एफ ब्लॉक में नागरिकता का नेगोसियेशन: दिल्ली की एक झुग्गी-झोपड़ी बस्ती

एफ ब्लॉक में नागरिकता का नेगोसियेशन

दिल्ली की एक झुग्गी-झोपड़ी बस्ती

सुभद्रा बाँदा, वर्षा भाइक, बिजेंद्र झा, बेन मेँडेलकर्न, और शहाना शेख़, जून 2014
इस रिपोर्ट का अनुवाद अंग्रेजी से हिंदी में अभिनव श्रीवास्तव और सोनल शर्मा के द्वारा किया गया है 1


सारांश

झुग्गी-झोपड़ी बस्तियों में रहने वाली आबादी, दिल्ली की सबसे असुरक्षित आबादियों में से एक है। अगर बेहद निचले स्तरों के आधार पर भी देखा जाये तो एफ ब्लॉक के निवासियों को राज्य से मिलने वाली सुविधाओं का स्तर बेहद खराब है। निवासी घर ढहाये जाने के खतरों के बीच जीवनयापन करते हैं। इसके अलावा उन्हें बुनियादी स्तर का वैसा राजनीतिक संरक्षण भी नहीं मिल पाता, जो बाकी असुरक्षित रिहायशी इलाकों को मिला हुआ है। यह रिपोर्ट दिखाती है कि एफ ब्लॉक निवासियों का सरकार के साथ ऐसा सम्बन्ध है जिसमे वे सरकार के सामने कमज़ोर प्रार्थी के रूप में प्रतीत होते हैं। वे कतई ऐसे नागरिक नहीं लगते जो अपने अधिकारों के आधार पर मांग कर सके । उनकी राजनैतिक कमजोरी बस्ती के ढहाये जाने जैसे खतरों के हमेशा बने रहने से स्पष्ट हो जाती है। राज्य प्रतिनिधियों, स्थानीय पुलिस और डीडीए अधिकारियों द्वारा रोज़ की जाने वाली निगरानी, उगाही और शोषण इस कमजोरी और शक्ति असंतुलन को बनाये रखते है।
 
 

इस रिपोर्ट का विषय दिल्ली की झुग्गी-झोपड़ी बस्तियां (जेजेसी) और उनमें रह रहे लोगों से जुड़े मुद्दे हैं। झुग्गी-झोपड़ी बस्तियां सार्वजनिक भूमि पर बसे हुये अनाधिकृत रिहायशी इलाके हैं। झुग्गी-झोपड़ी बस्तियां सरकार द्वारा परिभाषित सात अनियोजित रिहायशी इलाकों2 में से एक है। इन झुग्गी-झोपड़ी बस्तियों में करीब 4.2 लाख3 परिवारों4 के लोग रहते हैं, जो दिल्ली की कुल आबादी का लगभग पंद्रह फीसदी5 है।

हालांकि कई बार ‘झुग्गी-झोपड़ी बस्तियों’ की जगह ‘स्लम’ शब्द का भी इस्तेमाल कर दिया जाता है, लेकिन दिल्ली सरकार द्वारा बनायी गयी श्रेणियों और उनके अनुक्रम के अनुसार ये दोनों शब्द दिल्ली में दो अलग तरह के रिहायशी इलाकों से सम्बन्ध रखते हैं। आधिकारिक शब्दकोष के अनुसार- स्लम का सम्बन्ध स्लम डेज़ेग्नेटड एरिया (एसडीए) से है। इन क्षेत्रों का जिक्र साल 1956 के एक कानून में किया गया है। ये डेज़ेग्नेटड स्लम उस सूची का हिस्सा हैं जिसे साल 19946 से अपडेट नहीं किया गया है। इन रिहायशी इलाकों को प्रशासनिक रूप से मान्यता प्रदान कर कुछ बुनियादी सुविधायें दे दी जाती हैं। दूसरी तरफ, झुग्गी-झोपड़ी बस्तियों (जेजेसी) के वजूद को आधिकारिक तौर पर मान्यता तो मिली है, लेकिन उन्हें ‘स्लम डेज़ेगनेटेड एरियाज़’ जैसी कानूनी सुरक्षा हासिल नहीं है।इस तरह सभी अनियोजित रिहायशी इलाकों में से झुग्गी-झोपड़ी बस्तियां सबसे ज़्यादा कमज़ोर और असुरक्षित आबादी वाले इलाके हैं। हालांकि दिल्ली की झुग्गी-झोपड़ी बस्तियों (जेजेसी) में जबरदस्त अंतर हैं। इसके बावजूद इन सभी बस्तियों में जो एक समानता है, वो है वहां के निवासियों के ज़मीन पर कमज़ोर दावे, और इन बसित्यों में होने वाली बहुत सी घटनाएं ज़मीन पर इन कमज़ोर दावों से तय होती है।7 सामान्य तौर पर, ये ऐसी जगहें हैं जहाँ निवासियों को अपनी नागरिकता के अधिकार से समझौते करने पड़ते हैं, न तो उनको सार्वजनिक सेवायें हासिल हैं और न ही उनको अपनी जमीन पर सुरक्षित मालिकाना हक हासिल है।

पंजाबी बस्ती (निवासी बोलचाल की भाषा में झुग्गी-झोपड़ी समूहों को बस्ती कहते हैं) के एफ ब्लॉक के नाम से पहचाने जाने वाले हिस्से में हजारों लोग रहते हैं। यह गायत्री कालोनी8 के नाम से भी जाना जाता है। जिस जमीन पर यह बस्ती मौजूद है, वह दिल्ली विकास प्राधिकरण की है। केंद्र सरकार की इस संस्था का काम शहर के निवासियों के लिये घरों को निर्माण करना है। बस्ती का हालिया इतिहास बहुत सी ऐसी चुनौतियों, असुरक्षाओं और डरों को जाहिर करता है जिसका सामना शहर भर में झुग्गी-झोपड़ी बस्तियों में रहने वाले करते हैं। इनमें सबसे बड़ा डर और चुनौती बस्ती से जबरन बाहर किये जाने की है। साल 2011 के मार्च महीने में इस इलाके ने सबका ध्यान अपनी ओर तब खींचा जब दिल्ली पुलिस की देख-रेख में डीडीए द्वारा यहाँ के मकानों को ढहाने के लिये चल रहे अभियान के खिलाफ कुछ नागरिक संगठनों ने विरोध प्रदर्शन किया।9 बुलडोजरों द्वारा घरों के ढहने का वह मंजर एफ ब्लॉक में रहने वालों के ज़हन में आज भी ताजा है। इलाके में समुदाय के नेता बताते हैं कि यही घटना थी जिसके बाद ब्लॉक के निवासियों ने पहली बार संगठित होकर कदम उठाया। पिछले एक दशक में एफ ब्लॉक में मकानों को ढहाने की ये दूसरी घटना थी। पहली घटना साल 2001 में हुयी थी। इसके ठीक एक साल बाद डीडीए ट्रांजिट कैम्प बनाने के लिये कुछ मकानों को ढहाया गया। इससे निवासियों के मन में अपने अस्तित्व को लेकर डर फैल गया। एफ ब्लॉक निवासियों की असुरक्षा और डर को उनके और सरकारी संस्थाओं के बीच होने वाले आदान-प्रदान ज़रिये भी समझा जा सकता है। इन संस्थाओं में विभिन्न चुने हुए प्रतिनिधि, नगरपालिका परिषद, पुलिस और डीडीए जैसी एजेंसियां शामिल है।

यह लेख साल 2013 की गर्मियों में छह रिसर्चरों की एक टीम द्वारा लगातार चार महीने तक इलाके में किये गये कई दौरों का नतीजा है। यहाँ प्रस्तुत की गयी सूचना बस्ती के विभिन्न लोगों से हमारे साक्षात्कारों पर आधारित है. इसके लिये कुछ विशेष मुद्दों को ध्यान में रखते हुए प्रश्नों की एक सूची तैयार की गयी। जवाब देने वाले लोगों का चयन स्नोबालिंग सैम्पलिंग विधि से किया गया। इसमें एफ ब्लॉक निवासी, प्रधान10 (अनिर्वाचित सामुदायिक प्रतिनिधि), रेसिडेंट्स वेलफेयर एसोसिएशन(आरडब्ल्यूए) के सदस्य, निर्वाचित प्रतिनिधि और सरकारी एजेंसियों के स्टाफ कर्मचारी आदि शामिल थे। कई मामलों में लोगों द्वारा दी गयी जानकारियां परस्पर-विरोधी पायी गयीं और उन्हें ज्यों का त्यों प्रस्तुत किया गया है। बाकी जो भी निष्कर्ष दिये गये हैं, वे ऐसी बातों पर आधारित हैं, जिनका ज़िक्र लोगों ने अपने जवाबों के दौरान कई बार किया है।सभी निष्कर्ष क्वालिटेटिव रिसर्च के मानकों पर आधारित हैं।

