दिल्ली विकास प्राधिकरण

दिल्ली विकास प्राधिकरण

केवल संपत्ति ही, या विकास भी?

शहाना शेख़ और बेन मेंडलकर्न, दिसम्बर 20141
Suggested Citation: Shahana Sheikh and Ben Mandelkern, ‘The Delhi Development Authority: Accumulation without Development’. A report of the Cities of Delhi project, Centre for Policy Research, New Delhi (December 2014).
(इस लेख का अंग्रेज़ी से हिन्दी में अनुवाद पंकज कुमार झा, संदीप कुमार व सोनल शर्मा ने किया है)

सारांश

1957 में केंद्र सरकार ने दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) को आवासों के निर्माण के समेत राजधानी में शहरी नियोजन और विकास कार्यों के लिये एकाधिकार प्रदान किया। आज, दिल्ली की लगभग एक चौथाई ज़मीन पर डीडीए का मालिकाना हक है और दिल्ली में ज़मीन, हाउसिंग और बुनियादी ढांचे से जुड़े लगभग सभी गतिविधियों से इसका सरोकार है। इस रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि हालांकि डीडीए ज़मीन के अधिग्रहण और उच्च स्तरीय सुविधायें प्रदान करने जैसे कार्यों में अपेक्षाकृत रूप से दक्ष और सफल रहा है, लेकिन निम्न आय वर्ग के लिये आवासों के निर्माण और उनके आवंटन को पूरा करने जैसे क्षेत्र में उसकी रफ्तार बेहद सुस्त रही है। शहर में आवास की कमी और ख़राब हो जाती है जब नियमित तौर पर डीडीऐ अपने अधिकार क्षेत्रवाली जमीनों से अनियोजित रिहायशों को ढहाता है। डीडीए जितने घरों को बनाता नहीं, उससे कई ज्यादा घरों को नष्ट कर देता है। हमने डीडीए की इन चुनौतियों के पीछे दो वजहों को जिम्मेदार पाया है। पहली, डीडीए भारत सरकार के प्रति जवाबदेह है, न कि स्थानीय या दिल्ली के निवासियों द्वारा चुनी गयी राज्य सरकार के, जिसके कारण डीडीए की जवाबदेही का ढांचा और शहर की आवश्यकताओं के बीच काफी दूरी है। दूसरी, इसकी आंतरिक संरचना में उच्च स्तरीय मैनेजमेंट और योजनाओं को लागू करने वाले निचले स्टाफ के बीच गहरा फ़ासला है।
Download a PDF

दिल्ली विकास प्राधिकरण यानी डीडीए की स्थापना भारत सरकार ने 1957 में की। इसका मूल उद्देश्य दिल्ली के मास्टर प्लान का खाका खींचना और दिल्ली को इस तरह विकसित करना था जहां रिहाइश, कमर्शियल और मनोरंजन से जुड़ी जगहों की चाक चौकबंद व्यवस्था हो। डीडीए की प्रतिबद्धता ‘दिल्ली के विकास को सुनिश्चित करना और उसे बढ़ाते रहना रहा है’।2साथ ही दिल्ली में ज़मीन, हाउसिंग और बुनियादी ढांचे यानी इंन्फ्रास्ट्रक्चर से जुड़े लगभग सभी गतिविधियों से इसका सरोकार है। डीडीए का प्रभाव दिल्ली के उन इलाकों तक ही सीमित नहीं है जो इसके द्वारा नियोजित किये गए हैं, बल्कि इसका प्रभुत्व असंख्य एकड़ ‘अतिक्रमित’ ज़मीन पर भी है। इस लिहाज़ से दिल्ली में बसी झुग्गी-झोपड़ियों और दूसरे अनियोजित रिहायशों के शासन के सम्बन्ध में कोई दूसरी एजेंसी इतनी महत्वपूर्ण भूमिका नहीं निभाती जितनी डीडीए अदा करता है।3

अगर नीति नियोजन या प्लानिंग के नज़रिए से देखें तो ज़मीन के प्रबंधन और हाउसिंग से जुड़े प्रावधानों का एक ही सांगठनिक छतरी के नीचे होना एक विशिष्ट और नियोजित नगर के लिए एक आदर्शपरक स्थिति होती है। हमारा अध्ययन डीडीए द्वारा पूर्व में किए गए वायदों की पड़ताल करता है और यह पाता है कि प्राधिकरण इन वायदों पर टिक नहीं पाया है। हमारे शोध से यह बात निकल कर सामने आई है कि डीडीए भूमि अधिग्रहण और उच्च श्रेणी की सुविधा मुहैय्या कराने में जहां तुलनात्मक रूप से अधिक सफल रहा, वहीं निम्न आय वाले लोगों को आवासीय सुविधा दिलाने की दिशा में इसकी रफ़्तार बेहद धीमी रही है। इसके परिणामस्वरुप दिल्ली शहर की गरीब निवासी एक तरह से अनाधिकृत बाशिंदे बन जाते है क्योंकि इनके पास रहने के लिए कोई किफायती विकल्प नहीं हैं और जहां ये रहते हैं उस ज़मीन को अक्सर डीडीए अधिकृत कर लेता है।

हालांकि डीडीए का मुख्य फलसफा दिल्लीवासियों को एक नियोजित और आदर्श राजधानी बनाना था लेकिन आंकड़ों को खंगाल कर देखें तो इसकी विफलता ही बयां होती है। दिल्ली में निवास करने वाले करीब एक चौथाई से कम लोग ही नियोजित यानी प्लांड कॉलोनी में रहते हैं4 यह रिपोर्ट इस बात को साबित करती है कि डीडीए एक विशिष्ट वर्ग को ही नियोजित और सुविधा-संपन्न नगर की सुविधा उपलब्ध कराता है। हम इस विफलता को डीडीए की तीन प्रमुख संदर्भों के साथ देख सकते हैं। क) डीडीए दिल्ली के लिए बहुत प्रगतिशील विज़न यानी दृष्टिकोण की बात तो करता है लेकिन इसकी रणनीतिक प्लानिंग में राजधानी के जनानांकिकी, सामाजिक और आर्थिक सच्चाइयों को ताक पर रख दिया गया है। इसकी तमन्ना बस रसूखदार और मोटी कमाई करने वाले निवासियों के समूह को ही सुविधा मुहैय्या कराना है। ख) डीडीए की सांगठनिक संरचना इसके अफसरशाही स्वभाव को और बल प्रदान करती है जिसके चलाने प्लान बनाने वाले, इसका पालन करने वाले और जमीन पर आकार प्रदान करने वाले, के बीच काफी दूरी देखी गई है। ग) उपरोक्त सभी सांगठनिक चुनौतियों में और मुश्किलें जोड़ने का काम दिल्ली की जटिल शासन संरचना करती है जिसमें स्थानीय निकाय यानी लोकल बॉडी, राज्य की सरकार और केंद्र सरकार शामिल है और ये तीनों मिलकर कई दफा गड्ड-मड्ड स्थिति पैदा कर देते हैं। (देखें बॉक्स-1)

परिणामस्वरुप हमारे सामने एक ऐसी एजेंसी आती है जो दिल्ली को एक ऐसे शहर के लिए योजना बनाती है जो देखने में अच्छा हो5 उससे जुड़े निर्माण कार्य करती है और शहर् के रख-रखाव में लगी रहती है। जो ज़रूरी बुनियादी ढांचे के ऊपर पार्को के निर्माण को वरीयता देती है, जिसके लिए बसाहट के ऊपर साफ़-सफाई ज़्यादा ज़रूरी है और जो लोगों का समावेशन यानी इन्क्लूसिवनेस के ऊपर ‘वर्ल्ड क्लास’ सिटी की छवि को अधिक तवज्जो देती है। यह पूरा नज़रिया हालांकि एक वर्ग विशेष के लिए पूर्वाग्रह पर ही आधारित है। इसकी झलक डीडीए की 2006-07 की वार्षिक रिपोर्ट के भूमिका वाले हिस्से में देखी जा सकती है। अथॉरिटी ने अपने गठन की 50वीं वर्षगांठ पर प्रकाशित इस रिपोर्ट में कहा-

50 वर्षों से विकास की गति को बनाए रखने और दुनिया के सबसे बेहतरीन शहरों के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने के अनवरत प्रयास में, डीडीए ने एक के बाद दूसरा मील का पत्थर हासिल किया है।

इस तरह डीडीए लगातार बगीचों, नेबरहुड पार्क, हरित पट्टी, कमर्शियल सेंटर, आवासों इत्यादि के निर्माण के ज़रिये दिल्ली की खूबसूरती में चार चांद लगा रहा है।

इसका मकसद बदलते परिदृश्य में दिल्ली की सुंदरता और जीवंतता को बनाए रखना है।

डीडीए साल 2010 के कॉमनवेल्थ गेम्स के मद्देनज़र दिल्ली की शक्ल को बदलने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। इतना ही नहीं 2021 मास्टर प्लान दिल्ली शहर के संपूर्ण विकास को सुनिश्चित करने की परिकल्पना करता है।

शासक आयें हैं, और उनका अवसान हुआ है। इतिहास लिखा गया है, उसका पुर्नलेखन भी हुआ है, पर दिल्ली शहर का गौरव बढ़ता ही रहा है। डीडीए दिल्ली को विकास और शहरी नियोजन [व वास्तुकला] के उत्कृष्ट उदाहरण के रूप में विकसित करने का लक्ष्य रखता है। ताकि यह केवल भारत की ही नहीं बल्कि समूचे विश्व की धरोहर बन जाये।

इन घोषणाओं का भाव स्वयं को शेख चिल्ली के रूप में प्रस्तुत करना है। अपनी उपलब्धियों और भविष्य की आकांक्षाओं के जश्न में, गरीबों के लिए आवास, ज़रूरी बुनियादी ढांचे, और शहर के अनियोजित हिस्सों को अपने अधिकार क्षेत्र में शामिल करने जैसे मुद्दों का कोई ज़िक्र नहीं है।

बॉक्स-1: दिल्ली में सरकारें
केन्द्र सरकार की एजेंसी के रूप में डीडीए जिस दिल्ली नगर के लिए काम करता था, वो अब राज्य के तौर पर तब्दील हो गया है। ऐसे में राज्य और केंद्र सरकार की पाट के बीच डीडीए की स्थिति पेचीदा हो गई है। दिल्ली अब लोकल बॉडी, राज्य सरकार और केंद्र सरकार के त्रिकोण में फंसा हुआ है।
स्थानीय निकाय यानी लोकल बॉडी

डीडीए का जन्म केंद्र सरकार की एजेंसी के रूप में ठीक उसी वक्त हुआ जब दिल्ली म्यूनिसिपल कॉरपरेशन एक्ट के द्वारा एमसीडी की स्थापना हुई। तब से अब तक एमसीडी तीन एजेंसियों- दक्षिण, उत्तरी और पूर्वी दिल्ली म्यूनिसिपल कॉरपोरेशन में विभाजित हो चुकी है। इन तीनों के अलावा न्यू दिल्ली म्यूनिसिपल काउंसिल और दिल्ली कैटोनमेंट बोर्ड सहित पांच निकाय दिल्ली नगर में स्थानीय सरकार (निकाय) की आधारशिला हैं।
राज्य

