की सरकार का हिस्सा थी। इसके चलते संवाद और तालमेल की कमी थी। सोनिया गांधी कैंप में झुग्गियों को हटाने की घटना ये दिखाती है कि जब जिस एजेंसी की ज़मीन पर झुग्गियां बनी हों और पुनर्वास के लिये जवाबदेह एजेंसी एक ही स्तर की सरकार का हिस्सा हों, तब भी झुग्गियों को हटाने की प्रक्रिया बेहद अव्यवस्थित ही रहती है। इस मामले में प्रक्रिया के अव्यवस्थित रहने का कारण यह रहा कि झुग्गियों को ढहाने का निर्णय लागू करने वाले पीडब्ल्यूडी इंजीनियर पीडब्ल्यूडी इंजीनियरों को दिल्ली सरकार की नीति के बारे में मालूम नहीं था। जिसके अनुसार झुग्गियों को ढहाने से पहले वैकल्पिक आवास या पुनर्वास की व्यवथा करना आवश्यक है।

यह सही है कि ज़मीन के मालिकाना हक़ वाली एजेंसियों के पास जानकारी की कमी थी पर इन एजेंसियों पर झुग्गियों को खाली कराने के बारे में डीयूएसआईबी को सूचित करने का कोई दायित्व भी नहीं था। हालांकि फरवरी 2013 की नीति में यह स्पष्ट तौर पर लिखा है कि एमसीडी के मालिकाना हक़ वाली जमीनों पर बसी झुग्गी-झोपड़ी बस्तियों के पुर्नवास का काम डीयूएसआईबी का है, लेकिन इस बात का कहीं स्पष्ट उल्लेख नहीं है दिल्ली सरकार की एजेंसियों की ओर से किस तरह के तालमेल की आवश्यकता है। दिशा-निर्देशों के अनुसार, अगर एक बार ज़मीन के मालिकाना हक वाली एजेंसी ज़मीन पर अपना दोबारा दावा करना तय करती हैं तो उसे डीयूएसआईबी के साथ मिलकर सर्वेक्षण करना चाहिये। इसके बाद डीयूएसआईबी यह तय करती है कि किसे पुर्नवास मिलना चाहिये और नियमानुसार फ्लैट आवंटित करती है। हालांकि डीयूएसआईबी का एक वरिष्ठ अधिकारी ध्यान दिलाता है कि डीयूएसआईबी यह काम तभी अपने जिम्मे ले सकता है जब ज़मीन की मालकिन एजेंसी उसे झुग्गियों को खाली कराने के बारे में सूचित कर देती है। झुग्गियों को खाली कराने के बाद पुर्नवास का काम लगभग असंभव हो जाता है क्योंकि इसके बाद निवासियों का सर्वेक्षण करना बेहद उलझाऊ हो जाता है। कुल नतीजा ये है कि डीयूएसआईबी एक बड़ा और समावेशी वैधानिक जनादेश होने के बावजूद शक्तिहीन रह जाता है।

दिल्ली सरकार के विभागों के बीच तालमेल की इस कमी के चलते, यह उम्मीद करना स्वभाविक ही है कि जिन मामलों में डीडीए और रेलवे जैसी केंद्र सरकार की एजेंसियां—जिनकी ज़मीन पर दिल्ली में कई झुग्गी बस्तियां हैं—शामिल होती हैं, वे और उलझ जाते हैं। इस सन्दर्भ में फरवरी 2013 की नीति कहती है कि ऐसी केन्द्रीय एजेंसियां या तो दिल्ली सरकार की नीति के अनुसार पुर्नवास/स्थानांतरण का काम खुद कर सकती हैं या इसकी जिम्मेदारी डीयूएसआईबी को दे सकती हैं। दिल्ली की झुग्गी-झोपड़ी बस्तियां जिस ज़मीन पर स्थित हैं, उसमें से 63 फीसदी ज़मीन अकेले डीडीए और रेलवे जैसी एजेंसियों की है। यह देखा गया है कि अक्सर ये केंद्रीय एजेंसियां ऐसे खुद अकेले ही कदम उठा लेती हैं। वे निवासियों की हितों रक्षा के लिये दूसरी ज़रूरी एजेंसियों को निर्णय प्रक्रिया में शामिल नहीं करती हैं।

विभिन नीतियों की मौजूदगी
हालांकि अलग-अलग सरकारी आदेश और कानून पुर्नवास की पात्रता, पुनर्वास के योग्य निवासियों के क्या हक़ है, पुर्नवास के लिये सर्वेक्षण कैसे किया जाना है, झुग्गी-झोपड़ी बस्ती के योग्य/पात्र निवासियों के क्या अधिकार है और झुग्गियां हटाने से पहले सर्वेक्षण किस तरह करना है, के लिए मापदंडों की एक रूपरेखा देते हैं। पर ऐसा एक भी नीतिगत दस्तावेज नहीं है जिसमें झुग्गियों को खाली कराने की प्रक्रिया के बारे में बताया गया हो। संबंधित आदेशों और कानूनों की गहन समीक्षा करने के बाद ही हम उन झुग्गियों को खाली कराने की प्रक्रिया को समझ सके, जो दिल्ली सरकार की एजेंसी की ज़मीन पर मौजूद हों। हालांकि झुग्गियों को खाली कराने से पहले, इस प्रक्रिया के दौरान और उसके बाद जिन प्रक्रियाओं का पालन किया जाना चाहिये, उनका ज़िक्र अलग-अलग नीतिगत दस्तावेजों में है, लेकिन उनको एक जगह इकठ्ठा करने का कोई प्रयास नहीं किया गया है। सोनिया गांधी कैंप के निवासियों को इस नाकामी के चलते काफी नुकसान उठाना पड़ा है।  
 

निष्कर्ष

हालांकि विभिन्न नीतिगत और कानूनी दस्तावेजों में झुग्गियों को खाली कराने और उनके पुनर्वास/स्थानांतरण की प्रक्रियायें दी गयी हैं, लेकिन सोनिया गांधी कैंप के निवासी इन मौजूदा अलग-अलग प्रक्रियाओं में उलझकर रह गये हैं। झुग्गियों को हटाने और उनके पुनर्वास पर बेहद प्रगतिशील लगने वाली प्रक्रियायें जिस तरह दस्तावेजों में दिखती हैं और जिस तरह व्यवहार में लाई जाती हैं, उसमें बड़ा अंतर है। केंद्र और राज्य स्तर की विभिन्न एजेंसियां जिनकी ज़मीन पर झुग्गियां मौजूद हैं और पुनर्वास के लिए उत्तरदायी मुख्य एजेंसी, डीयूएसआईबी, को आपस में न सिर्फ मूलभूत नीति पर एक आम सहमति बनाने की आवश्यकता है बल्कि इसे लागू करने के लिये भी साझा समझ बनाने की ज़रुरत है।  
 
पोस्टस्क्रिप्ट, अप्रैल 2014
लगभग एक साल के बाद भी रास्ते के अधिकार का सीमांकन करने के लिए पीडब्ल्यूडी द्वारा बनायी गयी दीवार अपनी जगह मौजूद है। कुछ निवासियों ने दीवार के एक तरफ, जहां पर बचा हुआ सोनिया गांधी कैंप अब भी मौजूद है, अपनी झुग्गियां दोबारा बना ली हैं, जबकि बाकी अपने गांव वापस लौट गये हैं। जिस इलाके में झुग्गियों को ढहाने से पहले 40 परिवार थे, पीडब्ल्यूडी ने कंक्रीट से बने मज़बूत गमलों के भीतर फूल लगाकर वहां एक फुलवारी बना दी है।