स्थान

एफ ब्लॉक अव्यवस्थित तरीके से बनी प्रतीत होने वाली झुग्गियों का एक समूह है। ये झुग्गियां पश्चिमी दिल्ली के करोलबाग जोन स्थित बलजीत नगर (वार्ड नंबर 93) एमसीडी वार्ड की ऊँची-नीची पथरीली जमीन पर फैली हुयी हैं। बस्ती के ठीक बीचों-बीच एक गहरी खाई है। इस खाई के साथ कुछ झुग्गियां खतरनाक तरीके से एक नाले पर टिकी हुयी हैं। एक छोर पर, बड़े खेल के मैदान की दीवार झुग्गी-झोपड़ी बस्ती को पड़ोसी रिहायशी इलाकों से अलग करती है। दूसरे छोर पर झुग्गियां, हाल में बनी और बाबा फरीदपुरी को बलजीत नगर से जोड़ने वाली, कंक्रीट सड़क से घिरी हुयी हैं। बाकी छोरों पर ये झुग्गियां दूसरी अनियोजित कालोनियों (गोपाल डेयरी, तालिबस्ती, बाबा फरीदपुरी), राजस्थानी कालोनी नाम की एक अनाधिकृत कालोनी और कठपुतली कालोनी11 के निवासियों के लिये बनायी डीडीए ट्रांज़िट कैम्प से सटी हुयी है।

दिल्ली शहरी आश्रय सुधार बोर्ड (डीयूएसआईबी) के अनुमानों के मुताबिक यह रिहायशी इलाका 1492 वर्ग मीटर12 में फैला हुआ है और यहाँ 455 झुग्गियां हैं। हालांकि निवासी बताते हैं कि झुग्गियों की संख्या एक हज़ार के आस-पास हैं लेकिन ज़्यादातर झुग्गियां एक मंजिला हैं। इस बस्ती में रहने के लिये बने घरों में पत्थर या ईंट से बने एक-दो कमरे हैं। इन घरों के अंदरूनी हिस्सों में आमतौर पर प्लास्टर है, लेकिन बाहरी हिस्सों में प्लास्टर आधा-अधूरा है। कुछ निवासियों, जिनके घरों को साल 2012 में कठपुतली कालोनी ट्रांजिट कैम्प13 बनाने के लिये तोड़ दिया गया था, ने गुजारे के लिये कामचलाऊ घर बना लिये हैं, जिनकी छतें तिरपाल से ढकी हैं। निवासियों के अनुसार, इलाके के बीचों-बीच स्थित झुग्गियां 50-60 साल पुरानी हैं। जबकि बस्ती के किनारों पर बसी झुग्गियां पिछले पंद्रह सालों में बनायी गयीं हैं। बस्ती में बहुत सी दो से तीन फीट चौड़ी, उबड़-खाबड़ और कच्ची गलियाँ हैं।

बस्ती के इतिहास और इसमें रहने वाली आबादी के बारे में बहुत कम पुष्ट जानकारी उपलब्ध है। प्रधान बस्ती की उत्पत्ति की एक संभावित कहानी बताता है। आज़ादी के बाद के दशकों में यह पूरा इलाका पत्थर की खान हुआ करता था। प्रधान के अनुसार, जहाँ आज झुग्गी-झोपड़ियां हैं वहां उसके बाप-दादा और बाकी संबंधी मज़दूरों के रूप में पत्थर तोड़ने का काम करते थे। ये पत्थर, देश विभाजन के बाद आये शरणार्थियों के लिये, आस-पास के इलाकों में मकान बनाने के काम आते थे। जैसे-जैसे इलाके से सारे पत्थर तोड़ लिये गये, बचे हुये खनन स्थानों पर झुग्गियां बसने लगीं।

प्रधान के अनुसार, बहुत से नए निवासी आसपास के इलाकों की तुलना में कम किराये और घरों पर मालिकाना हक़ पाने की उम्मीद में बस्ती में आते हैं। इन आसपास के इलाकों में फरीदपुरी, बलजीत नगर और राजस्थानी कालोनी शामिल है। बाकि लोग दिल्ली के बाहरी राज्यों जैसे कि उत्तर प्रदेश, राजस्थान और बिहार से आते हैं। जनसंख्या के नज़रिए से बस्ती मिली-जुली आबादी वाली लगती है, हालांकि प्रधान बस्ती को दलित और आदिवासी बहुल इलाका बताता है।

ज़्यादातर निवासी असंगठित क्षेत्रों में काम करते हैं। पुरुष गलियों में ठेलाचालक, रिक्शा ड्राइवर, सुरक्षा गार्ड, बढ़ई, निर्माण मज़दूरों के तौर पर काम कर रहे हैं। कुछ पुरुष निर्माण कामों के लिये मेट्रो से गुड़गांव और गाजियाबाद भी जाते हैं। बस्ती से कुछ ही किलोमीटर की दूरी पर स्थित आनंद पर्बत इलाका भी काम की अन्य जगह है। महिलायें या तो फैक्ट्रियों से लाये गये कुछ बुनियादी कामों को घर पर बैठकर करती हैं या फिर पास की पटेल नगर कालोनी के मध्यम और उच्च मध्यम परिवारों में घरेलू श्रमिकों के रूप में काम करती हैं।

बस्ती की आंतरिक राजनीति पर दो पक्षों का वर्चस्व है- प्रधान और रेसिडेंट्स वेलफेयर एसोसिएशन(आरडब्ल्यूए)। बाहरी लोग और बस्ती के निवासी, दोनों ही प्रधान को समुदाय के प्रतिनिधि के तौर पर जानते हैं। अपनी बहुत सी समस्याओं के समाधान के लिये वह प्रधान से ही सम्पर्क करते हैं। प्रधान अनिर्वाचित है और उसे अपने काम का कोई निर्धारित मुआवजा नहीं मिलता है। प्रधान ‘अम्बेडकर बस्ती विकास संगठन’ नाम के एक समुदाय आधारित संगठन(सीबीओ) का प्रमुख और ‘नेशनल कैम्पेन फार दलित ह्यूमन राइट्स’ (एनसीडीएचआर) का सक्रिय कार्यकर्ता भी है।

दिल्ली के रिहायशी इलाकों में, चाहे वे नियोजित हों या अनियोजित, रेसिडेंट्स वेलफेयर एसोशियेशन (आरडब्ल्यूए) की एक सामुदायिक संस्था के रूप में मौजूदगी बहुत आम है। एफ ब्लॉक की आरडब्ल्यूए का पंजीकरण साल 2008 में हुआ था। इसके चार पदाधिकारी हैं जो प्रधान की तरह ही निर्वाचित प्रतिनिधियों और सरकारी एजेंसियों के अधिकारियों के साथ बातचीत में समुदाय के प्रतिनिधि के बतौर काम करते हैं।14 आरडब्ल्यूए और प्रधान के बीच कुछ तनाव रहता है। प्रधान ने आरडब्ल्यूए में पहले कार्यालय भी संभाला है। प्रधान ने जातिगत राजनीति को आरडब्ल्यूए के साथ अपने मतभेदों के लिये ज़िम्मेदार माना। हालांकि आरडब्ल्यूए अधिकारियों ने बताया कि प्रधान से उनके वैचारिक मतभेद हैं, लेकिन पानी, साफ़-सफाई और निवासियों को जबरन निकाले जाने के खिलाफ दोनों ने मिलकर आवाज उठायी है।

अन्य झुग्गी-झोपड़ी बस्तियों की तरह, एफ ब्लॉक में भी ज़मीन पर अस्पष्ट अधिकार होने की वजह से निवासियों का रोजमर्रा का जीवन चुनौतीपूर्ण बन जाता है। भूमि अधिकार स्पष्ट न होने के कारण झुग्गियों को खरीदने और उन्हें किराये पर देने के कार्य पावर आफ अटार्नी (वकालतनामे) के ज़रिये किये जाते हैं। इसे जनरल पावर आफ अटार्नी (जीपीए)15 भी कहा जाता है। निवासी बताते हैं कि खरीददार और विक्रेता बनकर वे जीपीए यानि वकालतनामा तैयार करने में एक दूसरे की मदद करते हैं। इस तरह संपत्ति की वास्तविक अदला-बदली किये बगैर उन्हें मकान पर कानूनी दावा करने और पहचान से जुड़े दस्तावेज16 तैयार करने का हक़ मिल जाता है। यहां मुख्य रूप से यह ध्यान देना जरूरी है कि ये पूरा लेन-देन स्टैम्प पेपर पर होता है और इसमें अन्य तरह की कागजी कार्यवाही शामिल होने के बावजूद, इससे बिक्रीनामे में संपत्ति संबंधी अधिकारों का कोई स्थानान्तरण नहीं होता है।

एफ ब्लॉक निवासी अपनी ही जमीन के मालिकाना हक़ और उसकी कानूनी स्थिति को लेकर आम तौर पर अनिश्चित रहते हैं।17 ज़्यादातर समझते हैं कि जिस जमीन पर उनकी झुग्गियां बनी हैं, उस पर उनका कोई अधिकार नहीं है। वे जोर देकर बताते हैं कि जब तक उन्होंने जमीन पर कोई निर्माण कार्य कर उसे रहने लायक नहीं बनाया था, तब तक किसी सरकारी संस्था ने उस पर अपना दावा नहीं किया। बस्ती में एक हिस्से में रह रहे कुछ लोग याद करते हैं कि साल 1996 में, उनके यहाँ बसने से पहले, यह एक निर्जन जंगली इलाका था और आस-पड़ोस के निवासी यहाँ खुले में मलत्याग करते थे। एफ ब्लॉक के इस हिस्से में सबसे पहले आने का दावा करने वाली एक महिला याद करती है कि तब यह इलाका खतरनाक था। उसे अपनी सुरक्षा के लिये दो कुत्ते साथ में रखने पड़ते थे। बरसात के मौसम में इस पूरे इलाके में घुटनों तक पानी भर जाता था। उसने हमें बताया कि इन स्थितियों और चुनौतियों के बावजूद शुरुआत में बसने वालों ने जमीन को साफ़ कर इसे रहने लायक बनाया। हाल में इस जमीन पर किये जा रहे दावों की ओर इशारा करते हुये वह कहती है- तब डीडीए कहाँ था? हमने यहाँ रहने के लिये पूरी ईमानदारी और मेहनत से काम किया है।