आजादी के बाद दिल्ली में विधायिका बहुत कम समय के लिए थी। 1956 से 1992 के दौरान दिल्ली केन्द्रशासित प्रदेश के रूप में था जिस पर केंद्र सरकार का शासन था। इसके पास अपनी कोई राज्य स्तरीय विधायी शक्ति नहीं थी। 1992 में गर्वनमेंट ऑफ नेशनल कैपिटल टेरिटरी ऑफ दिल्ली एक्ट,1991 लागू हुआ जिसके बाद दिल्ली एक राज्य के तौर पर अस्तित्व में आया जिसके पास राज्य स्तरीय प्रतिनिधि चुनने और एक लोकतांत्रिक सरकार बनाने का अधिकार था। इसे गर्वमेंट ऑफ नेशनल कैपिटल टेरिटरी ऑफ दिल्ली (जीएनसीटीडी) का नाम दिया गया। इस रिपोर्ट में हम जीएनसीटीडी के लिए दिल्ली सरकार शब्द का प्रयोग करेंगे।
राष्ट्रीय

दिल्ली की स्टेटहुड यानी राज्य की स्थिति की सीमाओं को दो तथ्यों के आधार पर देखा जा सकता है। पहला, राज्य सरकार दिल्ली पुलिस पर नियंत्रण नहीं रख सकती है। पलिस केंद्र सरकार के नियंत्रण में है। दूसरा, दिल्ली की प्लानिंग, ज़मीन के इस्तेमाल और विकास से संबंधित सभी कार्य डीडीए के ज़िम्मे है जो केंद्र की एजेंसी है।

निश्चित तौर पर डीडीए की कहानी उपरोक्त जटिल पृष्ठभूमि को बखूबी बयां करती है। प्राधिकरण की स्थापना दिल्ली के लिए विशेष विज़न यानी दृष्टिकोण के साथ तब हुई थी जब दिल्ली में राज्य सरकार का अस्तित्व नहीं था और नगर के प्रशासन पर प्रत्यक्ष रूप से भारत सरकार का नियंत्रण था। हालांकि 1992 के बाद हालात में बदलाव हुए। एक नए तरीके का विज़न हमारे सामने था लेकिन इस बदलती परिस्थिति में भी डीडीए की भूमिका पर फिर से सोचा-विचारा नहीं किया गया और वह केन्द्र की एजेंसी के रूप में कामकाज करता रहा। जबकि डीडीए की संरचना ज्यों की त्यों है, कुछ प्रशासनिक ज़िम्मेदारियां जो पहले पूरी तरह से डीडीए के अधिकार-क्षेत्र में थी, अब उन जिम्मेदारियों को डीडीए दिल्ली सरकार के साथ बांटता है। यह बदलाव अनियोजित बाशिंदगी के प्रशासन में खासतौर की सच्ची तस्वीर बयां करती है।6

इतिहास

जब से डीडीए अस्तित्व में आया है इसने दिल्ली नगर के लिए तीन मास्टर प्लान का निर्माण और उसका निष्पादन किया है। इस हिस्से में हम इन मास्टर प्लानों की समयावधियों के अनुसार डीडीए के इतिहास की पड़ताल करने की कोशिश करेंगे।

प्रथम मास्टर प्लान (1962-1981): ज़मीन अधिग्रहण
1947 में विभाजन की त्रासदी के बीच ही डीडीए का उदय होता है। यही वह समय था जब एक वर्ष में करीब 5 लाख की आबादी शरणार्थी बनकर इस शहर में आई। नगर के दक्षिणी और पूर्वी इलाके में, पलायन करके आए लोगों ने अपनी रिहाइशें बना लीं। इस संकट के बीच भारत सरकार ने दिल्ली इम्प्रूवमेंट ट्रस्ट की समीक्षा के लिए एक कमेटी बनाई। दिल्ली इम्प्रूवमेंट ट्रस्ट का दायित्व दिल्ली में रखरखाव और विकास के कामों की देख-रेख करना था। 1951 में कमेटी ने दिल्ली की प्लानिंग और उसके संपूर्ण विकास की ज़िम्मेदारियों के लिए एक एकल एजेंसी की जरूरत पर बल दिया।

इसी कड़ी में 1957 में भारत सरकार ने दिल्ली डेवलपमेंट बिल पारित किया, परिणामस्वरूप दिल्ली विकास प्राधिकरण यानी डीडीए की स्थापना केन्द्र सरकार के एक अंग के रूप में हुई। इस बिल के अनुसार डीडीए की भूमिका ‘मास्टर प्लान के अनुसार शहर के विकास को सुनिश्चित करना और उसे [विकास को] बढ़ाते रहना है’7 डीडीए की स्थापना एक ऐसी संस्था के रूप में हुई थी, जो उस समय अव्यवस्थित शहर को उच्च स्तर पर किये जाने वाले नियोजन के ज़रिये पटरी पर ला सके। दिल्ली डेवलपमेंट बिल पर संयुक्त कमेटी की रिपोर्ट में जोर देकर कहा गया कि इस बिल के मुख्य सिद्धांत में किसी भी प्रकार की टाउन प्लानिंग को ऊँचे स्तर से लागू करने पर बल दिया गया न कि ज़मीनी स्तर से।8 गौरतलब है कि मास्टर प्लान को शुरुआती समय में तैयार करते वक्त इसी प्रकार की भावना प्रभावी थी।

1962 में स्वीकृत पहले मास्टर प्लान में फोर्ड फाउंडेशन ने डीडीए को सहयोग किया था। पहले मास्टर प्लान के करीब दो दशकों के दौरान डीडीए प्लानिंग संबंधी जिम्मेदारियों से आगे बढ़कर ज़मीन प्रबंधन और आवासों के निर्माण सरीखे अन्य जिम्मेदारियों को पूरा करने में लगा रहा। 1968 तक प्राधिकरण में विनिर्माण विभाग यानी कंस्ट्रक्शन डिविज़न, आवास विभाग, ज़मीन अधिग्रहण विभाग मौजूद थे जिनमें योजनाकारों, इंज़ीनियरों, उद्यान विशेषज्ञों जैसे एक्सपर्ट्स समेत कुल 35,000 कर्मचारी थे।9

दिल्ली की बढ़ती जनसंख्या के लिहाज़ से डीडीए की विस्तार संबंधी सीमाओं को भी देखा गया। बढ़ती मांग के हिसाब से पूर्ति करने में अथॉरिटी को काफी चुनौतियों का सामना करना पड़ा। पहले मास्टर प्लान के अनुसार 1962 से 1981 के बीच करीब 62,200 एकड़ ज़मीन का अधिग्रहण और उसका विकास दो स्तरों में किया जाना था। मास्टर प्लान में इस व्यापक केन्द्रीकृत अधिग्रहण को एक नियोजित और विस्तृत शहर के प्रभावशाली उदय से जुड़ा एक आवश्यक कदम करार दिया गया-

सरकार ने बड़े पैमाने पर भूमि अधिग्रहण के लिए कह दिया है। सरकार का ज़मीन पर मालिकाना हक होने से शहरी विकास से जुड़े प्लानों का बनाया जाना और उनको क्रियान्वित करना आसान हो जाता है। यह खासकर तब अनिवार्य होगा अगर झुग्गियों को हटाये जाने, उनके पुनर्विकास, रियायती दरों पर आवासीय सुविधा दिए जाने और स्थापित मानकों के हिसाब सामुदायिक सुविधाएं प्रदान किये जाने का काम अनवरत ढंग से किया जाना है। और इस तरह दिल्ली निश्चित तौर पर अपने विकास और प्रगति के रास्ते पर सरपट दौड़ेगी।10

इस अवधि में प्राधिकरण को अधिग्रहण संबंधी उद्देश्यों को प्राप्त करने में निश्चित तौर पर सफलता मिली और डीडीए ने इस दौरान करीब 56,834 एकड़ ज़मीन को अधिग्रहित किया।11 लेकिन डीडीए अपने प्रस्ताव के दूसरे हिस्से को प्राप्त करने में विफल रहा। 1978 तक प्राधिकरण ने आवासीय प्रयोग के लिए करीब 30,000 एकड़ ज़मीन को विकसित करने की योजना बनाई थी परंतु वह इसमें से करीब 13,412 एकड़ ज़मीन को ही वह विकसित कर पाया।12

1970 के दशक के अंत तक यह स्पष्ट हो गया था कि डीडीए दिल्ली के बांश़िदों को पर्याप्त रूप से नियोजित आवासीय सुविधा मुहैय्या कराने में सक्षम नहीं है। 1969 से 1981 के बीच डीडीए के द्वारा 75,000 फ्लैटों के निर्माण का लक्ष्य रखा गया था जबकि वास्तव में 50,000 से भी कम फ्लैटों का ही निर्माण हो पाया। वहीं दूसरी तरफ इन फ्लैटों की कीमत आसमान छूने लगी थी जो विशेष रूप से निम्न और मध्यम वर्ग के लिए खरीदना बूते से बाहर की चीज़ थी।13

विकास और निर्माण संबंधी खामियों के बीच प्राधिकरण द्वारा उपलब्ध ज़मीन और आवासीय वितरण से शहर के संभ्रांत दौलतिया वर्ग को ही फायदा हुआ। 1983 में दत्ता व झा के द्वारा जो अवलोकन किया गया उसके अनुसार-

1960-61 और 1970-71 के बीच उच्च आय समूह (एचआईजी) को नीलामी के द्वारा कुल ज़मीन का करीब 49.8 फीसदी तक हिस्सा दे दिया गया। जिनकी ज़मीन अधिगृहित की गई थी उनको आवंटित किये जाने वाले कुल प्लॉटों में करीब 14 फीसदी, मध्यम आय समूह (एमआईजी) को 24.7 और निम्न आय समूह (एलआईजी) को 11.5 प्रतिशत प्लॉट दिए गए। यहां यह देखना दिलचस्प है कि जहां 1961-62 में एलआईजी को दी गई ज़मीन का अनुपात 3.2 प्रतिशत था वहीं 1969-70 में यह तेज़ी से घटकर 1.9 प्रतिशत हो गया।
14

यह स्पष्ट है कि डीडीए कभी भी निम्न आय वर्ग की ज़रुरत के हिसाब से पर्याप्त संख्या में घर नहीं बना पाया और यह एक ऐसा तथ्य है जिसकी पुष्टि अनियोजित रिशयाशों की लगातार बढ़ती हुई संख्या और आकार दोनों करते हैं। 1983 के आंकड़ों को देखें तो दिल्ली की करीब 30 प्रतिशत आबादी- यानी 17 लाख बाश़िंदे अनाधिकृत कॉलोनियों और झुग्गी-झोपड़ियों में रहने को विवश थीं।15 यही वह समय था जब डीडीए ने इन अनियोजित रिहायशी इलाकों के ख़िलाफ कड़े रुख़ अपनाना शुरू कर दिया था। यह सब डीडीए शहर की ‘सफाई’ करने के नाम पर कर रहा था, परिणामस्वरूप डीडीए ने इन झुग्गी- झोपड़ियों का सफाया करना और वहां बसे लोगों को बेदख़ल करना शुरू कर दिया।

इस अवधि के दौरान डीडीए की वार्षिक रिपोर्टों के अनुसार इसका प्रमुख प्रयास अनियोजित निवास से शहर की ‘रक्षा’ करना रहा। 1980-81 की रिपोर्ट में डीडीए ने लिखा है, ‘एक सशक्त प्रोग्राम… खाली जगहों की घ़ेरेबंदी के लिए ताकि ज़मीन को अतिक्रमण से सुरक्षित किया जा सके’। ऐसे में कोई यह तर्क दे सकता है कि डीडीए अनियोजित रिहायशों की बढ़ रही संख्या को पर्याप्त संख्या में नियोजित आवास उपलब्ध कराके—जो इसकी ज़िम्मेदारी थी—रोक सकता था।

दूसरा मास्टर प्लान (1981-2001): आवासीय अभाव
डीडीए द्वारा तैयार की गई दूसरे मास्टर प्लान में शुरुआत से ही देरी होने लगी। इसको शुरू करने का निर्धारित वर्ष 1981 था लेकिन 1990 तक यह मास्टर प्लान प्रकाशित नहीं हो पाया। आपातकाल के बाद सन् 1977 में दिल्ली में सत्ता में आई नई सरकार ने डीडीए को निर्देशित किया कि ‘वह दिल्ली 2001 के लिए दृष्टिकोण प्लान यानी ‘पर्सपेक्टिव प्लान’ तैयार करे’, इसे ही दूसरा मास्टर प्लान16 कहा गया। हालांकि डीडीए ने पहले मास्टर प्लान के समाप्त होने के चार साल तक यानी 1985 तक योजना का कोई ड्राफ्ट सार्वजनिक नहीं किया।17 केंद्र सरकार के शहरी विकास मंत्रालय ने इस प्लान को दशक के अंत तक स्वीकृति ही नहीं दी। प्लान में हुई इस देरी को प्रस्तावित मास्टर प्लान और 1985 में गठित नेशनल कैपिटल रिज़नल प्लॉनिंग बोर्ड द्वारा बनाए गए क्षेत्रीय प्लान के बीच टकराव के रूप में भी देखा गया।18

जैसा कि हमने देखा कि मास्टर प्लान के निर्माण और स्वीकृति में देरी हुई, ऐसे में डीडीए को बढ़ रही घरों की मांग को पूरा करने में खूब मशक्कत करनी पड़ी। परिणामस्वरूप प्राधिकरण को 1981 और 1985 के बीच अतिरिक्त हाउसिंग स्कीमें लागू करनी पड़ी। 1991 में मैत्रा द्वारा प्रकाशित आंकड़े—जिनमें डीडीए की परफार्मेंस रिपोर्ट, 1986-87 का उल्लेख है—दशक के पहले पांच सालों में प्राधिकरण की कार्यकुशलता पर विशेष ध्यान दिया गया। इस शोध पर्चे में आय समूह के आधार पर आवासों की उपलब्धता में कमी से जुड़े आंकड़ों को प्रस्तुत किया गया। मैत्रा का आंकलन दो मान्यताओं पर आधारित है। क) आवासों के लिए पंजीकृत लोगों की संख्यां मांग को दर्शाती है, और ख) प्राधिकरण द्वारा आवंटित किये आवासों की संख्या पूर्ती यानी सप्लाई को दिखाती है। । इससे संबंधित आंकड़ों को नीचे तालिका 1 में दर्शाया गया है जिनके अनुसार 2,40,387 लोगों ने आवासों के लिए आवेदन किया था पर उनमें से केवल 85,168 (करीब 35 प्रतिशत) को ही आवास आवंटित हुआ। दूसरे शब्दों में मांग की तुलना में आवासों की पूर्ति करीब 64.5 फीसदी कम थी।(देखें तालिका 1)

 

तालिका-1
आवास संबंधी मांग और पूर्ति, 1986-87

आय के आधार पर वर्ग आवेदकों की संख्या (मांग) आवास आवंटन की संख्या (पूर्ति) कमी 
(Demand minus Supply)
मध्यम आय समूह (एमआईजी) 47,521(19%) 9,500(11%) 38,021(24%)
निम्न आय समूह (एलआईजी) 67,502(28%) 15,320(17%) 52,182(34%)
आर्थिक रूप से कमज़ोर तबका (ईडब्लूएस)) 56,247(23%) 21,887(24%) 35,162(23%)
स्व-वित्तीय स्कीम (एसएफएस) 69,115(30%) 39,261(58%) 29,854(19%)
कुल 240,387 85,168 155,219

स्रोत-डीडीए परफार्मेंस रिपोर्ट,1986-87,मैत्रा,199119

नब्बे के दशक में हिन्दुस्तानी आर्थिक उदारीकरण की रफ़्तार में डीडीए के आवास वितरण में भी बहुत तेज़ी से बदलाव आया। 1994 की शुरुआत में बहुत सारी नई सरकारी नीतियों के ज़रिये भूमि और हाउसिंग के संबंध में सरकारी नियंत्रण को कम किया गया, जिसका प्रभाव डीडीए की योजनाओं के संबंध में भी देखा गया। इस अवधि में डीडीए ने अपनी संपत्ति-अधिकार संबंधी नीतियों में भी बदलाव किया जिसके अंतर्गत पट्टे के अधिकार यानी लीज़ होल्ड से आवासों पर मुक्त स्वामित्व यानी फ्री होल्ड स्थापित किया गया।

एडलर (2014) ने यह विश्लेषण किया है कि इस प्रकार का बदलाव कमर्शियल प्रॉपर्टी के संदर्भ में भी हुआ:

1993-94 की वार्षिक रिपोर्ट में डीडीए खूब शेखी बघारते हुए कहता है कि किस तरह उसने ‘शॉपिंग सेंटर्स को बेचा….. बिना दुकानें बनाए कमर्शियल साइट की नीलामी की’, इस रणनीति के अंतर्गत जो भी नीलामी में बोली जीतेगा वह डीडीए के नियमों के अनुसार वहां कमर्शियल साइट का निर्माण कराएगा। इस प्रकार डीडीए ने दिल्ली डेवलपमेंट एक्ट, 1957 में निहित सार्वजनिक क्षेत्र के विकास संबंधी उत्तरदायित्वों को निजी क्षेत्र के ज़िम्मे छोड़ दिया यानी ‘आउटसोर्स’ कर दिया, जिससे सार्वजानिक-निजी साझेदारी यानी पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप के नए रूप का उदय हुआ। इस रिपोर्ट के अनुसार, ‘इस कदम को बहुत अच्छी प्रतिक्रियाएं मिलीं और यह निजीकरण की दिशा में एक बेहद मज़बूत पहल के तौर पर देखा गया’।20

दिल्ली के बाश़िंदों के लिए इसका प्रभाव मिला जुला रहा। दिल्ली के वैसे बाश़िंदे जो डीडीए द्वारा आवंटित ज़मीन पर कानूनी रूप से निवास कर रहे थे, उन्हें फायदा हुआ। ज़मीन पर पूर्ण स्वामित्व की वजह से अफ़सरशाही के पचड़ों में कमी आई। इसने पूंजी निर्माण और निवेश से जुड़े नए अवसरों को भी पैदा किया। स्पष्ट है कि नए शॉपिंग सेंटरों को बढ़ावा देने के डीडीए के वायदों से मध्यमवर्गीय बाश़िंदे काफी आकर्षित भी हुए। उदारीकरण के पक्ष में बहते रुख ने रियल एस्टेट पर और दबाव बढ़ाया जिससे गैर-नियोजित निवासों, झुग्गी- झोपड़ियों पर गाज़ गिरने के संकेत मिलने लगे। इस ही दिशा में जब डीडीए ने वित्तीय मुनाफ़े के लिए अपनी ज़मीनों की नीलामी करनी चाही तो इन ज़मीनों पर मौजूद अनियोजित रिहायशों का ‘अतिक्रमण’ इस प्रक्रिया में एक बड़ी बाधा था। असल में अब डीडीए के पास जो ज़मीन थी उसका मूल्य केवल उसके उपयोग (यूज़ वैल्यू) में ही नहीं था बल्कि अब उसे वित्तीय लाभ के लिए बेचा भी जा सकता था यानी अब इस ज़मीन का विनिमय मूल्य (एक्सच़ेंज वैल्यू) भी था।

तीसरा मास्टर प्लान (2001…से अब तक): एक नया नज़रिया?
दूसरे मास्टर प्लान के अंतिम दशक से ही डीडीए में बदलाव साफ़ दिखने लगा जिसमें विकास के लिए प्राधिकरण का निजी क्षेत्र की ओर झुकाव स्पष्ट था। यह डीडीए के चरित्र में साफ बदलाव के रूप में देखा जा सकता है। 2003-04 के वार्षिक रिपोर्ट से यह बात रेखांकित होती है कि डीडीए के स्टाफों की संख्या में लगातार कटौती की गई। 2004 में प्राधिकरणने सूचित किया कि 1993 से तबतक इसके स्टाफों की संख्या में 20 फीसदी की कमी आई है और ये 21,396 तक सीमित हो गई है। इसके साथ ही साथ डीडीए के वित्तीय प्रबंधन में भी महत्वपूर्ण बदलाव देखा गया। नई शताब्दी के पहले कुछ सालों में, ऐसा प्रतीत होता है कि प्राधिकरण ने वित्तीय प्रबंधन के लागत-वसूली पर आधारित मॉडल से दूर हटकर, एक ऐसे मॉडल को अपनाया जिसमें इसके खाते में मौजूद पैसे को बढ़ाने पर ज़ोर दिया गया। इसको डीडीए के मुख्य खाते में प्राप्तियों और खर्चों के बीच बढ़ते अंतर के रूप में देखा जा सकता है। (देखें- बॉक्स 2)

बॉक्स-2: वित्तीय प्रबंधन में बदलाव
यहां हम डीडीए के वित्त को नजूल खाता II (एन.ए II) में संग्रहित देख सकते हैं। यह डीडीए के ज़मीन अधिग्रहण, विकास और ब्रिकी के लिये उत्तरदायी है। इस खाते के अंदर की प्राप्ति में ज़मीन की ब्रिकी प्रक्रिया और ज़मीन के किराया की रिकवरी को भी जोड़ा जाता है।
यदि कुल प्राप्ति को आंकड़े के लिहाज़ से समझने की कोशिश करें तो 2001-02 में जहां रु 4.78 सौ करोड़ की प्राप्ति हुई वहीं 2002-03 में करीब 40 प्रतिशत उछाल के साथ यह रु 7.05 सौ करोड़ दर्ज किया गया। 2003-04 में नज़ुल खाते के अंतर्गत प्राप्ति रु 24.66 सौ करोड़ थी जो पिछले वर्ष के मुकाबले 350 प्रतिशत अधिक थी21 इसी तरह 2006-07 में भारी उछाल के साथ रु 44.24 सौ करोड़ दर्ज की गई जो 2001-02 की तुलना में करीब 10 गुणा अधिक है।22

इस खाते के अंतर्गत खर्च, जिसमें में ज़मीन अधिग्रहण और विकास पर हुए व्यय भी शामिल होते हैं। इसमें भी इन वर्षों में इजाफ़ा देखा गया। लेकिन ध्यान देने योग्य बात यह है कि इसमें उस रफ़्तार से इजाफ़ा नहीं हुआ जैसा कि इस ही खाते की प्राप्तियों में देखा गया। जिसकी वजह से खर्चों और प्राप्तियों के बीच का अंतर बढ़ता गया। 2001-02 में खर्च प्राप्तियों से अधिक थे, परंतु 2006-07 में प्राप्ति तुलना में खर्च करीब 27.6 प्रतिशत दर्ज किये गए।