एक पंद्रह वर्षीय लड़की ने अपने परिवार के एफ ब्लॉक में आने की कहानी हमें बतायी। एक प्रकार से उसकी कहानी यहाँ नये बसे बहुत से निवासियों की कहानी है। वह बताती है कि पड़ोस के बाबा फरीदपुरी में किराये के मकान में रहते हुये वे तंग आ गये थे। उन्होंने किसी से एफ ब्लॉक की झुग्गियों के बारे में सुना, जिन पर मालिकाना हक भी हासिल किया जा सकता था। यह सुनकर उन्होंने एफ ब्लॉक में आना तय किया। इस लेन-देन के लिए किसी बिचौलिये की भी जरुरत नहीं पड़ी। झुग्गी-मालिक के बैंक खाते के ज़रिये परिवार ने उससे सीधे संपर्क किया और मोतीनगर में नोटरी की मदद से एक जीपीए का पंजीकरण करा दिया। हालांकि झुग्गी ‘विक्रेता’ कभी-कभी एफ ब्लॉक आता था, लेकिन वह वहां रहता नहीं था।

हालांकि इस पूरे विवरण से निवासियों के एक बड़े समूह के इस नज़रिये की झलक मिलती है कि एफ ब्लॉक में संपत्ति पर किसी एजेंट या समूह का कोई कब्जा नहीं है, लेकिन निवासियों के एक दूसरे समूह ने भू-माफिया सक्रिय होने की बात कही। उन्होंने बताया कि ये भू-माफिया निर्वाचित प्रतिनिधियों, पुलिस और निजी ठेकेदारों के आपसी गठजोड़ के ज़रिये काम करते हैं। ज़ोर-ज़बरजस्ती या हिंसा का इस्तेमाल कर स्थानीय गुंडे इलाके के जमीन पर कब्ज़ा करते हैं और नये निवासियों को प्रति महीना किराये पर या एक मुश्त 30,000- 40,000 रुपये लेकर जमीन दे देते हैं। यह तय करना कठिन है कि इन दोनों विवरणों में कौन ज़्यादा प्रमाणिक और सही है। संभव है कि ब्लॉक में दोनों ही तरह की मिली-जुली स्थितियां हों।

हालांकि भू-माफियाओं का होना बस्ती में फैले अस्पष्ट भू-स्वामित्व कानूनों और प्रावधानों का सिर्फ एक प्रभाव है। पुलिस और अन्य सरकारी अधिकारी बुनियादी सुविधाओं को मुहैया कराने के बदले,झुग्गियों को ढहाने का भय दिखाकर अक्सर पैसा वसूलते (रेंट सीकिंग) रहते हैं। दिल्ली में झुग्गी-झोपड़ियों में रह रहे लोगों की तरह ही एफ ब्लॉक निवासी भी बुनियादी अधिकारों और सुविधाओं के लिये अधिकारियों और बिचौलियों से सौदेबाजी करने को मजबूर हैं। रिपोर्ट के अंतिम दो हिस्सों में इसका गहराई से वर्णन किया गया है।

बुनियादी सुविधाएं

पानी

दिल्ली की झुग्गी-झोपड़ियों में स्त्रोत, कीमत, मात्रा और गुणवत्ता के आधार पर पानी का वितरण बदलता रहता है। झुग्गी-झोपड़ी बस्तियों के निवासी दिल्ली जल बोर्ड के पानी टैंकरों, पाइप द्वारा आने वाला पानी जों कई परिवार मिलकर इस्तेमाल करते हैं, और सार्वजनिक या निजी बोरवेल18 समेत विभिन्न स्त्रोतों से अपनी पानी की आवश्यकता पूरी करते हैं। इसके अलावा जन शौचालय केन्द्रों पर लगे पानी के नल, निजी कंपनियों के पानी टैंकर, आस-पास के इलाकों में लगे बोरवेल भी पानी की जरूरतों को पूरा करते हैं।

पानी के वितरण की देख-रेख और व्यवस्था दिल्ली जल बोर्ड (डीजेबी) के जिम्मे है।19 यह झुग्गी-झोपड़ियों (जेजेसी) समेत दिल्ली के तीन नगरनिगमों के कार्यक्षेत्र के तहत आने वाले इलाकों में पानी की आपूर्ति सुनिश्चित करने वाली नोडल एजेंसी है। वास्तव में, दिल्ली जल बोर्ड यह दावा करता है कि वह हर इलाके में पानी आपूर्ति सुनिश्चित करेगा, भले ही कानूनन वह इलाका वैध हो अथवा अवैध।20 लेकिन इस प्रावधान को लागू करने की व्यवस्था का विवरण उसकी नीति में कहीं भी नहीं है। किसी निश्चित ढांचे और कार्यप्रणाली के नहीं होने के कारण दिल्ली जल बोर्ड स्टाफ कई तरह की व्यवस्थाओं/तरीकों के ज़रिये शहर के झुग्गी-झोपड़ी बस्तियों में पानी वितरण का इंतज़ाम करता है।

ज़्यादातर झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वालों की तरह ही, एफ ब्लॉक निवासी भी कामचलाऊ तरीकों से पानी की जरूरतें पूरी करते हैं। झुग्गी-झोपड़ी बस्तियों (जेजेसी) में पाइपों के ज़रिये पानी की आपूर्ति का प्रावधान नहीं है। यहां कोई सार्वजनिक बोरवेल भी नहीं है। हमारे साथ बातचीत में, एफ ब्लॉक निवासियों ने पानी के तीन प्रमुख स्त्रोत बताये- दिल्ली जल बोर्ड टैंकर, बोर वेल और पड़ोसी कालोनियों के घरों से।

एफ ब्लॉक से सबसे नज़दीक बोरिंग होली चौक और फरीदपुरी कालोनियों के हैं, लेकिन यहां का पानी खारा होता है, इसलिये ज़्यादातर लोग इसका उपयोग घरेलू कामकाज करने में करते हैं। बस्ती की रेसिडेंट्स वेलफेयर एसोसिएशन के कोषाध्यक्ष के अनुसार, एफ ब्लॉक समेत पूरी पंजाबी बस्ती के लिये साल 2013 में सरकार की ओर से 6-8 बोरवेल मंजूर किये गये थे। निवासियों को लगा कि इनमें से किसी एक बोरिंग के पानी का इस्तेमाल वे अपने लिये कर सकेंगे। सरकारी वादों के बावजूद, इलाके में खोदे गये 4-5 बोरिंग खास तौर पर ट्रांज़िट कैंप की सेवाओं के लिये निर्धारित कर दिये गये। इस कैंप को कठपुतली कालोनी के निवासियों के लिये अस्थायी ठिकाने के तौर पर लगाया गया था। ये निवासी दिल्ली के पहले स्लम पुर्नवास प्रोजेक्ट के कारण विस्थापित हुये थे।

एफ ब्लॉक में, दिल्ली जल बोर्ड के टैंकरों से पानी का वितरण दो तरीकों से किया जाता है। पहले तरीके के हिसाब से, पानी को अनौपचारिक रूप से बनाये गए आठ से दस घरों के समूह में वितरित किया जाता है। समूह में प्रत्येक घर को ‘मेम्बर’ कहा जाता है। दूसरे तरीके में, ‘पहले आओ, पहले पाओ’ के आधार पर बेतरकीब ढंग से पानी का वितरण किया जाता है।

झुग्गी-झोपड़ी समूहों के लिये दिल्ली जल बोर्ड की टैंकर सेवा का इस्तेमाल करने के लिये एफ ब्लॉक निवासी नजदीकी दिल्ली जल बोर्ड कार्यालय के अधिकारियों के पास पहुंचे। आठ से दस परिवारों के लिये उन्होंने अपने वोटर पहचान पत्र आवेदन के साथ कार्यालय में जमा किये। निवासियों ने इसे टैंकर सेवा का ‘पास’ (मंजूर) होना कहा। साथ-साथ उन्होने बताया कि कार्यालय स्टाफ के ज़रिये उन्होने दिल्ली जल बोर्ड के अधिकारियों को 4000-5000 रुपये दिये। इन रुपयों की उन्हें कोई पर्ची नहीं मिली। यहां इस बात पर ज़ोर देना आवश्यक है कि इस प्रक्रिया के बावजूद आम तौर पर यह माना जाता है कि दिल्ली जल बोर्ड झुग्गी-झोपड़ी बस्तियों को अपनी सेवायें मुफ्त दे रहा है।