 

तालिका क
नजूल खाता- II
(सौ करोड़ रूपयों में)
2001-02 2002-03 2003-04 2004-05 2005-06 2006-07
प्राप्ति 4.78 7.05 24.66 23.10 19.31 44.24
खर्च 7.39 9.40 6.75 10.47 16.68 12.22
प्राप्तियों में से खर्चों को घटाने पर -2.60 -2.35 17.91 12.63 2.63 32.01

(स्रोत- डीडीए की विविध वार्षिक प्रशासनिक रिपोर्टें)

 

हम एक छोटे पैमाने पर इसी से मिलता-जुलता रुझान डीडीए के जनरल डेवेलपमेंट खाता में भी देख सकते हैं। यह खाता आवासीय और शॉपिंग सेंटर के प्रत्यक्ष विकास के लिए फंड मुहैया कराता है। 2003-04 को छोड़कर, हम इस खाते में भी नजूल खाते -II की ही भांति नकद रिज़र्व में बढ़ोतरी का रुझान को देख सकते हैं।

 

तालिका ख
सामान्य विकास खाता

(सौ करोड़ रूपयों में)
2001-02 2002-03 2003-04 2004-05 2005-06 2006-07
प्राप्ति 4.86 4.88 5.22 10.04 7.57 9.34
खर्च 4.36 4.87 5.73 5.72 5.77 7.87
प्राप्तियों में से खर्चों को घटाने पर 0.50 0.01 -0.51 4.32 1.80 1.46

(स्रोत- डीडीए की विविध वार्षिक प्रशासनिक रिपोर्टें)

मास्टर प्लान 2021 के अंतर्गत प्रमुख रूप से कई बदलावों को रेखांकित किया गया जिसमें विकासवादी उपकरण के तौर पर पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप प्रमुख है। इस हालिया मास्टर प्लान को 2007 के शुरुआत में अपनाया गया। इस तरह एक बार फिर एक मास्टर प्लान की अवधि की समाप्ति( 1981-2001) और नए मास्टर प्लान के मंजूर होने के बीच में एक बड़ा अंतराल था। साफ तौर पर डीडीए द्वारा आवासों के निर्माण में कटौती के परिणामस्वरूप दिल्ली में गैर-नियोजित निवासों की संख्या में तीव्र बढ़ोतरी देखी गई। दिलचस्प है कि डीडीए ने दिल्ली में पर्याप्त मात्रा में आवास मुहैया न करा पाने की अपनी विफलता की जिम्मेदारी तो ली परंतु बहुत ही निक्रिय अफ़सरशाही ज़ुबान में–

…1991 तक संस्थागत एजेंसियों के माध्यम से मुहैया कराये गए घरों का हाउसिंग स्टॉक में केवल 53 प्रतिशत का ही योगदान था (इसमें अवैध रूप से सार्वजनिक ज़मीन पर बनाये घर शामिल नहीं हैं)। इस प्रकार गैर-संस्थागत स्रोतों जैसे अनाधिकृत कॉलोनी, झुग्गी-झोपड़ी/अवैध रूप से सार्वजनिक ज़मीन पर बनाये घरों की हाउसिंग में महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। यह प्रवृति हालिया दशक में भी जरी रही।23

यहाँ डीडीए जो कह रहा है वह कभी किसी से छुपा नहीं है: दिल्ली कि अनियोजित रिहायाशें, जो शहर की तीन-चौथाई से अधिक आबादी24का घर हैं, डीडीए की अपनी ही विफलताओं का परिणाम हैं। एक इंटरव्यू में डीडीए के बड़े अफ़सर ने बहुत बेबाकी से शहर में आवासों की कमी की वजह बेहद सीमित प्लानिंग संबंधी दृष्टि (या विज़न) को माना। उन्होंने अपने विचारों को इस प्रकार व्यक्त किया- ‘शहरी विकास की योजना बनाने वाले योजनाकारों की पूरी प्लानिंग या योजना में समाज के आर्थिक रूप से सबसे कमज़ोर तबकों को उपेक्षित किया गया है’।25

सवाल यह उठता है कि पिछले दशक में डीडीए में जो खामियां देखी गईं उन्होंने ज़मीनी हालातों को कैसे बदला है? अगले हिस्से में हम साल 2003 से डीडीए के काम पर प्रकाश डालेंग। हम इस बात की पड़ताल करेंगे कि प्लानिंग में बदलाव का जो हालिया दौर है, क्या उसमें डीडीए का प्रदर्शन सुधरा है।

ज़मीनी हालात

आज डीडीए की पूरी ताकत के दो मूल स्त्रोत हैं: इसका मूल योजना संबंधी जनादेश और इसके नियंत्रण में बहुतायत में मौजूद ज़मीन। अप्रैल 2014 में, प्राधिकरण ने पूरे दिल्ली शहर की करीब 90,326 एकड़ ज़मीन 25 फीसदी यानी पर पकड़ बना रखी थी।26 शुरुआती समय से ही प्राधिकरण मास्टर प्लान की सहायता से ज़मीन के प्रयोग संबंधी योजना बनाता रहा है, ज़मीन के अधिग्रहण और उसके विकास में लगा रहा है। आज के बदलते समय में डीडीए की प्राथमिकताओं को समझने के लिए हमें इसके द्वारा पिछले एक दशक में जारी आंकड़ों को देखना होगा। इसके अंतर्गत हम प्राधिकरण द्वारा अधिगृहित ज़मीन, बनाये गए आवास और इसकी ज़मीनों से हटाई गयी गैर-नियोजित रिहायशों आंकड़ों का विश्लेषण करेंगे ।

पिछले एक दशक में ज़मीन के अधिग्रहण में तेज़ी आई है। साल 2001 से डीडीए ने अब तक करीब 11,625.837 एकड़ ज़मीन पर अपना अधिकार स्थापित किया है। इस दौरान अधिग्रहण के माध्यम से ली गयी ज़मीन की मात्रा अलग-अलग सालों में अलग रही है। उदाहरण के लिए, जहां 2005-06 में 3,426.96 एकड़ भूमि का अधिग्रहण हुआ वहीं साल 2008-09 में केवल 11.56 एकड़ भूमि का ही अधिग्रहण हो पाया। (देखें- तालिका 2)

तालिका 2
भूमि अधिग्रहण, 2001-13

वर्ष अधिग्रहित ज़मीन जिस पर डीडीए का भौतिक कब्ज़ा मौजूद है(Land handed over by LAC to DDA) (एकड़ में)
2001-02 473.25
2002-03 2,095
2003-04 770.697
2004-05 1,765
2005-06 3,426.96
2006-07 1,932.58
2007-08 551.86
2008-09 11.56
2009-10 73.23
2010-1127 उपलब्ध नहीं
2011-12 329.08
2012-13 196.62
कुल 11,625.837

(स्रोत- 2003-04 से 2012-13 तक डीडीए की विभिन्न वार्षिक रिपोर्टों से संग्रहित)

तालिका 3
आवासीय निर्माण, 2003-13

वर्ष एचआईजी एमआईजी एलआईजी ईडब्लूएस/जनता कुल
2003-04 416 492 704 64 1,676
2004-05 उपलब्ध नहीं 9,89628
2005-06 856 886 828 0 2,570
2006-07 140 496 2,445 0 3,081
2007-08 66 100 100 0 266
2008-09 216 0 970 0 1,186
2009-10 336 24 3,920 0 4,280
2010-11 उपलब्ध नहीं
2011-12 1,733 16 3,502 3,050 8,301
2012-13 716 0 1,080 0 1,796
बनाये गए घरों की कुल संख्या 4,479 2,014 13,549 3,114 33,052

(स्त्रोत- 2003-04 से 2012-13 तक डीडीए की विभिन्न वार्षिक रपटों से संग्रहित)

ज़मीन का कोई टुकड़ा जिसे अधिग्रहण के बाद डीडीए आवासीय निर्माण के लिये चिन्हित करता है, को प्राधिकरण का इंज़ीनियरिंग और कंट्रक्शन डिपार्टमेंट तुरंत अपने हाथों में ले लेता है। शुरुआत से ही, किसी हाउसिंग इकाई को चार समूहों में वर्गीकृत कर दिया जाता है। एचआईजी (उच्च आय समूह), एमआईजी (मध्यम आय समूह), एलआईजी (निम्न आय समूह) और ईडब्लूएस (आर्थिक रूप से कमजोर तबका)। इसमें प्रत्येक समूह के अंतर्गत डीडीए द्वारा वास्तव में निर्मित आवासों की संख्या को तालिका-3 में दिखाया गया है। इसके अनुसार, 2005 से 2010 के बीच डीडीए द्वारा एक भी जनता फ्लैट नहीं बनाया गया। इन्हीं वर्षों में कॉमनवेल्थ गेम्स संबंधी इन्फ्रास्ट्रक्चर के निर्माण के लिए पूरे शहर से अवैध और अनियोजित बस्तियों को उजाड़ा जाने लगा था।29 इस प्रक्रिया में बेघर हुए लोगों को दूर-दराज़ के इलाकों में पुनर्वास कॉलोनियों में बसाया गया। जब प्राधिकरण के द्वारा बनाये गए घरों की संख्या को उस समय बस्तियों के हटाये जाने के तथ्य के साथ देखा जाए तो पता चलता है कि डीडीए ने अपने द्वारा तोड़े गए ‘अवैध’ घरों की जगह और विस्थापित हुए लोगों के लिए घर बनाने को कभी अपनी ज़िम्मेदारी नही समझा।

डीडीए ने पिछले कई वित्तीय वर्षों से आवासीय विकास हेतु अपने लिए सालाना लक्ष्य रखें हैं। हालाँकि इन लक्ष्यों और उनसे जुड़े अन्य आंकड़ों की वास्तविक मांग से तुलना करना कठिन है। डीडीए के लक्ष्यों और इसके द्वारा वास्तव में बनाये गए आवासों के आंकड़ों पर नज़र डालने से पता चलता है कि प्राधिकरण खुद तय किये वार्षिक लक्ष्यों को प्राप्त करने में विफल रहा है। दूसरे शब्दों में, आवासों का अभाव केवल यह ही नहीं दर्शाता कि डीडीए पर्याप्त मात्रा में आवास मुहैया कराने में विफल रहा है बल्कि इससे यह भी पता चलता है कि प्राधिकरण आवासों के लिए योजना बनाने और उनके निर्माण में भी बेहद अक्षम साबित हुआ। (देखें- तालिका 4)

तालिका 4
आवासीय निर्माण में कमी, 2003-10

वर्ष आवासीय निर्माण का लक्ष्य वास्तव में निर्मित आवास  लक्ष्य का प्रतिशत
2003-04 5,919 1,676 28.3%
2004-05 12,662 9,896 78.2%
2005-06 8,695 2,570 29.6%
2006-07 5,070 3,081 60.8%
2007-08 266 266 100%
2008-09 1,046 1,186 113.4%
2009-10 8,997 4,280 47.6%
कुल 42,655 22,955 53.8%