हर सात से दस दिनों के अंतर पर, ‘मेम्बर’ परिवारों को 1,500-2,000 लीटर क्षमता वाले टैंकर से लगभग 200 लीटर पानी मिलता है। टैंकरों के आने का कोई निश्चित समय नहीं है और कुछ निवासियों ने बताया कि प्रत्येक समूह को हर बार टैंकर ड्राइवर को 50 रुपये देते पड़ते हैं। वहीं आरडब्ल्यूए के सदस्यों का दावा है कि ‘मेम्बर समूह टैंकर ड्राइवर को 200-300 रुपये तक देते हैं। सामान्य तौर पर, टैंकर ड्राइवर को पैसे देने में निवासियों को कोई परहेज़ नहीं है। निवासियों को लगता है कि ड्राइवर बस्ती आकर उन पर एहसान कर रहा है और वे उसे उसकी कीमत दे रहे हैं। निवासी ठीक-ठीक यह तो नहीं बता सके कि कितने टैंकर झुग्गी-झोपड़ी बस्तियों में अपनी सेवायें देते हैं, लेकिन उन्होने यह ज़रूर बताया कि कालोनी में लंबे समय से रह रहे आधे से ज़्यादा निवासी इसी तरीके से पानी का इस्तेमाल करते हैं। इस व्यवस्था के ज़रिये प्रत्येक परिवार को प्रति सप्ताह दो सौ लीटर पानी मिल पाता है। हालांकि निवासियों के अनुसार प्रत्येक परिवार को हर दिन 200 लीटर पानी की जरूरत पड़ती है। (वास्तव में इतना पानी भी प्रति दिन आवश्यक पानी के निर्धारित मानकों से काफी कम है। तय मानकों के अनुसार प्रत्येक परिवार को 750-1,000 लीटर या 150-200 लीटर पानी प्रति व्यक्ति प्रति दिन मिलना चाहिये।)21 पानी की कमी वजह से, निवासी पानी का बहुत ध्यान से उपयोग करते है तथा इलाके में पानी के नए-नए स्त्रोतों को भी ढूंढते रहते हैं।

एफ ब्लॉक के बाकी ‘नॉन-मेंबर’ परिवारों को ‘पहले आओ पहले पाओ’ की व्यवस्था के आधार पर पानी मिलता है। बस्ती की इस आबादी को पानी देने के लिये प्रति सप्ताह दो टैंकर आते हैं। इन नॉन-मेम्बर परिवारों में, बस्ती में चार या पांच साल पहले आकर बसे हुये परिवार शामिल होते हैं। निवासियों के अनुसार, इन परिवारों को दिल्ली जल बोर्ड टैंकर से चालीस लीटर पानी पंद्रह रुपये की दर से मिलता है। प्रधान बताता है कि इस तरह करीब 200 लोगों या चालीस परिवारों को टैंकर से पानी मिल पाता है। इन टैंकरों से पानी भरने के दौरान काफी अफरा-तफरी मच जाती है।

आमतौर पर, दिल्ली के झुग्गी-झोपड़ी बस्तियों में पानी के टैंकर पहुंचने पर अफरा-तफरी फैल जाती है। जैसे ही टैंकर पहुंचता है, बच्चे और बड़े उसकी ओर भागने लगते हैं। अलग-अलग रंगों और आकार के अनगिनत प्लास्टिक केन, कंटेनरों के झुंड झुग्गियों में नजर आने लगते हैं। इस दौरान पहले पानी लेने की जल्दबाज़ी में जमकर धक्का-मुक्की भी होती है। टैंकर के बस्ती से जाते समय भी ऐसी ही अफरा-तफरी फैलती है। लोग टैंकर पर चढ़ जाते हैं। टैंकर अपने पीछे पाइप में जमा हुआ कचरा बस्ती में ही छोड़ जाता है।

टैंकर के पानी की अपर्याप्त आपूर्ति की भरपाई के लिये ‘मेम्बर’ और ‘नॉन-मेम्बर’, दोनों ही समूह बोरवेल और आस-पास के इलाकों के परिवारों पर आश्रित रहते हैं। आम तौर पर यह पानी मुफ्त में मिलता है, हालांकि निजी नलों के मालिक चालीस लीटर पानी के लिये कभी-कभी चार रुपये लेते हैं। गर्मियों में, निवासी नजदीक स्थित राजस्थानी कालोनी के पड़ोसियों से भी पानी देने का आग्रह करते हैं। प्रधान के अनुसार, इसके बदले में निवासियों को कभी-कभी पड़ोसी कालोनी के अपेक्षाकृत धनिक परिवारों से अपमान भी सहना पड़ता है। कई बार वे पानी देने से मना भी कर देते हैं।

पानी टैंकरों के आने का कोई निश्चित समय न होना और पर्याप्त पानी के लिये लगातार ज़्यादा खर्च झेलना, निवासियों के लिये चिंता की वजह बने रहते हैं। ‘मेम्बर’ और ‘नॉन-मेम्बर’, दोनों ही परिवार ज़ोर देकर बताते हैं कि ब्लॉक में टैंकर के दौरे को नियमित करने के लिये उन्हें लगातार फोन करने पड़ते हैं। गर्मियों के महीनों में, टैंकर ड्राइवर को प्रति दौरे पर दी जाने वाली राशि 500 रुपये तक भी हो जाती है।

एक महिला निवासी ने बताया कि प्रत्येक परिवार अपनी मासिक आय का एक बड़ा हिस्सा (1000 रुपये प्रति महीना) पानी पर ही खर्च करता है। चूंकि एफ ब्लॉक निवासी विभिन्न स्त्रोतों से पानी लेते हैं, इसलिये इस पर कोई एक राय नहीं दी जा सकती कि कौन परिवार पानी पर कितना खर्च करता है। लेकिन इससे हमें यह समझ अवश्य आता है कि बस्ती निवासियों के लिये पानी एक महत्वपूर्ण खर्च है। इसी महिला ने हमें बताया कि टैंकरों के आने की अनिश्चितता से न सिर्फ बड़ों को असुविधा होती है, बल्कि इससे स्कूल जाने वाले बच्चों को भी दिक्कत का सामना करना पड़ता है। इसके चलते कई बार उन्हें अपने क्लासें छोडनी पड़ती हैं और पानी इकट्ठा करने के लिये घर में रुकना पड़ता है।

साफ़-सफाई: शौचालय, नालियां और कूड़ा निपटान प्रबंधन
दिल्ली के झुग्गी-झोपड़ी समूहों में साफ़-सफाई का इंतज़ाम तीन सरकारी एजेंसियां करती हैं। दिल्ली में सीवर लाइनों के निर्माण और उनकी देख-रेख का जिम्मा दिल्ली जल बोर्ड का है।झुग्गी-झोपड़ी समूहों में निवासियों के लिये शौचालयों के निर्माण और देख-रेख की ज़िम्मेदारी डीयूएसआईबी की है। नालियों का निर्माण डीयूएसआईबी जबकि उनकी देख-रेख नगरनिगम परिषद करती है। कूड़ा प्रबंधन का काम सम्बंधित दिल्ली नगरनिगम के कार्यक्षेत्र में आता है(उत्तरी, दक्षिणी या पूर्वी)।

एफ ब्लॉक में कोई स्थायी सीवर ढांचा नहीं है। साल 2000 तक निवासी बस्ती से सटे खेल मैदान में झाड़ियों में मलत्याग के लिये जाते थे। लगभग एक दशक पहले एक दीवार बनाकर मैदान की घेरा-बंदी कर दी गयी, जिसकी वजह से निवासी अब इस मैदान में मलत्याग नहीं कर सकते। इसके बाद निवासियों ने सामुदायिक शौचालय सेवाओं (सीटीसी) का इस्तेमाल करना आरम्भ कर दिया। सीटीसी में एक शौचालय महिलाओं के लिये है और दूसरा पुरुषों के लिये। बच्चे और महिलायें एक बार इसका इस्तेमाल करने पर एक रुपया देते हैं जबकि पुरुषों को दो रुपये देने होते हैं। इन शौचालयों का रख-रखाव आरम्भ में एमसीडी स्लम और जेजे विभाग करता था, लेकिन अब यह कार्य छोटे ठेकेदार करते हैं।22 साक्षात्कारों में निवासियों ने शौचालयों में सफाई और पानी की कमी की जमकर शिकायत की। उन्होंने बताया कि कैसे लम्बे समय तक एक महिलाओं के लिए बने शौचालय का दरवाजा टूटा रहा और ह्यूमन राइट्स एंड लॉ नेटवर्क (एचआरएएन) के एक सदस्य के दखल के बाद वह ठीक हो सका।

बीते सालों में कुछ आर्थिक रूप से मजबूत निवासियों ने घरों में निजी शौचालय बनवा लिये हैं। प्रधान के अनुसार बस्ती में लगभग आधे घरों में स्टोरेज पिट (ऐसे गड्ढे जिनमें शौचालय से निकलने वाला मल इकठ्ठा होता रहे) वाले शौचालय मौजूद हैं। इन स्टोरेज पिटों को एक सक्शन मशीन की सहायता से खाली किया जाता है। निवासी बताते हैं कि पानी की कमी के चलते इन शौचालयों का इस्तेमाल ज़्यादातर रात में अथवा आपात स्थिति में ही किया जाता है।

एफब्लॉक दौरों के दौरान हमने देखा कि बस्ती में नालियां नहीं हैं। इस बात की पुष्टि निवासियों ने भी की। उन्होंने शिकायत करते हुये बताया कि इसके चलते मानूसन के दौरान बार-बार जलभराव जैसी समस्याएं होती हैं।

झुग्गी-झोपड़ी बस्तियों (जेजेसी) समेत अपने कार्यक्षेत्र के भीतर आने वाले क्षेत्रों से कूड़े को इकट्ठा करने और उसके निपटारे के लिये तीनों नगरनिकाय ज़िम्मेदार हैं।23 निर्धारित ढलाव से कूड़ा इकठ्ठा करने की ज़िम्मेदारी हर निकाय की है। हालांकि घर-घर जाकर कूड़ा इकट्टा करना किसी भी निकाय के कार्यक्षेत्र में नहीं आता है। नियोजित कालोनियों में, इस कार्य के लिये आरडब्ल्यूए निजी इंतज़ाम कर लेती है। हालांकि एफ ब्लॉक की अपनी आरडब्ल्यूए है, फिर भी निवासियों ने बताया कि कूड़े के निपटारे और उसे इकट्ठा करने की कोई गतिविधि यहाँ नहीं चलती है। एमसीडी ने बस्ती में कूड़ा फेंकने के लिये न तो कूड़ेदान दिये हैं और न ही कूड़ा फेंकने की जगहें निर्धारित की हैं। निवासियों के अनुसार, बस्ती में कूड़े के निपटारे के लिये कोई औपचारिक इंतज़ाम नहीं है। एमसीडी का एक ट्रक यहाँ से गुजरता है। निवासी यह मानते हैं कि अगर ट्रक रूकता है तो इसमें वे कूड़ा फेंक सकते हैं। झुग्गी-झोपड़ी समूहों समेत शहर के सार्वजनिक स्थानों, गलियों और नालियों आदि की सफाई के लिये नगरपालिका परिषद को सफाई कर्मचारी मुहैया कराने चाहिये। एफ ब्लॉक निवासियों ने बातचीत में बताया कि हाल-फिलहाल इलाके की सफाई के लिये एक भी कर्मचारी नगरपालिका परिषद की ओर से नहीं आया है।

बिजली
नयी दिल्ली नगर निगम और कैंटोनमेंट क्षेत्रों को छोड़ पूरी दिल्ली में साल 2002 में बिजली वितरण का काम साझा रूप से दिल्ली सरकार और निजी कम्पनियां संभालने लगीं। बिजली आपूर्ति का जिम्मा तीन वितरण कंपनियों को दिया गया था- इनमें पहली टाटा समूह की टाटा पावर डेल्ही डिस्ट्रीब्यूशन लिमिटेड (टीपीडीडीएल) है। बीएसईएस राजधानी पावर लिमिटेड (बीआरपीएल) और बीएसईएस यमुना पावर लिमिटेड (बीवाईपीएल) दो अन्य कम्पनियां हैं, जो रिलायंस अनिल धीरूभाई अम्बानी समूह की हैं। दिल्ली विद्युत नियामक प्राधिकरण (डीईआरसी) बिजली की दरें तय करता है।24 एफ ब्लॉक में बिजली वितरण की व्यवस्था को समझने के लिये हमने प्रधान से मिली सूचनाओं पर भरोसा किया है और इन सूचनाओं को निवासियों से पुष्ट किया है। तीन मुख्य रास्तों के ज़रिये एफ ब्लॉक निवासियों तक बिजली पहुँचती है- वैध मीटरों के ज़रिये, बिजली के मुख्य कनेक्शन से चोरी करके(तार डालकर) और पड़ोसियों से बिजली साझा करके। एफ ब्लॉक की ज़्यादातर झुग्गियों में बीएसईएस राजधानी पावर लिमिटेड द्वारा साल 2006 के आस-पास लगाये गये मीटर हैं। हर परिवार की जरूरतों के अनुसार बीएसईएस के बिल बदलते हैं, लेकिन सामान्यतः ये 300-1,600 रुपये प्रति माह के बीच रहते हैं। जो लोग पड़ोसियों से बिजली उधार लेते हैं वे ज़्यादातर नये बसे हुये लोग होते हैं और इसके लिये वे पड़ोसियों को प्रति महीना एक निश्चित रकम देते हैं। निवासी बताते हैं कि साल 2002 में निजीकरण के बाद बिजली की आपूर्ति नियमित रही है।

बिजली चोरी/टैपिंग निजी ठेकेदार (संभवतः यह ठेकेदार बीएसईएस का रात में आने वाले चौकीदार होता है) की मदद से की जाती है। यह ठेकेदार बिजली को मुख्य कनेक्शन से बस्ती के पास के किसी पाइंट पर ले आता है। जिसको भी बिजली की जरुरत होती है, वह अपना तार खरीदकर इस पाइंट से बिजली अपने घर तक ले जाता है। इस तरीके से बिजली लेने के लिये लोग हर महीने ठेकेदार को 100-250 रुपये देते हैं।

निवासी इस वास्तविकता को स्वीकार कर चुके हैं कि हर दो महीने पर बीएसईएस बस्ती पर छापा मारकर अवैध चोरी के लिये इस्तेमाल होने वालों तारों को जब्त कर लेती है।25 कुछ ही दिन बाद वही ठेकेदार नये तार बाँट देगा जो अपने खर्चे पर बिजली के खम्बों से जोड़े जा सकते हैं। निवासियों को यह आशंका है कि ठेकेदार और वितरण कंपनियों के बीच साठ-गाँठ है। वे मानते हैं कि उन्हें जब्त किया हुआ तार ही दोबारा दे दिया जाता है। हर अवैध कनेक्शन के लिये लोग 250 रुपये देते हैं। ये ठेकेदार बीएसईएस को कमीशन भी देते हैं। निवासियों को सामान्यतः इससे कोई दिक्कत नहीं होती। एक ने बताया- कोई दफ्तर में पैसा देता है, कोई कहीं और। क्या फर्क पड़ता है?

पहचान पत्र
भारत में रह रहे किसी भी व्यक्ति के लिये पहचान पत्रों का होना बहुत आवश्यक है। गैस कनेक्शन और मोबाइल फोन से सरकार द्वारा दिये जा रहे लाभों को उठाने और अन्य रोजमर्रा के कामों के लिये पहचान पत्र आवश्यक है। अपनी पहचान और अपना पता, दोनों के सत्यापन के लिये पहचान पत्र की आवश्यकता पड़ती है।झुग्गी-झोपड़ी बस्तियों (जेजेसी) जैसे अस्पष्ट भू-स्वामित्व वाली जमीनों में अक्सर निवास पहचान पत्र हासिल करना सबसे महत्वपूर्ण और सबसे कठिन होता है। बहुत सारी बुनियादी सुविधाएं इसकी वजह से ही बाधित हो जाती हैं।

निवास प्रमाण के लिये तीन तरह के पहचान पत्र स्वीकार किये जाते हैं-

वोटर पहचान पत्र
अट्ठारह वर्ष से ऊपर का भारत का कोई भी निवासी या अनिवासी नागरिक को वोट डालने और वोटर पहचान पत्र रखने योग्य है।

आधार कार्ड
साल 2007 में भारत सरकार ने सोलह अंकों की पहचान संख्या (यूआईडी) वाले बहुउद्देशीय पहचान कार्ड जारी करने शुरू किये। सैद्धांतिक तौर पर आधार कार्ड को धारक की पहचान साबित करने और उसे सभी सरकारी लाभ और सेवाओं को हासिल देने के लिये इस्तेमाल किया जा सकता है। हालांकि साल 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया है कि किसी भी सेवा को हासिल करने के लिये आधार कार्ड अनिवार्य शर्त नहीं हो सकता।

राशन कार्ड
रियायती दरों पर सार्वजनिक वितरण प्रणाली के ज़रिये अनाज और अन्य आवश्यक सामान लेने के लिये राशन कार्ड इस्तेमाल होते हैं। अनाज और अन्य आवश्यक सामान ‘फेयर प्राइज़’ दुकानों के नेटवर्क के ज़रिये दिया जाता है। आय के अनुसार लोगों को विभिन्न राशन कार्ड वितरित किये गये हैं।

अपने बच्चों के स्कूल प्रमाण पत्र के अलावा एफ ब्लॉक में रह रहे लोगों के लिये वोटर पहचान पत्र ही सबसे स्वीकार्य पहचान प्रमाण है। कुछ निवासियों ने बताया कि वोटर पहचान पत्र लेने के लिये उन्होंने एक अधिकारी विशेष को एक हजार रुपये की घूस दी। निवासी घूस देने की बात को तुरंत स्वीकार करते हैं। कुछ बेहद गरीब परिवार घूस नहीं दे पाते और इसके चलते अक्सर उन्हें वोटर पहचान पत्र नहीं मिल पाता है। आधार कार्ड प्रोग्राम को मिली अपार लोकप्रियता के बावजूद कुछ ही एफ ब्लॉक निवासियों के पास आधार कार्ड है। कार्ड के बायोमीट्रिक मापन के लिये नजदीकी पटेल नगर में साल 2013 में एक कैम्प लगा था। निवासी हालांकि बताते हैं कि किसी भी सरकारी कार्यालय में निवास या पहचान के प्रमाण के तौर पर आधार कार्ड स्वीकार नहीं किया जाता है।

परिवारों को राशन कार्ड उनकी आय के अनुसार दिया जाता है।(गरीबी रेखा से नीचे अथवा ऊपर)। हम यह पता नहीं कर पाये कि कितने परिवारों के पास राशन कार्ड हैं और कितनों के पास नहीं।