(स्रोत- 2003-04 से 2012-13 तक डीडीए की विभिन्न वार्षिक रिपोर्टों से संग्रहित)

तालिका-4 से स्पष्ट है कि इस दौरान केवल दो बार डीडीए अपने लक्ष्य को प्राप्त कर पाया । इसके अलावा सभी वर्षों में डीडीए अपने लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर सका। यह ध्यान देने योग्य बात है कि जिन दो सालों में डीडीए ने अपने लक्ष्य को हासिल किया, वे इस पूरी अवधि के दौरान सबसे कम थे यानी इन लक्ष्यों के अंतर्गत बनाये जाने वाले घरों की संख्या काफी कम थी। यह भी स्पष्ट है कि इन नौ सालों के दौरान निर्धारित लक्ष्यों के अंतर्गत घरों की ज़रुरत को बेहद कम करके आंका। हालांकि हमारे पास आवास की वास्तविक मांग को मापने का कोई मापदंड नहीं है लेकिन 2001 और 2011 के दौरान—जो दो जनगणनाओं के बीच का अंतराल है—वास्तव में बनाये घरों—नियोजित एंड अनियोजित—में वृद्धि से हम एक मोटा-मोटा अंदाज़ा लगा सकते हैं। हालाँकि हमारे पास घरों के वास्तविक मांग का कोई आंकड़ा नहीं है पर इन आंकड़ों का जायज़ा लेने पर हमें पता चलता है कि 2003 से 2010 के बीच दिल्ली में करीब 1 मिलियन आवासों का निर्माण हुआ। इनमें नियोजित और गैर-नियोजित, दोनों तरह के आवास शामिल है। इसी दौरान डीडीए ने केवल 23,000 नए आवास बनाये।(देखें- तालिका 5)

तालिका 5
वास्तविक निर्माण, 2001-11

वर्ष घरों का निर्माण बढ़ोतरी
2001 3379956*
2002 3486167^ 106211
2003 3595715^ 109548
2004 3708705^ 112991
2005 3825246^ 116541
2006 3945450^ 120203
2007 4069430^ 123980
2008 4197307^ 127876
2009 4329201^ 131895
2010 4465241^ 136039
2011 4605555* 140314
2003-10 कुल: 979,073

* हाउसिंग सेंसस 2001 व हाउसिंग 2011 से हाउसिंग लिस्टिंग का वास्तविक आंकड़ा
^ कंपाउंड वार्षिक वृद्धि दर के आधार पर किया गया अनुमान।

परंतु यदि हम आवास संबंधी आकलित ज़रुरतों और वास्तविक आवासों की संख्या के अंतर को किनारे कर दें तो हम डीडीए की आंतरिक कार्यप्रणाली के संबंध में कुछ निष्कर्ष निकाल सकते हैं। पहला, यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि डीडीए के आवास बनाने के लक्ष्य और वास्तव में इसके द्वारा बनाये गए आवासों के बीच का अंतर और उससे पैदा हुआ घरों का अभाव और चिंताजनक हो जाता है जब हम प्राधिकरण के आवंटन की तरीके पर नज़र डालते हैं। इस प्रकार, डीडीए ने 2003-04 और 2009-10 के बीच करीब 34,512 आवासीय यूनिटों का आवंटन किया जिसमें करीब 20,557 आवास 2003 से पहले बनकर तैयार थे और आवंटित नहीं हुए थे। इस दौरान बने करीब 9,000 आवास 2010 तक खाली पड़े थे।[30

दूसरे शब्दों में, 2003 से 2010 के बीच डीडीए का लक्ष्य था कि वह ने करीब 42,655 मकान बनाए और उनका आवंटन करे । यहां करीब 13,955 का ही निर्माण हुआ और आवंटित किया जा सका। बचे हुए करीब 29,200 मकानों का निर्माण नहीं हो पाया। निश्चित तौर पर यह संख्या डीडीए की संगठनात्मक अक्षमता को प्रदर्शित करता है। साथ ही साथ इससे यह भी स्पष्ट होता है कि प्राधिकरण अपनी क्षमता को ठीक से नहीं आंक पा रहा है। परिणामस्वरूप प्राधिकरण बार-बार अपने लिए लक्ष्य तय करता है और लगभग हर बार ही अपने द्वारा तय लक्ष्य तक नहीं पहुंच पाता है।

डीडीए द्वारा अपनी अक्षमता को नहीं भांपने का ही परिणाम है कि डीडीए के प्लानिंग और क्रियान्वयन स्तर में गहरा अंतर है, जिसका गंभीर प्रभाव दिल्ली के बाशिंदों पर पड़ता रहा हैं। एक तरफ डीडीए बड़ी तादाद में दिल्ली में ज़मीन को अधिग्रहित करता है, शहर में ज़मीन के एक बड़े हिस्से पर अपना नियंत्रण रखता है और उस ज़मीन को विकसित करने के अपने एकाधिकार को बनाए रखता है। दूसरी तरफ डीडीए दिल्ली के बाशिंदों के लिए ज़रुरत के मुताबिक मकान मुहैया कराने में विफल रहा है। परिणामस्वरूप दिल्ली की एक बड़ी आबादी आज गैर-नियोजित रिहायशों में रहने को विवश है, जिन्हें अतिक्रमण के रूप में देखा जाता है, और ये निवासी अपने घरों को तोड़े जाने के डर के साये में जीते हैं। इन तथ्यों पर नज़र डालने से निश्चित तौर पर डीडीए का दोमुंहा चरित्र उज़ागर होता है। आज अतिक्रमण के नाम पर डीडीए जिन समस्याओं से जूझ रहा है, उसका ज़िम्मेदार वह खुद ही है।

पिछले दशक की बहुत सी वार्षिक रिपोर्टों में अथॉरिटी ने यह रेखांकित किया कि वह अपनी ज़मीन की अतिक्रमण से रक्षा करेगा। जिसके लिए ‘वर्किंग सिस्टम फॉर लैंड प्रोटेक्शन’ की स्थापना की गई है।31 वार्षिक रिपोर्टों में निगरानी की इस व्यवस्था को इस रूप से विवेचित किया गया– ‘डीडीए की ज़मीन की नियमित देखरेख और निगरानी सुरक्षा बल के हाथों में रहती है, जिनको ख़ास बीट एरिया सौंपें गए है। नियमित रूप से अतिक्रमण की किसी भी कोशिश के जवाब में पुलिस की सहायता से ऐसे अतिक्रमण हटा दिए जाते हैं।32 2001 से 2013 के बीच झुग्गी-झोपड़ियाँ हटाये जाने संबंधी आंकड़ों से स्पष्ट है कि प्रत्येक वर्ष झुग्गी-झोपड़ियाँ हटाने की औसतन 364 कार्यवाहियाँ की गई। इससे डीडीए ने दिल्ली में करीब 50,000 झुग्गियां हटाकर लगभग 1,500 एकड़ ज़मीन पर ‘वापिस अपना अधिकार स्थापित किया’।33 यह आंकड़े 2000 के दशक शुरुआती सालों में कामनवेल्थ गेम्स के नाम पर बड़े स्तर पर अतिक्रमण हटाने के अभियान की ओर इशारा करते हैं। (देखें- तालिका 6)

तालिका 6
अतिक्रमण हटाने की कार्यवाहियां, 2001-13

वर्ष अतिक्रमण हटाने के अभियानों की संख्या झुग्गी-झोपड़ी हटाकर प्राप्त की गयी ज़मीन (acres) हटाए गए संरचनाओं/ घरों34 की संख्या
2001-02 460 164.84 5,906
2002-03 472 374.54 14,567
2003-04 354 259.44 13,077
2004-05 उपलब्ध नहीं
2005-06 344 158.9 4,495
2006-07 402 168.67 4,388
2007-08 646 95.91 3,245
2008-09 199 38.09 1,325
2009-10 278 138.84 3,432
2010-11 उपलब्ध नहीं
2011-12 258 50.238 2,642
2012-13 229 85.574 1890
कुल 3642 1535.042 54,967

(स्त्रोत- 2003-04 से 2012-13 के बीच डीडीए की वार्षिक रिपोर्टों से प्राप्त)

जिस अवधि (2003-2010) के लिए हमारे पास डीडीए द्वारा आवासीय निर्माण से जुड़े आंकडें हैं, उस ही दौरान डीडीए ने करीब 29,962 आवासों को अतिक्रमण हटाने की कार्यवाहियों के तहत तोड़ा है, असल में इस ही अवधि में तोड़े गए घरों की संख्या डीडीए के द्वारा बनाये गए घरों से करीब 7,000 से अधिक थी। यह डीडीए के विरोधाभास को प्रस्तुत करता है। इस तरह शहर में आवासीय अभाव और गंभीर हो जाता है और ऐसे लोगों की पहले से ही लंबी फ़ेहरिस्त में और बढ़ोतरी हो जाती है जिन्हें घरों की ज़रुरत है, जो डीडीए उन्हें मुहैया नहीं करा पा रहा है।

यहां महत्वपूर्ण है कि यह विश्लेषण डीडीए के अपने आंकड़े पर आधारित है। बहुत से विशेषज्ञ इन वर्षों में अतिक्रमण हटाने की कार्यवाहियों की संख्या को डीडीए द्वारा दर्ज संख्या से बहुत अधिक आंकते हैं। भान (2009) के अनुसार 2004 से 2007 के दौरान लगभग 45000 घर तोड़े गए।35 डीडीए के घरों को हटाने से जुड़े आंकड़ों को कम करके प्रस्तुत करने की आशंका से ज़्यादा ध्यान देने योग्य प्राधिकरण की इस पूरी प्रक्रिया में इस्तेमाल की जाने वाली भाषा है जो घरों के तोड़े जाने के मानवीय पहलू को पूरी तरह से नज़रअंदाज़ करती है जिसका एक उदाहरण हमें प्राधिकरण की वार्षिक रिपोर्टों में इस्तेमाल की गई अवैयक्तिक भाषा में देखने को मिलता है। 2003-04 की वार्षिक रिपोर्ट में अथॉरिटी ने उल्लेखित किया है–

भूमि प्रबंधन विभाग (लैंड मैनेजमेंट डिपार्टमेंट) ने इस वर्ष में कुछ महत्वपूर्ण अतिक्रमण हटाने की कार्यवाहियां की जिसे भूमि माफिया को छोड़कर समाज के सभी वर्गों और प्रेस के लोगों की खूब प्रशंसा मिली।

डीडीए के निर्णयों को सभी से वाहवाही मिलने के दावे को हर साल इसके खिलाफ कोर्ट केसों के ज़रिये बेहतर समझा जा सकता है। 2005 से 2013 के दौरान प्रति वर्ष करीब 11,000 से 18,000 डीडीए से जुड़े मामले कोर्ट में लंबित पड़े रहे। इन मामलों में अधिकतर भूमि प्रबंधन, भूमि निपटान और हाउसिंग डिपार्टमेंट से संबंधित थे। यह निश्चित तौर पर दिल्ली में डीडीए और अन्य साझेदारों के बीच के अंतहीन रस्सा-कस्सी को व्यक्त करता है।