निवासियों के पास विभिन्न तरह के कितने पहचान पत्र हैं और निवासियों का हर समूह इसका अलग-अलग अनुमान व्यक्त करता है। प्रधान और कुछ निवासियों के अनुसार लगभग 50 फीसदी मतदाताओं के पास वोटर पहचान पत्र है। झुग्गी-झोपड़ी बस्तियों (जेजेसी) के परिवारों में से सिर्फ 20 फीसदी के पास राशन कार्ड हैं। प्रधान बताता है कि 75 फीसदी निवासियों के पास आधार कार्ड के पंजीकरण की पर्ची है, लेकिन एक निवासी ने बताया कि केवल 20 प्रतिशत लोगों को आधार कार्ड मिलें है। आरडब्ल्यूए के सदस्य बताते हैं कि लगभग 80 फीसदी योग्य मतदाताओं के पास वोटर पहचान पत्र हैं।
जन सुविधायें

झुग्गी-झोपड़ी समूहों में सरकारी सुविधायें नहीं है। एफ ब्लॉक में स्ट्रीटलाइट्स नहीं हैं। नजदीकी बस स्टाप और मेट्रो स्टेशन ब्लॉक से लगभग एक किलोमीटर दूर, पटेल नगर और शादीपुर में हैं। ज़्यादातर लोग पैदल जाते हैं या रिक्शा लेते हैं। नजदीकी सरकारी प्राथमिक और उच्चतर स्कूल पश्चिम पटेल नगर में एक दो किलोमीटर की दूरी पर हैं।सबसे नजदीकी सरकारी अस्पताल ‘एसवीपी’ पटेल नगर में है। बस्ती में कोई भी सामुदायिक केंद्र या राशन केंद्र नहीं हैं।

नागरिकता का नेगोसियेशन

बस्ती के तोड़े जाने के हालिया अनुभवों ने उस राजनीतिक ताने-बाने को एकाएक सतह पर ला दिया, जिनसे एफ ब्लॉक जैसी झुग्गी-झोपड़ी बस्तियों के निवासियों का जीवन प्रभावित होता है। इस ब्लॉक का इतिहास समझने के लिये दिल्ली के राजनीतिक और कानूनी अनुक्रम में भय और असुरक्षा की स्थितियों के बीच बसे इन इलाकों पर एक नजर डालनी होगी। 23 मार्च, साल 2011 की सुबह को एफ ब्लॉक के निवासियों और उनके घरों को ढहाने के लिये पांच बुलडोज़रों और पुलिस के बड़े जत्थों के साथ डीडीए अधिकारी पहुंचे। जांच-रिपोर्टें बताती हैं कि लगभग 600 झुग्गियों को ढहा दिया गया।26 साठ के दशक से ही दिल्ली में झुग्गी-झोपड़ी बस्तियों को खाली कराने और ढहाने की घटनायें आम रही हैं। तब से लेकर अब तक, ऐसे पूरे-के-पूरे दौर आये हैं और छुट-पुट घटनायें घटी हैं जिनमें झुग्गी-झोपड़ी बस्तियों को तोड़ा गया है. बस्तियों को तोड़ने की ऐसी घटनाएं अक्सर अनदेखी रही हैं, लेकिन मार्च 2011 को एफ ब्लॉक में हुयी यह घटना न केवल इस बस्ती के लिये, बल्कि दिल्ली की सभी झुग्गी-झोपड़ी बस्तियों के लिये महत्वपूर्ण साबित हुई।

अधिकारों के लिये लड़ने वाले समूह से जुड़े बस्ती के एक निवासी ने सामाजिक कार्यकर्ताओं को इस बारे में सूचित किया। कार्यकर्ता तुरंत ही घटनास्थल पर पहुंचे और उन्होंने निवासियों के पक्ष से काम करना शुरू कर दिया। झुग्गियों को गिराये जाने की प्रक्रिया के बीच कुछ आवास अधिकार कार्यकर्ताओं की मदद से ह्यूमन राइट्स लॉ नेटवर्क (एचआरएलएन) ‘स्टे’( मकान ढहाने संबंधी प्रक्रिया पर रोक लगाने का आदेश) लेने के लिये अदालत पहुंचा। शाम तक अदालत ने ‘स्टे’ आदेश दे दिया, लेकिन तब तक 600 झुग्गियों को ढहाया जा चुका था। अदालत ने प्रभावित समुदाय की मदद के लिये एक के बाद एक कई अंतरिम आदेश जारी किये- डीडीए को पीने के पानी, साफ़-सफाई, रहने की अस्थायी व्यवस्था और स्वास्थ्य सेवायें संबंधी निर्देश दिये गये। बस्तियों को ढहाये जाने वाले दिन से जो कानूनी प्रक्रिया शुरू हुयी थी, वह अदालत के इस आदेश के साथ खत्म हुयी कि बस्ती के निवासियों का पुनर्वास करने के लिये इलाके का विस्तृत सर्वेक्षण किया जाये। हालांकि अदालत के आदेश की आधे-अधूरे ढंग से व्याख्या की गयी और उन्हीं घरों का सर्वेक्षण हुआ जिन्हें तोड़ दिया गया था। इसने बहुत से निवासियों और कार्यकर्ताओं को सकते में डाल दिया। उन्हें इस बात पर आश्चर्य हुआ की क्या केवल उन्हीं घरों को पुर्नवासित किया जायेगा जिनका सर्वेक्षण हुआ है, बाकी हजारों लोग क्या बेघर हो जायेंगे?27 इस तरह एफ ब्लॉक को खाली कराने का खतरा कायम रहा। पिछले एक साल से फिर घरों को ढहाये जाने की अफवाहें जोरों पर है। डीयूएसआईबी की हालिया सूची में एफ ब्लॉक को ऐसे इलाकों के रूप में दिखाया गया है, जहाँ एक भी झुग्गी नहीं है।28 सिर्फ पेन से कुछ रेखाये खींचकर राज्य ने एक पूरे इलाके को अपनी सीमा से ही गायब कर दिया। ऐसा लगता है कि इस कदम के ज़रिये भविष्य में मकानों को ढहाने की प्रक्रिया को पहले ही सुनिश्चित किया जा रहा है। यह कदम राज्य और चुने गये प्रतिनिधियों के मन में एफ ब्लॉक निवासियों के प्रति कायम अपमानजनक नज़रिये को भी दिखाता है।

साल 2011 की इस घटना के बस्ती को मिलने वाली सेवाओं पर कई परोक्ष प्रभाव पड़े। इससे बस्ती निवासियों के राज्य के प्रतिनिधियों से कायम संबंधों पर भी प्रभाव पड़ा। निवासियों ने बताया कि घटना के बाद क्षेत्र विधायक ने सम्बंधित अधिकारियों से एफ ब्लॉक निवासियों को नये राशन कार्ड देने से मना किया है। इसका उद्देश्य निवासियों की दोबारा बसने की स्थितियों को मुश्किल बनाना हो सकता है। लेकिन घटना ने नागरिकों को संगठित कदम उठाने का एक अवसर भी मुहैया कराया। साल 2011 की घटना में जो नागरिक और अधिकार समूह शामिल हुये थे, उनके रूप में एफ ब्लॉक निवासियों को बाहरी समर्थन का एक नया आधार मिल गया था। पुलिस से होने वाले झगड़ों और कानूनी झगड़ों में प्रमुख आवास अधिकार संस्था ‘एचएलआरएन’ और बाकी कार्यकर्ताओं ने निवासियों को लगातार सहयोग दिया। घटना के बाद डीडीए द्वारा कराये जाने वाले सर्वेक्षण की इन समूहों ने निगरानी की और अदालत से लेकर एजेंसी अधिकारियों से सर्वेक्षण और पुर्नवास के तमाम मामलों में निवासियों का प्रतिनिधित्व किया।

साल 2011 में घटी घटनाओं और बाद के घटनाक्रम ने बस्ती के अंदरूनी नेतृत्व को भी एक कर दिया। पूरे घटनाक्रम के दौरान प्रधान और आरडब्ल्यूए सक्रिय प्रतिनिधि के रूप में बने रहे। लम्बे समय से आपसी मतभेद और तनाव के बावजूद घटना से जुड़े मुद्दों पर प्रधान और आरडब्ल्यूए एक हो गये।
घरों को ढहाना एफ ब्लॉक के हालिया इतिहास में एक महत्वपूर्ण पड़ाव था। इसके माध्यम से उन तमाम खतरों को समझा जा सकता है जिसका सामना एफ ब्लॉक निवासी करते हैं। बुनियादी सरकारी सुविधाओं और सरकारी संरक्षण के लिये जिन चुनौतियों का सामना निवासियों को रोज करना पड़ता है, यह उसका मात्र एक नाटकीय उदाहरण है। जैसा कि दिल्ली की झुग्गी-झोपड़ियों के मामलों से स्पष्ट है कि पानी आपूर्ति जैसी बुनियादी सुविधा के लिये लोगों को विधायक समेत राज्य के तमाम प्रतिनिधियों से बातचीत और सौदेबाजी करनी पड़ती है। साल 2004 से साल 2013 के बीच एफ ब्लॉक निवासियों के अपने क्षेत्र के विधायक से सम्बन्ध काफी उलझन भरे रहे। आख़िरी सालों में पानी आपूर्ति के मुद्दे पर सम्बन्ध काफी कड़वे भी हो गये। पानी राज्य सरकार की ज़िम्मेदारी होती है और क्षेत्र का विधायक कुछ हद तक पानी आपूर्ति को प्रभावित कर सकता है। बस्ती के ही एक निवासी द्वारा बताया गया किस्सा विधायक के नज़रिये को ज़ाहिर कर देता है। जैसे ही उसने दिल्ली जल बोर्ड के टैंकर ड्राइवर को बताया कि पानी की आपूर्ति कम है, ड्राइवर ने उससे और बाकी निवासियों से विधायक के पास जाकर दूसरे टैंक के लिये आग्रह करने को कहा।