प्राधिकरण ने निश्चित तौर पर अपने विवादास्पद और जटिल प्रक्रियाओं में गति लाने के लिए कुछ प्रतिबद्धता भी दिखाई है। इसी उद्देश्य से डीडीए ने 2008 में ‘इन-सीटू स्लम रेहबिलिटेशन’ की पहली झुग्गी पुनर्वास योजना की शुरुआत की। इसका उद्देश्य एक ऐसी पुनर्वास योजना अपनाना था जिसमें झुग्गी वासियों के आजीविका के साधन प्रभावित न हों।36 इस प्रक्रिया के तहत पहले से मौजूद झुग्गियों को तोड़कर उनकी जगह एक बड़ी बिल्डिंग का निर्माण किया जाता है जिनमें झुग्गी-वासियों को घर दिए जाते हैं। सरकार ने इस ही प्रक्रिया से मिलती-जुलती रणनीति पुनर्वास कॉलोनियों में भी अपनाई है जिसमें झुग्गी-झोपड़ी कॉलोनी से विस्थापितों को पुनर्वास कॉलोनियों में खाली प्लाट की जगह अब तैयार फ्लैट दिए जाते हैं। 2010 में दिल्ली शहरी आश्रय सुधार बोर्ड(DUSIB) की शुरुआत की गई जिसे झुग्गी-झोपड़ी से विस्थापितों के लिए एकल समन्वयकारी एजेंसी के रूप में स्थापित किया गया। यह दिल्ली में गैर-नियोजित रिहायशों से जुड़ा एक और महत्वपूर्ण कदम था और इससे सम्बंधित पुर्नवास के लिए दिशा-निर्देश पुरानी नीतियों की तुलना में बेहद स्पष्ट थे।37

इसके बावजूद दिल्ली शहरी आश्रय सुधार बोर्ड की प्रगति काफी सीमित दिखाई पड़ती है।38 देखें स्लम डेज़ेग्नेटेड एरिया, झुग्गी-झोपड़ी बस्तियां (जेजेसी), और पुनर्वास कॉलोनियां।39 इन रिहायशों के बाशिंदों को अभी भी उनके घरों को तोड़े जाने के डर में जीना पड़ता है। डीडीए द्वारा इसकी ज़मीन की ‘सुरक्षा’ के लिए लगाए गए सुरक्षा गार्ड कई बार गैर-कानूनी तरीके से घूस और लेन-देने की वारदात में लिप्त पाए जाते हैं। अक्सर किसी झुग्गी में नया निर्माण करवाना हो या नई दीवार, या अपने मकान में नई मंजिल जोड़ना हो, इन सब कार्य में सुरक्षा गार्ड घूस लेकर उन्हें अनुमति दे देते हैं। इस वर्ष डीडीए ने कहा कि वह एक नई रियल टाइम डिजिटल चौक़सी या सर्वेलेंस के ज़रिये 1,500 एकड़ इसकी अतिक्रमण वाली ज़मीन पर नज़र रखेगा। निगरानी के इस तरीके में वीडियो फुटेज़ के साथ-साथ जीआईएस डाटा और सेटेलाइट से प्राप्त सूचना के ज़रिये इन इलाकों में नए निर्माण पर नज़र रखी जा सकेगी।40

बॉक्स 3: क्या मास्टर प्लान सचमुच इतना सख्त़ है ?

डीडीए अफ़सरों ने यह बताते है कि सख्त मास्टर प्लान के कारण ही डीडीए के कई प्रगतिशील कदम बाधित हो रहे हैं। मास्टर प्लान ज़मीन का प्रयोग परिभाषित करता है जिसकी वजह से अनियोजित रिहायशें अपने आप ‘अतिक्रमण’ बन जाती है। जैसा कि डीडीए के अफ़सर कहते हैं शहर के गैर-नियोजित रिहायशों के प्रति उनके मन में कितनी ही सहानुभूति हो, पर उन्हें एक कानूनी ढांचे के अन्दर रहकर ही काम करना होता है। यह कानूनी ढांचा एक हद तक मास्टर प्लान से तय होता है। इसे बदलने के लिए अगले मास्टर प्लान को बदलने की ज़रुरत है जो बहुत जटिल, बोझिल और अफ़सरशाही युक्त प्रक्रिया से गुज़रकर ही संभव है। एक सीनियर अफ़सर ने बहुत बैचेनी से कहा कि मास्टर प्लान के रूप में दोहरी बेड़ियां डाल दी गई हैं। एक तरफ इस प्लान से बाहर जाकर कुछ नहीं किया जा सकता है तो वहीं दूसरी तरफ इस प्लान के ज़रिये भी कुछ नहीं किया जा सकता क्योंकि यह बेहद सख्त है। 41 There is, however,हालाँकि एक बार शहर की ज़रूरत को देखते हुए मास्टर प्लान में संशोधन किया गया है। 2006 में सीलिंग ड्राइव के बाद दिल्ली में आवासीय क्षेत्र में सभी प्रकार की कमर्शियल गतिविधियों पर प्रतिबंध लगाया गया। जिसके बाद मास्टर प्लान का संशोधन मिश्रित विकास के उद्देश्य से किया गया। निश्चित तौर पर यह आधिकारिक निर्णय मास्टर प्लान से जुड़ी इस संकल्पना के बिल्कुल उलट था कि यह बहुत सख्त है जिसमें कोई भी परिवर्तन नहीं लाया जा सकता।

जब सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला दिया कि मास्टर प्लान द्वारा चिन्हित आवासीय प्रयोग वाले इलाके में गैर-आवासीय कार्यों को रोका जाना चाहिए। इसके तुरंत बाद एमसीडी ने आवासीय क्षेतत्रों में निर्मित कमर्शियल ठिकानों पर तालेबंदी शुरू कर दी। इसके बाद इससे प्रभावित हज़ारों व्यापारी और दुकानदार सड़क पर आकर विरोध-प्रदर्शन करने लगे। आगे कुछ समय तक इसी प्रकार सुप्रीम कोर्ट और विरोध कर रहे व्यापारियों और दुकानदारों के बीच तनाव बना रहा।

सितंबर 2006 में भारत सरकार के शहरी विकास मंत्रालय ने एक नोटिफिकेशन को अनुमोदित किया जिसके अंतर्गत 2001 के मास्टर प्लान में भारी संशोधन किया गया। इसके अंतर्गत आवासीय परिसर में गैर-आवासीय गतिविधियों की अनुमति दी गई। हालांकि इसके बावजूद एमसीडी के द्वारा सीलिंग भी जारी थी जिसने व्यापारियों और सुप्रीम कोर्ट के बीच की तनातनी को बरकरार रखा।

अंतत: फरवरी 2007 में जब दिल्ली का मास्टर प्लान नोटिफाइ हुआ तो इसमें भूमि के मिश्रित के इस्तेमाल को भी शामिल किया गया। इस रेगुलेशन ने रिहायशी इलाकों में गैर-रिहायशी गतिविधियों की अनुमति दी। इसे मास्टर प्लान में संशोधन लाये जाने की एक बड़ी मिसाल माना गया। 42

डीडीए के भीतर…

भारत में आए आर्थिक बदलाव और प्राधिकरण के बढ़ते आत्मसुधार की डुगडुगी के बावजूद कड़वा सच यह है कि डीडीए अपने किए वायदों पर खरा नहीं उतर पाया। संगठन की आंतरिक संरचनाएं, संस्कृति और प्रक्रियाएं जब से इसकी स्थापना हुई है तब से बहुत ज़्यादा नहीं बदली हैं और यह पहलू इस बात को समझने में मदद कर सकता है कि डीडीए की कुछ कमियाँ आज भी क्यों मौजूद हैं। एडलर (2014) के द्वारा एक एक्जीक्यूटिव इंजीनियर से लिये इंटरव्यू के हवाले से जो बात निकलर सामने आई वह इस प्रकार है- ‘कुछ भी नहीं बदला…जस का तस वैसा ही है…प्रस्तावना, सभी कायदे कानून, डीडीए नहीं बदला है’।43

संगठनात्मक संरचना
डीडीए के संरचनात्मक बनावट पर गौर फरमाएं तो स्पष्ट है कि इसका पूरा प्रशासनिक ढांचा दिल्ली के लेफ्टिनेंट गर्वनर (यानी एलजी) की अगुवाई में खड़ा है। गौरतलब है कि एलजी डीडीए के पदेन अध्यक्ष के तौर पर काम करते हैं। इस कतार में दूसरे स्थान पर वाईस चेयरमैन यानी वीसी के पद पर किसी आईएस अफ़सर की नियुक्ति शहरी विकास मंत्रालय के द्वारा की जाती है। एडलर (2014) डीडीए के अफसरों के साथ किये इंटरव्यू का हवाला देते हुए उन पदों की चर्चा करते हैं जिन्हें अफसरों ने बातचीत के दौरान बार-बार महतवपूर्ण निर्णयों की मंजूरी के लिए ज़रूरी माना। एडलर लिखते हैं:

डीडीए में काम कर रहे नौकरशाहों, जो डीडीए में फैसले लेने में अव्वल दर्जे पर होते हैं, डीडीए की चारदीवारी के भीतर के लोगों में आपस में संवाद नहीं है।’ भूमि निपटान से जुड़े विभाग के एक डायरेक्टर ने मुझे बताया कि ‘यदि कोई विभाग किसी चीज को करना चाहता है और अन्य दूसरा विभाग उस पर आनाकानी करता है तो पूरा मामला ठंडे ब़स्ते में चला जाता है।’ प्लानिंग से जुड़े पूर्व कमिश्नर ने अपनी हताशा ज़ाहिर करते हुए कहा कि जब कोई वाईस चेयरमैन कुछ चाहता है वह पूरा हो जाता है। डीडीए बहुत बड़ा और विविधता से भरा संगठन है, जो विभिन्न विभागों में बंटा हुआ है, परंतु निश्चित तौर पर डीडीए की इस कतार में चेयरमैन और वाईस-चेयरमैन ही दो पद हैं जो अपने सभी विभागों से विभिन्न परियोजना प्रबंधन को गति देने के लिए आपस में समन्वय स्थापित करने के लिए कह सकते हैं। इस प्रकार, चेयरमैन और वाईस चेयरमैन का प्रोजेक्ट परियोजनाओं पर बहुत अधिक प्रभाव होता है।

इन पदों पर आमतौर पर आईएस अफ़सर होते है। इन पदों पर उच्च स्तरीय राजनीतिक प्रभाव देखा जा सकता है और यह नियुक्तियां केंद्र सरकार के नेताओं की इच्छा पर निर्भर करती हैं। भारत के राष्ट्रपति केंद्र में सत्ताधारी दल के साथ परामर्श करके चेयरमैन की नियक्ति करते हैं। वाईस चेयरमैन के पद पर नियुक्ति में केंद्रीय शहरी विकास मंत्रालय के नेताओं के प्रभाव होता है…इन अफ़सरों के कार्यकाल की अवधि अक्सर बेहद कम होने के कारण डीडीए की कई गतिविधियां प्रभावित होती हैं। मेरे फील्ड वर्क के दौरान बहुत सारे अफसरों ने कहा कि इस कम अवधि के कार्यकाल की वजह से डीडीए नेतृत्व में आये दिन बदलाव आते रहते हैं जिसकी वजह से प्राधिकरण की विभिन्न परियोजनाओं में समन्वय नहीं रहता है। भूमि निपटान के डायरेक्टर के अनुसार, डीडीए का वीसी या ‘बॉस’ बहुत समय के लिए नहीं ठहरता। जब अगला वीसी आता है तो वह खुद बहुत सारी नयी प्राथमिकताओं से लैस होता है। निश्चित तौर से यह निरंतरता के आभाव से जुड़ी समस्या है। फोकस बहुत ज़्यादा देर तक नहीं टिकता।44

इन दो पदों के अलावा, प्राधिकरण में 12 विभाग है। इसमें प्रमुख रूप से आर्किटेक्चर, इंज़ीनियरिंग और कंस्ट्रक्शन, फाइनांस और एकाउंस, हाउसिंग, बागवानी, भूमि प्रबंधन और निपटान, कानूनी, कार्मिक, प्लानिंग और क्वालिटी एश्योरेंस, स्पोर्ट्स, सिस्टम एण्ड ट्रेनिंग और विजिलेंस शामिल है। इन 12 विभागों के अतिरिक्त भी एक नया तेरहवां विभाग द यूनिफाइड ट्रैफिक एण्ड ट्रांसपोर्ट इन्फ्रास्ट्रक्चर (प्लानिंग एंड इंजीनियरिंग) सेंटर (UTTIPEC) का गठन 2008 में किया गया। इसका काम दिल्ली शहर में यातायात और बुनियादी ढांचे से जुड़े प्रोजेक्टों में सहयोग करना है। (अगले पेज पर संगठनात्मक ढांचे का चार्ट देखें।)

 

Source: Delhi Development Authority at dda.org.in.

इस संगठनात्मक चार्ट से, डीडीए के संगठन में एक सीढ़ीनुमा संरचना होने के साथ-साथ दूसरी बात यह भी दिखाई पड़ती है कि प्लानिंग और क्रियान्वयन के तकनीकी पक्ष की ओर काफी झुकाव है। यह आश्चर्यजनक है कि डीडीए शहर के जिन बाशिंदों के लिए आवास की प्लानिंग और उसको विस्तार से लागू करने पर जोर देता है वहां इस कार्य को व्यवहारिक रूप देने के लिए, बाशिंदों से लगातार संपर्क स्थापित करने के लिए कोई अलग विभाग नहीं है। यह स्पष्ट है कि डीडीए के विज़न में शायद ‘सामुदायिक भागीदारी’ का कोई मोल नहीं है। यह तब तो और भी दिलचस्प प्रतीत होता है जब डीडीए सुर-ताल बदलते हुए राजीव आवास योजना यानी RAY जैसी आवासीय पुनर्वास योजनाओं के माध्यम से सामुदायिक सहभागिता का दावा करता है। यदि राजीव आवास योजना45 ] के दिशा-निर्देश पर गौर फरमाएं तो स्पष्ट है कि इसमें यह कहा गया है कि इस योजना लैगून करने वाली एजेंसियों और बाशिंदों के बीच एनजीओ यानी गैर सरकारी संगठनों की भूमिका सेतू या मध्यस्थ की होगी। परंतु डीडीए के एक ऊँचे स्तर पर बैठे अफ़सर के अनुसार ‘डीडीए में कोई भी एनजीओ पर विश्वास नहीं करता, अगर एक कमरा डीडीए के 25 अफसरों से भरा हो तो उनमें मैं अकेला होंगा से जो एनजीओ के साथ काम करने की चाहत रखता है’।46

पिछले कई वर्षों से महत्वपूर्ण प्रक्रियाओं में डीडीए किस तरह के लोगों को शामिल या नियुक्त करता है, एक ऐसा क्षेत्र रहा है जहाँ हमें काफी कमियां देखने को मिलती हैं। विशेष रूप से कठपुतली कॉलोनी के मामले में डीडीए के स्टाफिंग संबंधी इस कमी को देखा जा सकता है जहां डीडीए ने अपना पहला इन-सीटू रि-डेवलपमेंट प्रोजेक्ट हाथ में लिया था।47 निश्चित तौर पर इसे प्रगतिशील झुग्गी-झोपड़ी पुनर्वास के बेहतरीन उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया गया। परंतु इस सन्दर्भ में प्राधिकरण को समुदाय को परियोजना के लागू करने में ठीक से शामिल न कर पाने की वजह से पैदा हुई दिक्कतों से जूझना पड़ा। डीडीए और बाशिंदों के बीच बातचीत की कमी साफ देखी गई। स्थिति तब और विकट हो गई जब डीडीए द्वारा इन बाशिंदों के खिलाफ शक्ति बल प्रयोग की धमकी दी गयी। यहां यह सार रूप में कहा जा सकता है कि समाज के इस तबके को जोड़ने में विफलता डीडीए की संस्थागत संरचना की गुणवत्ता संबंधी दावों की भी पोल खोल दी।

कर्मचारी और प्रमोशन
प्राधिकरण की सीढ़ीनुमा संरचना और इसके बेहद तकनीकी फोकस जैसी समस्याओं को और चुनौतीपूर्ण यह तथ्य बना देता है कि पूरा कर्मचारी तबका दो वर्गों में बंटा हुआ है। एक तरफ अफ़सरशाह हैं जो मास्टर प्लान बनाते हैं, संगठन के लिए लक्ष्य तय करते हैं और बदलती हुई राजनीतिक प्राथमिकताओं के अनुसार काम करते हैं । दूसरी तरफ, ज़मीनी स्तर पर काम करने वाले कर्मचारियों का समूह है जो इन प्लानों को क्रियान्वित करता है। इस दूसरे समूह की डीडीए में प्रवेश प्रत्यक्ष भर्ती के माध्यम से होता है। कर्मचारियों का यह समूह अपने करियर में धीरे-धीरे प्रमोशन करते हुए ऊपर तो जाता है पर ऐसा विरलय ही होता है कि इनमें से कुछ ही कर्मचारी उच्च स्तरीय प्रबंधन का हिस्सा बन पातें हैं|।
इसके विपरित ऊपरी प्रबंधन में डेप्युटेशन पर आये उच्च स्तरीय नौकरशाह होते हैं जो अन्य सरकारी विभागों से छुट्टी पर यहां उच्च स्तर पर आसीन होते हैं। एडलर (2014) को एक अफ़सर ने इंटरव्यू के दौरान बताया, ‘डायरेक्टर के स्तर के अधिकांश अफसर डेप्यूटेशन यानी प्रतिनियुक्ति पर यहां आए हैं। पांच कमिश्नरों में तीन डेप्यूटेशन पर हैं।48 डीडीए के अफ़सरों से की गई अपनी निज़ी बातचीत के आधार पर एडलर ने डेप्यूटेशन व्यवस्था पर प्राधिकरण की आस्था के लिए तीन वजहों को रेखांकित किया है। पहला, डेप्यूटेशन के ज़रिये बाबुओं का एक ऐसा तबका तैयार किया जाता है जिसे दिल्ली में सरकारी कामकाज़ की बेहतर समझ होती है। दूसरा, ऐसा माना जाता है कि डेप्यूटेशन के ज़रिये समय-समय पर डीडीए में नई समझ-बूझ और विचारों को प्राधिकरण में लाया जा जाता है। एक इंटरव्यू के दौरान डीडीए के एक अन्य अफ़सर ने एडलर को बताया, डेप्यूटेशन की व्यवस्था से डीडीए को काफी फायदा होता है। इसके अंतर्गत अनुभवी लोग डीडीए से जुड़ जाते हैं, अक़्सर ऐसा देखा जाता है कि डीडीए में जो लोग काफी समय से कार्यरत होते हैं उनमें नए विचारों की कमी होती है। वे अपने पुराने नज़रिए और अनुभव के आगे नहीं देख पाते।49 इस तरह डेप्यूटेशन के बहाने डीडीए के भीतर ऊर्जावान प्रतिभा को लाया जाता है। गौरतलब है कि ये वैसी प्रतिभा हैं जिसे डीडीए अपनी भर्ती प्रणाली के माध्यम से नहीं प्राप्त कर सकता है।

परन्तु उपरोक्त दावों के उलट हम यह निष्कर्ष निकालते हैं कि डेप्यूटेशन एक ऐसी व्यवस्था है जिससे प्राधिकरण का पूरा संगठनिक ढांचा विभाजित और अकार्यकुशल बन जाता है। इस सांगठनिक उठापटक के कारण नीतियों के क्रियान्वयन में देरी भी होती है। बहुत बुनियादी रूप से देखें तो भारी संख्या में डेप्यूटेशन पर नियुक्ति का मतलब है कि पर्याप्त समय न मिलने के कारण अफ़सर न तो प्राधिकरण की जरूरत को ठीक से समझ पाते हैं और न ही किसी प्रोजेक्ट के पूरा होने तक टिक पाते हैं। एडलर द्वारा ट्रेनिंग विभाग के एक अफ़सर से किए गए इंटरव्यू के अनुसार, ‘लोग जब अपनी गलतियों से सीखना शुरू करते हैं तभी [डेप्यूटेशन ख़त्म होने के कारण] वे चले जाते हैं’।50 डेप्यूटेशन का काम के माहौल पर भी गंभीर प्रभाव पड़ता है। डीडीए के स्थाई कर्मचारी, डेप्यूटेशन पर आने वाले अफ़सरों को अपनी उन्नति में बाधा के रूप में देखते हैं। इससे इनमें उच्चस्तरीय अफसरों के प्रति नाराज़गी होती है। इस प्रकार पूरा डीडीए दो वर्गों में बंट गया है।

एडलर के अनुसार – डीडीए के अन्दर डेप्यूटेशन की इस व्यवस्था से डीडीए के मैनेजमेंट और अन्य कर्मचारियों के बीच आपसी मनमुटाव देखा जा सकता है। रणनीति के स्तर और ज़मीन पर योजनाओं के क्रियान्वयन की बीच पटी यह खाई डीडीए की असफलता को समझने में काफी महत्वपूर्ण है। पिछले दो साल के दौरान दिल्ली में झुग्गी- झोपड़ी और अनियोजित रिहायशों में अपने फील्डवर्क के दौरान हम इसकी साफ़ झलक देखते हैं।

तंत्र और प्रक्रियाएं
2003-04 की वित्तीय वर्ष के अंत में प्राधिकरण अपनी रिपोर्ट में ज़ोर देते हुए कहती है कि डीडीए कार्यों में लगने वाले समय में कटौती करने के लिए तकनीक बेहद सहायक सिद्ध हो सकती है। 2013 में प्राधिकरण द्वारा बहुत सी सुविधाएं ऑनलाइन मुहैया कराई गई जिसमें पट्टे की ज़मीन को पूर्ण स्वामित्व वाली ज़मीन में परिवर्तन संबंधी एपलिकेशन भी शामिल थी। इसके साथ-साथ जन-शिकायतों के ऑनलाइन निपटारे और इलेक्ट्रानिक अकांउटिंग पर भी बल दिया गया। इस प्रकार डीडीए द्वारा 2012-13 की रिपोर्ट में घोषणा की गई- ‘डीडीए के संपूर्ण कम्प्यूटरीकरण का रोडमैप तैयार हो गया है…इस रोडमैप में इस बात का ख़ास ध्यान रखा गया कि प्रत्येक विभाग का सारा काम-काज कम्प्यूटीकृत हो…इससे उच्च स्तरीय प्रबंधन को निर्णय लेने में विशेष सहूलियत होगी’।51