जैसा कि एक निवासी ने बताया-विधायक उनकी समस्या के बारे में बेपरवाह था। विधायक ने कहा कि पानी की आपूर्ति पर्याप्त हो रही है। बाकी निवासियों ने भी हमसे बातचीत में विधायक के जान-बूझकर अंजान बने रहने की पुष्टि की। सभी ने कहा कि उन्होंने विधायक के पास कई बार जाकर अधिक पानी की आपूर्ति करने के लिये कहा लेकिन उससे भी कोई फायदा नहीं हुआ। निवासियों ने नालियों के लिये भी विधायक से कई बार आग्रह किया। विधायक ने या तो उनकी शिकायत को अनसुना कर दिया या फिर शिकायतों को सिर्फ सुन भर लिया और बदले में कोई मदद मुहैया नहीं करायी।

हालांकि निवासियों और विधायक के सम्बन्ध हमेशा से ऐसे नहीं थे। साल 2008 में क्षेत्र से जीतने के बाद विधायक ने बस्ती के निवासियों को धन्यवाद देते हुये पत्र भेजे थे और उनके लिये काम करने का वादा किया था। 29 निवासियों ने विधायक को अपने तरीकों से पूरा राजनीतिक समर्थन भी प्रदान किया।निवासियों ने एक जागरण के लिये (एक हिन्दू धार्मिक अनुष्ठान) क्षेत्र से 50,000 रुपये का चंदा भी विधायक को इकठ्ठा करके दिया। निवासियों ने बताया कि इस कदम के बदले में उन्हें थोड़ा राजनीतिक संरक्षण मिलने की उम्मीद थी, हालांकि उन्हें कुछ भी नहीं मिला।

साल 2011 में हुयी घटना के बाद निवासी विधायक के पास जब मदद मांगने गए तो विधायक ने उन्हें जैसी प्रतिक्रिया और जवाब दिये, उससे निवासी नाराज़ हो गए। घटना के बाद जों सर्वेक्षणहुआ था उसका पूरा होने के बाद बस्ती के बहुत से निवासी विधायक के पास यह पूछने के लिये गये कि क्या उनकी झुग्गियों को अब भी ढहाया जायेगा? जवाब में विधायक ने लोगों से कहा कि उन्होने सरकारी जमीन पर झुग्गियों को बनाया ही क्यों है, साथ ही यह भी कहा कि वह सरकारी जमीन है और अगर सरकार इसे वापस लेना चाहेगी तो इसमें वह कुछ नहीं कर सकता। इन बातों से दुविधा में पड़े आरडब्ल्यूए सदस्यों ने विधायक से पूछा कि अगर सबसे पहले उन्हें वहां पर रहने का कोई हक ही नहीं है तो विधायक ने ठीक उसी जगह के लिये मतदाता पहचान पत्र क्यों जारी करवाये हैं।

वहीं नगरपालिका स्तर पर बस्ती का प्रतिनिधित्व करने वाले पार्षद से बस्ती के निवासियों का संबंध स्पष्ट नहीं है, जो कुछ हद तक यह दिखाता है कि पार्षद निवासियों के प्रति बहुत सीमित रूप से ज़िम्मेदार है। पार्षद भाजपा का एक सदस्य है जो 2012 में दोबारा चुना गया है। सामान्य तौर पर, दिल्ली में पार्षदों का अधिकार क्षेत्र और शक्तियां बहुत सीमित हैं। कूड़ा प्रबंधन ही एक मात्र बुनियादी काम है जो उनके अधिकार क्षेत्र में आता है। पानी, बिजली आदि सेवाओं का नियंत्रण राज्य स्तर पर होता है। एफ ब्लॉक के मामले में यह पहलू निवासियों के इस दावे से भी उभरकर आता है कि डीडीए द्वारा बस्ती के ढहाये जाने की कोशिश के बाद जब उन्होंने पार्षद से संपर्क किया तो पार्षद ने उन्हें बताया कि केवल विधायक ही उनकी मदद कर सकता है। दूसरी ओर, पार्षद के अनुसार बस्ती में जिस प्रकार के विकास कार्य की आवश्यकता है, वह उसके कार्यक्षेत्र से बाहर हैं। इसके बावजूद वह निवासियों से लगातार संपर्क में था और बस्तियों के ढहाये जाने के बाद उनकी हर संभव मदद कर रहा था। हालांकि निवासियों ने बताया कि पार्षद की पार्टी के स्थानीय कार्यकर्ता झुग्गियां गिराने के लिये अक्सर सरकार को पत्र लिख रहे थे। हम केवल अनुमान ही लगा सकते हैं कि पार्षद की पार्टी बस्ती को ढहाये जाने के लिए क्यों दबाव बनायेगी।

अपने प्रतिनिधियों के कार्यों के बारे में एफ ब्लॉक के निवासियों में स्पष्ट समझ है। वे उम्मीद करते हैं कि उनके विधायक और पार्षद बुनियादी सुविधाओं को हासिल करने में उनकी मदद कर सकते हैं। वे उनको बस्ती से निकाले जाने के खिलाफ संरक्षण दे सकते हैं। निवासियों को कुछ हद तक अपने प्रतिनिधियों पर भरोसा भी जताया है। इसके अलावा निवासियों ने जनप्रतिनिधियों पर अपना हक जाहिर करते हुए उन्हें कई याचिकायें सौंपी हैं और कई बार उनके आफिस भी गये हैं। लेकिन कुल मिलाकर बस्ती निवासियों के अपने प्रतिनिधियों से संबंध खराब ही रहे हैं। प्रतिनिधियों के प्रति राजनीतिक वफादारी रखने के बावजूद निवासियों को कभी ऐसा नहीं लगा कि उन्हें बदले में प्रतिनिधियों की ओर से कोई संरक्षण मिला। विधायक और पार्षद, दोनों ही साल 2011 की घटना और ऐसे दूसरे नाजुक मौकों पर समुदायों को सुरक्षा प्रदान करने में नाकाम रहे हैं। बस्ती के एक निवासी की निराशा इन शब्दों में झलकती है- हमने सबका साथ दिया [सभी राजनीतिक पार्टियों की और इशारा करते हुए] लेकिन किसी ने भी बस्ती के लोगों के लिये कोई काम नहीं किया।

बस्ती के निवासियों का सरकार से रोज़मर्रा का संवाद उनके पुलिस और डीडीए सिक्यूरिटी गार्ड जैसे तत्वों से जूझने के रूप में होता हैं। निवासियों के अनुसार, इन दोनों में कोई अंतर नहीं है। उन्हें लगता है कि दोनों समूहों के बीच गठजोड़ है। डीडीए गार्ड्स और पुलिस इस क्षेत्र की नियमित निगरानी करते हैं। निवासी बताते हैं कि पिछले दो दशकों से पुलिस और डीडीए जमीन पर बसाने के नाम पर पैसा इकट्ठा कर रहे हैं। वे बताते हैं कि नयी झुग्गी बनवाने के लिये उन्हें डीडीए और पुलिस को दस से बीस हजार रुपये देने पड़ते है। झुग्गी में कोई नया दरवाजा, खिड़की या कोई नया कमरा बनवाने जैसे कामों के लिये फिर से पैसे देने पड़ते हैं। निवासियों का दावा है कि बस्ती में कोई भी नया निर्माण कार्य होने पर पुलिस और डीडीए को इसकी सूचना मिल जाती है। निर्माण के लिये पैसा नहीं देने पर मकान ढहा देने जैसे नतीजों का सामना करना पड़ता है। एक निवासी ने बताया- आप घर की ऊंचाई बढ़ाने के लिये दो पंक्ति की ईंट डालते हो और पैसे नहीं दे पाते तो फिर चार पंक्ति ईंट गिरा देंगे। साल 2011 की घटना के बाद, डीडीए द्वारा इकट्ठा किये जाने वाले पैसे में गिरावट आ गयी थी, लेकिन साल 2013 तक इस तरह की उगाही फिर से पूरी गति से बढ़ने लगा।

चुनाव

दिसंबर, 2013 में हुये विधान सभा चुनाव में विधायक के प्रति लोगों का नजरिया तब जाहिर हो गया था, जब उसके समर्थन में रहे बहुत से लोगों ने विरोधी आम आदमी पार्टी को वोट किया। निवासियों से हुयी बातचीत से यह स्पष्ट है कि यह कदम उन्होंने अपने अधिकारों को मजबूत करने की इच्छा के चलते उठाया। आप ने अपने प्रचार में बेहतर सुविधाओं और अधिक भागीदारी देने का वादा किया था, खासकर उन लोगों के लिए जों शहर की अनियोजित बस्तियों के निवासी थे। साल 2013 के विधानसभा चुनाव ने हमें यह समझने का अवसर दिया कि एफ ब्लॉक निवासियों के प्रमुख चुनावी मुद्दे क्या हैं। बस्ती में विभिन्न राजनीतिक दलों और उनके प्रतिनिधियों द्वारा अपनायी जा रही रणनीतियों और प्रचार के तरीकों को भी दर्ज करने का अवसर हमें मिला। नीचे दिये गया विवरण 4 से 20 दिसंबर 2013 के बीच किये गए चार दौरों के आधार पर तैयार किये गए हैं, साथ-साथ प्रचार की गतिविधियों और आप, भाजपा, कांग्रेस और बसपा के स्थानीय कार्यलयों में पार्टी कार्यकर्ताओं से हुयी बातचीत को भी विवरण का आधार बनाया गया है।

इस दौरान कुछ प्रमुख और बुनियादी चुनावी मुद्दों को लेकर निवासियों के बीच आम सहमति थी। घरों को टूटने से बचाना और ठीक उसी स्थान पर दोबारा बसाना इनमें से एक अहम मुद्दा था। फोकस ग्रुप में महिलाओं ने यह चिंता जाहिर की – “हम सिर्फ यही चाहते हैं कि हमें यहाँ से नहीं हटाया जाये। हमारी आजीविका (गुजर-बसर) के साधन आस-पास के इलाकों में है, हमारे बच्चों के स्कूल भी आस-पास के इलाकों में ही हैं। अगर वे हमें पुर्नवास देना चाहते हैं, तो ये हमें ठीक इसी स्थान पर चाहिये। आखिर हम यहाँ पर पिछले दस सालों से रह रहे हैं और अब हम यहाँ से जाना नहीं चाहते। जो मकान हमारे घरों से दूर होंगे, आखिर हम उनका क्या करेंगे ?”