इसके विपरित एडलर (2014), जिन्होंने डीडीए के ऑफिसों में बिताया, के अनुसार, ‘डीडीए अभी भी 1980 की तकनीकी स्तर पर ही खड़ा है। परियोजनाएं अभी भी कागज़ों और फाइलों पर ही हैं जो एक दफ़्तर से दुसरे दफ़्तर चक्कर काटती है’। एडलर अनुसार यह तकनीकी चुनौतियां प्राधिकरण के विभागों के बीच संवाद की प्रक्रिया, जो पहले से ही बेहद लचर है, को और कमज़ोर कर देती हैं।

मैंने जो भी इंटरव्यू लिया…उसमें अफ़सरो ने बार-बार यह माना कि विभागों के बीच में आपसी संवाद की कमी के कारण ही डीडीए अपनी परियोजनाओं का क्रियान्वयन नहीं करवा पाता है। इसमें विभागों में आपस में संवाद नहीं होता और अगर कहीं संवाद होता भी है तो वह केवल बहुत ऊंचे स्तर पर ही दिखाई पड़ता है। डीडीए के लिए प्लान बनाने वाले एक योजनाकार ने बताया ‘संवाद या संचार विभाग के अध्यक्ष की जिम्मेदारी है। डिप्टी डायरेक्टरों को विभिन्न विभागों के साथ सीधे संवाद करने की अनुमति नहीं है।’

महत्वपूर्ण है कि विभागों में आपसी संवाद की कमी योजनाओं को लागू करने की प्रक्रिया को प्रभावित करती है। डीडीए के एक पूर्व अफ़सर ने बताया कि जब कोई आवेदन प्लानिंग विभाग के पास जाता है तो विभाग के योजनाकार उसे देखकर सुधार, स्पष्टीकरण के लिए लौटा देते हैं। इस तरह पूरी प्रक्रिया में महीने लग जाते हैं। योजनाकार विभागों के बीच होने वाली बैठकों में ठीक से शामिल होते हैं और न ही इसके लिए बहुत अधिक गंभीर नहीं होते हैं। अपनी बातों को और स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा ‘डीडीए बहुत बड़ा संगठन है, विभिन्न विभागों के लोग आपस में दोस्ताना व्यवहार नहीं रखते हैं।’52

डीडीए के अन्दर सूचना आदान-प्रदान लचर है, यह एक प्रचलित सत्य रहा है। यह भी सच्चाई है कि डीडीए कमी का हल पाने में विफल रहा है। 1986 में टाटा कंसल्टेंसी सर्विस (टी सी एस) ने इसको बखूबी विश्लेषित करते हुए लिखा है-

डीडीए के पूरे सूंचना तंत्र की निम्न विशेषताएं हैं- निम्न स्तर पर डीडीए में जहां सूचनाओं की बाढ़ रहती है यानी बहुत अधिक सूचनाओं की उपलब्धता बनी रहती है वहीं उच्च स्तरों के प्रबंधन में सूचनाओं की भारी किल्लत रहती है। उपलब्ध सूचना का ठीक से विश्लेषण करने का गंभीर अभाव है। यहाँ तक कि काफी उच्च स्तरीय अफ़सरों को भी आंकडें अपरिष्कृत रूप में ही दिए जाते हैं। आंकड़ों के इस प्रकार अपरिष्कृत रूप में उपलब्ध होने की वजह से उन्हें ज़रूरी ‘सूचना’ के रूप में नहीं बदला जा सकता। परिणामस्वरूप सीनियर अफ़सरों को भी ज़रुरत के हिसाब से सूचना नहीं मिलती है और वह कोई निर्णय नहीं ले पातें हैं।

डीडीए के संबंध में टीसीएस ने जो आज से लगभग तीस वर्ष पहले कहा था, हमारा विश्लेषण यह दर्शाता है कि वह आज भी मान्य है। टीसीएस की रिपोर्ट से कुछ महत्वपूर्ण व विस्तृत अंश इस रिपोर्ट के परिशिष्ट (एपेंडिक्स) में दिए गए है।

निष्कर्ष

दक्षिणी दिल्ली के सबसे धनाढ्य रिहायशी इलाकों में से एक के किनारे पर पाँच एकड़ में फुलवारी, खूबसूरत गलीचों व वनों का फैलाव है। बीच-बीच में काटकर छायादार रास्ता और चारों ओर से पत्थर की दीवार इस हरे-भरे इलाके को घेरती है। आस-पास रहने वाले लोग— या उनके माली— यहाँ से फूल-पौधे खरीद नजदीकी स्थित इन आर्थिक रूप से सम्रद्ध घरों के बरामदों को हरी-भरी घास व फूलों से सजाते हैं। हालांकि इन फूल-पौधों की कीमत कम है परंतु इनकी गुणवत्ता काफी अच्छी है। यहाँ लगाये गये कर्मचारी काफी मददगार व पेशेवर हैं। जिस ज़मीन पर यह नर्सरी मौजूद है वह डीडीए की है जो स्वयं इस नर्सरी की देखरेख भी करता है।

इस नर्सरी से 10 किलोमीटर दूर, रेलवे ट्रैक और एक औद्योगिक क्षेत्र के पार, लगभग 200 एकड़ में फैला हुआ एक रिहायशी इलाका है। इस इलाके में करीब 50,000 से 1,00,000 लोग रहते हैं, लेकिन इस इलाके में पानी की कोई पाईपलाइन नहीं है, ना तो सीवेज है और न ही स्ट्रीट लाईट की व्यवस्था है। गली व नुक्कड़-चौराहे की स्थिति भी बेहद खराब है। यहाँ ऐसे कई खाली प्लाट है जिन पर डीडीए के बोर्ड बताते है कि ये कम्युनिटी सेंटर, शॉपिंग कॉम्प्लेक्स व परिवहन सेवा जैसी सुविधाओं के लिए प्रस्तावित ज़मीन हैं। ज़मीन के ये खाली टुकड़े और उन पर लगे ये बोर्ड पिछले एक दशक से अधिक समय से ऐसे ही हैं। यह इलाका डीडीए की ज़मीन पर बनी एक पुनर्वास कॉलोनी है जिसे प्राधिकरण ने इसके द्वारा तोड़ी गई झुग्गियों से बेघर हुए लोगों के पुनर्वास के लिए बनाया था। इत्तेफाक़ से यहाँ बसाये गए काफी लोग उस इलाके से हटाये गए थे जिस इलाके में डीडीए की नर्सरी है।

यह सच है कि उपरोक्त उदाहरण दिल्ली में डीडीए की भूमिका को समझने के लिए काफी नहीं हैं पर यह उदाहरण दर्शाते हैं कि डीडीए ने किस प्रकार वर्ग-पूर्वाग्रह से प्रेरित शहर को सींचने में केन्द्रीय भूमिका निभाई है जिसके साक्ष्य इस रिपोर्ट में प्रस्तुत किये गए। मुट्ठी भर दौलतिया वर्ग के लिये यह ज़रुर एक वर्ल्ड क्लास सिटी है जिसका दंभ डीडीए भरता रहा है। परंतु आधुनिकता का लबादा ओढ़े इस शहर ने ना जाने कितनी आबादी को व्यवस्थित रुप से हाशिये पर रखा है। हमारे विश्लेषण व अन्य शोधों से यह बात निकल कर सामने आती है कि डीडीए ने जनता फ्लैटों की ज़रुरत को लगातार बेहद कम करके आंका है और वह इन कम आकलन के लक्ष्यों को भी छू नहीं पाया। इस प्रकार प्राधिकरण ने शहर की बड़ी आबादी को बेघरी, अनियोजित रिहायशों और आये दिन इन रिहायशों को तोड़े जाने की कर्यवाहियों के चक्रव्यूह में फंसा दिया है।

वर्ग पर आधारित पूर्वाग्रह के अलावा, हम डीडीए के दो ऐसे लक्षण देखते हैं जो दिल्ली शहर के समावेशी और प्रभावशाली विकास में बाधा हैं। इसमें पहला है दिल्ली का राज्य का दर्जा जो कि सीमित है जिसकी वजह से राज्य सरकार शहर से जुडी योजना और विकास का काम अपनी देखरेख में नहीं कर सकती क्योंकि डीडीए दिल्ली के निवासियों द्वारा चुनी जाने वाली इस सरकार के प्रति जवाबदेह नहीं है। इसका मतलब यह है कि दिल्ली के चुने हुए प्रतिनिधि अगर शहरी विकास की ऐसी नीतियों की वकालत करें भी, जो निवासियों की ज़रूरतों को पूरा करें, तब भी जिस एजेंसी के ज़िम्मे यह काम आता है वह उनके प्रति जवाबदेह नहीं है।

दूसरा, डीडीए की संरचना के भीतर पड़ी फूट जिसमें दो खेमे है, भी महत्वपूर्ण है उसमें से एक है जिसने डीडीए के विज़न को स्थापित किया मसलन नौकरशाहों की पूरी टोली। वहीं दूसरी ओर स्थायी नौकरी पर लगे कर्मचारी जो ज़मीनी सच्चाई से अच्छी तरह वाकिफ़ हैं। यह खेमेबाज़ी ऊपर से नीचे तक देखी जाती है, जिसके कारण उनमें आपसी संवाद भी नहीं हो पाता है। इससे समूची कार्यप्रणाली प्रभावित होती है, मसलन फाइलों को बढ़ाने की गति सुस्त पड़ जाती है और इससे प्रदर्शन पर भी प्रभाव पड़ता है।

दिल्ली की गैर नियोजित बसाहट पर हमारे दो वर्षीय फील्डवर्क के दौरान हम यह पाकर हैरान रह गए कि डीडीए के स्टाफ में बड़ी संख्या में तकनीकी विशेषज्ञ व इंज़ीनियर है। डीडीए के जिम्मे एक रहने योग्य शहर के निर्माण का दायित्व है, एक ऐसा शहर जिसमें विश्व की सबसे बड़ी शहरी आबादियों में से एक रह सके। इसके बावजूद, ऐसा प्रतीत होता है कि डीडीए के कर्मचारियों के पास समुदायों के साथ काम करने, उनकी ज़रुरतों को समझने व उन ज़रुरतों को प्लानिंग में तब्दील करने का हुनर नहीं हैं।

2003-04 की वार्षिक रिपोर्ट में, डीडीए ने स्वयं को परिभाषित करते हुये लिखा- ‘दिल्लीवासियों को सुखद, स्वस्थ्य, सुरक्षित जीवन शैली मुहैया कराने के लिए दिन-रात काम कर रहा है’। हमने अपने शोध में एक ऐसा डीडीए पाया जो दिल्ली को सबके लिए नहीं बल्कि केवल कुछ चुनिन्दा लोगों के लिए रहने लायक बनाना चाहता है। अपने अस्तित्व के उद्देश्य को पूरा करने के लिए, डीडीए को ऐसी नीतियाँ बनानी चाहिए जिनमें सबका हित हो, जो दिल्ली के आकार और इसकी सांस्कृतिक-आर्थिक विविधता के लिहाज़ से एक बड़ी चुनौती है।

Appendix: Figures Excerpted from Tata Consultancy Services Report, 1986