एक अन्य महिला ने भावी विधायक को अपनी उम्मीदों को बताने के लिये एक पोस्टर की ओर इशारा किया जिस पर लिखा था- जहाँ झुग्गी, वहीं पुनर्वास। इन मुद्दों के अलावा निवासियों ने नियमित पानी-बिजली आपूर्ति, स्वच्छता को प्रमुख चुनावी मुद्दा माना। प्रधान ने बताया कि चुनाव के दिनों में एफ ब्लॉक आने वाले टैंकरों की संख्या बढ़ गयी थी। एफ ब्लॉक के निवासियों को, जिन्हें सप्ताह में एक बार पानी मिलने की आदत थी, एकाएक रोज पानी मिल रहा था।

बस्ती के निवासियों ने बताया कि बतौर समूह उनकी न तो किसी भी राजनीतिक दल से और न ही किसी ख़ास उम्मीदवार से नज़दीकी है। एक निवासी ने बताया- हम किसी एक राजनीतिक दल के साथ नहीं हैं क्योंकि हम बंधना नहीं चाहते। प्रधान बसपा के पार्टी कार्यकर्ता थे, हालांकि पटेल नगर विधान सभा क्षेत्र से उन्होंने आम आदमी पार्टी के ओर से चुनाव लड़ने के लिये आवेदन किया था। बस्ती के आरडब्ल्यूए के सदस्यों ने आम आदमी पार्टी के लिये कार्यकर्ता के रूप में काम किया, लेकिब वे तब तक पार्टी के समर्थन में खुलकर सामने नहीं आये जब तक चुनाव नतीजे और आम आदमी पार्टी सत्ता में नहीं आ गयी। आरडब्ल्यूए के एक सदस्य ने कहा- हम चुपके-चुपके आप का समर्थन कर रहे हैं क्योंकि विरोधी उम्मीदवार गुंडा है। हमें डर है कि जैसे ही उसे हमारे आम आदमी पार्टी को समर्थन करने की बात पता चलेगी, वह बस्ती को मिलने वाली सारी सुविधाये बंद कर देगा। चार दिसंबर, 2013 को होने वाले चुनाव से बीस दिन पहले तक बस्ती में कोई भी ख़ास चुनाव प्रचार नहीं हो रहा था। बीस दिन बचने पर कुछ निवासियों ने जो आप के कार्यकर्ता थे, ने चुपचाप प्रचार शुरू किया। इन कार्यकर्ताओं ने निवासियों को बुलाया और रात में बैठकें लगायी। इनमें निवासियों को बताया गया कि उन्हें आम आदमी पार्टी को वोट क्यों करना चाहिये। आप कार्यकर्ताओं ने जोर देकर निवासियों को बताया कि निवासियों ने खुद देखा है कि बीते सालों में भाजपा (पार्षद की पार्टी) और कांग्रेस पार्टी (विधायक की पार्टी) ने बस्ती में कोई काम नहीं कराया है और इसलिये उन्हें आप को एक मौका देना चाहिए। निवासियों ने हमें बताया कि चुनाव में एक हफ्ता रहने पर पर बस्ती के एक हिस्से में आप द्वारा आम सभा भी आयोजित की गयी थी।

निवासियों ने बताया कि भाजपा के एक समर्थक ने बस्ती में प्रचार किया, लेकिन उन्होंने कांग्रेस की ओर से किसी को प्रचार करते नहीं देखा। हालांकि उन्होंने माना कि फोन पर उन्हें समर्थन देने के लिये विधयाकों के सन्देश मिले हैं। दिलचस्प बात ये रही कि प्रधान के बसपा का पार्टी कार्यकर्ता होने के बावजूद, निवासियों ने बसपा की प्रचार गतिविधियों के बारे में कुछ भी नहीं बताया।

पटेल नगर विधान सभा क्षेत्र, एफ ब्लॉक जिसका हिस्सा है, से आम आदमी पार्टी ने 37.9 प्रतिशत वोटों के साथ चुनाव जीता। 31.8 वोटों के साथ भाजपा दूसरे स्थान पर रही जबकि कांग्रेस को 24.4 फीसदी वोट मिले। एफ ब्लॉक के चुनाव नतीजों में आप कार्यकर्ताओं द्वारा अलग से किये गये चुनाव प्रचार की झलक देखी जा सकती है। जिन पोलिंग बूथों पर एफ ब्लॉक के निवासियों ने वोट डाला है, वहां के चुनाव आंकड़ों का विश्लेषण यह बताता है कि वोट डालने वाले 43.5 फीसदी से कुछ अधिक निवासियों ने आप को वोट डाला। यह इस विधान सभा क्षेत्र के औसत 37.9 प्रतिशत से काफी ज़्यादा था। एफ ब्लॉक से ही भाजपा को 23 प्रतिशत और कांग्रेस को 23.8 प्रतिशत वोट मिले।

निष्कर्ष

झुग्गी-झोपड़ी समूह दिल्ली की सबसे असुरक्षित आबादियों में से एक है। लेकिन अगर बहुत मानकों के आधार पर भी देखा जाये तो एफ ब्लॉक के निवासियों को राज्य द्वारा मिलने वाली सुविधाओं तक पहुँच का स्तर बेहद खराब है। निवासी घर ढहाये जाने के खतरों के बीच जीवनयापन करते हैं। इस पर भी उन्हें बुनियादी स्तर का वैसा राजनीतिक संरक्षण भी नहीं मिल पाता है, जो बाकी असुरक्षित रिहायशी इलाकों को मिला हुआ है।

निवासियों का रोजमर्रा का जीवन बुनियादी जरूरतों की पूर्ति के लिये राज्य के विभिन्न प्रतिनिधियों और अधिकारियों से होने वाली सौदेबाज़ी से प्रभावित होता है। उदाहरण के तौर पर, दिल्ली जल बोर्ड के टैंकर को मंजूर करवाने के लिये निवासियों ने ज़ोनल कार्यालय में रिश्वत देने की बात को माना। इसके अलावा टैंकर के प्रत्येक दौरे पर टैंकर ड्राइवर को रिश्वत देने की बात भी निवासियों ने स्वीकार की। बावजूद इसके, पानी का वितरण बेहद खराब है। यह रिपोर्ट दिखाती है कि एफ ब्लॉक निवासियों का सरकार के साथ ऐसा सम्बन्ध है जिसमे वे सरकार के सामने कमज़ोर प्रार्थी के रूप में प्रतीत होते हैं। वे कतई ऐसे नागरिक नहीं लगते जो अपने अधिकारों के आधार पर मांग कर सके । उनकी राजनैतिक कमजोरी बस्ती के ढहाये जाने जैसे खतरों के हमेशा बने रहने से स्पष्ट हो जाती है। राज्य प्रतिनिधियों, स्थानीय पुलिस और डीडीए अधिकारियों द्वारा रोज़ की वाली निगरानी, उगाही और शोषण इस इस कमजोरी और शक्ति असंतुलन को बनाये रखते है।

इस तरह एफ ब्लॉक का भविष्य अनिश्चित है। पहले तो ये निवासी केवल असुरक्षा में जी रहे थे, लेकिन अब इन्हें आधिकारिक तौर पर गायब ही कर दिया गया है। दिल्ली में झुग्गी-झोपड़ी बस्तियों (जेजेसी) पर हाल ही में डीयूएसआईबी ने जों आंकड़े जारी किये, उनमे एफ ब्लॉक में शामिल नहीं है। इन आंकड़ो को दिखाने वाले मानचित्र में अस्पष्ट और रहस्यमय अंदाज में झुग्गियों के स्थान पर ‘no jhuggis?’ ( कोई झुग्गियाँ नहीं हैं?) लिखा है। यह स्पष्ट नहीं है कि ऐसा सर्वेक्षण में हुयी गलती के चलते हुआ या डीयूएसआईबी एक बार फिर झुग्गियों को ढहाने की तैयारी कर रहा है? या फिर डीयूएसआईबी एफ ब्लॉक निवासियों का वजूद को ही झुठला ला रहा है!