राजनीतिक फायदों के लिए, सेवाएं देने की होड़

राजनीतिक फायदों के लिए, सेवाएं देने की होड़

इंदिरा कल्याण विहार झुग्गी-झोपड़ी बस्ती

शहाना शेख, सुभद्रा बांदा, बिजेंद्र झा, और बेन मेँडेलकर्न, अक्टूबर 2014
इस रिपोर्ट का अंग्रेजी से हिंदी में अनुवाद अभिनव श्रीवास्तव, ईशा कुंदूरी और सोनल शर्मा ने किया है।1

सारांश

इंदिरा कल्याण विहार, दिल्ली के एक मुख्य औद्योगिक क्षेत्र में स्थित, एक झुग्गी झोपड़ी बस्ती (जे.जे.सी.) है। कुछ अनुमानों के अनुसार, इन झुग्गियों में लगभग 1,00,000 लोग रहते हैं, जो कि दिल्ली के अन्य झुग्गी-झोपड़ी बस्तियों की तुलना में कहीं अधिक घनी स्थितियों के बीच रहते हैं। बहुत सी चुनौतियां जिनका सामना यहां के निवासियों को करना पड़ता है, बस्ती के घने होने से संबंधित हैं, जिसके कारण निवासियों तक सुविधाएं पहुंचने में कठिनाई होती है। यह एक ऐसा समुदाय भी है जो कि राजनीतिक तौर पर बंटा हुआ है। यह राजनीतिक बंटवारा सुधार कार्यों को दो स्तरों पर बाधित करता है; पहला, यह समुदाय को आंतरिक तौर पर संगठित होने से रोकता है, और दूसरा, निर्वाचित प्रतिनिधियों को कोर्इ कदम उठाने से। हालांकि राजनीतिक फायदों के लिए सेवाएं देने की इस होड़ से सभी को बेहतर सार्वजनिक सुविधाएं मिल सकती हैं, पर इंदिरा कल्याण विहार में ठोस रूप से बहुत कम सुधार हुआ है।
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इस रिपोर्ट का विषय दिल्ली की झुग्गी-झोपड़ी बस्तियां (जे.जे.सी.) और उनमें रह रहे लोगों से जुड़े मुद्दे हैं। झुग्गी-झोपड़ी बस्तियां सार्वजनिक भूमि पर बसे हुए अनाधिकृत रिहायशी इलाके2 हैं। झुग्गी-झोपड़ी बस्तियां सरकार द्वारा परिभाषित सात अनियोजित रिहायशी इलाकों में से एक है। इन झुग्गी-झोपड़ी बस्तियों में करीब 4.2 लाख3 परिवारों के लोग रहते हैं, जो दिल्ली की कुल आबादी का लगभग 15 फीसदी है।4

हालांकि कर्इ बार ‘झुग्गी-झोपड़ी बस्तियों’ की जगह ‘स्लम’ शब्द का भी इस्तेमाल कर दिया जाता है, लेकिन दिल्ली सरकार द्वारा बनार्इ गर्इ श्रेणियों और उनके अनुक्रम के अनुसार, ये दोनों शब्द दिल्ली में दो अलग तरह के रिहायशी इलाकों से सम्बन्ध रखते हैं। आधिकारिक शब्दकोष के अनुसार-स्लम का सम्बन्ध ‘स्लम डेज़ेग्नेटड एरियाज़’ (एस.डी.ए.) से है। इन क्षेत्रों का ज़िक्र साल 1956 के एक कानून में किया गया है। ये डेज़ेग्नेटड डस्लम उस सूची का हिस्सा हैं जिसे साल 19945 से अपडेट नहीं किया गया है। इन रिहायशी इलाकों को प्रशासनिक रूप से मान्यता प्रदान कर कुछ बुनियादी सुविधाएं दे दी जाती हैं। दूसरी तरफ, झुग्गी-झोपड़ी बस्तियों (जे.जे.सी.) के वजूद को आधिकारिक तौर पर मान्यता तो मिली है, लेकिन उन्हें ‘स्लम डेज़ेग्नेटड एरियाज़’ जैसी कानूनी सुरक्षा हासिल नहीं है। इस तरह सभी अनियोजित रिहायशी इलाकों में से झुग्गी-झोपड़ी बस्तियां सबसे ज़्यादा कमज़ोर और असुरक्षित आबादी वाले इलाके हैं। हालांकि दिल्ली की झुग्गी-झोपड़ी बस्तियों (जे.जे.सी.) में ज़बरदस्त अंतर हैं। इसके बावजूद इन सभी बस्तियों में जो एक समानता है, वो है वहां के निवासियों के ज़मीन पर कमज़ोर दावे, और इन बस्तियों में होने वाली बहुत सी घटनाएं ज़मीन पर इन कमज़ोर दावों से तय होती है।6सामान्य तौर पर, ये ऐसी जगहें हैं जहां निवासियों को अपनी नागरिकता के अधिकार से समझौते करने पड़ते हैं; न तो उनको सार्वजनिक सेवाएं हासिल हैं और न ही उनको अपनी ज़मीन पर सुरक्षित मालिकाना हक हासिल है।

इंदिरा कल्याण विहार झुग्गी झोपड़ी बस्ती ओखला में स्थित है। ओखला शहर के मुख्य औद्योगिक क्षेत्रों में से एक है। दिल्ली विकास प्राधिकरण (डी.डी.ए.) के मालिकाना हक वाली ज़मीन पर तीन दशकों से भी ज़्यादा समय से बने इंदिरा कल्याण विहार के घरों में बड़ी आबादी निवास करती है। कुछ अनुमानों के अनुसार इन घरों में 1,00,000 लोग रहते हैं, जो कि दिल्ली के अन्य झुग्गी-झोपड़ी बस्तियों की तुलना में कहीं अधिक घनी स्थितियों के बीच रहते हैं। इंदिरा कल्याण विहार में निवासियों को जिन चुनौतियों का सामना करना पड़ता हैं, उनमें से बहुत सी चुनौतियों का कारण बस्ती के घने होने से सम्बंधित हैं, जिसके कारण निवासियों तक सुविधाएं पहुंचने में कठिनार्इ होती है। इलाके में गहरार्इ तक बंटी हुर्इ राजनीति सुविधाओं के प्रावधान को और ज़्यादा कठिन बना देती है; यह एक ऐसा समुदाय है जो एकजुटता के साथ राज्य से सबसे बुनियादी स्तर की सुविधाओं की मांग में आवाज़ भी नहीं उठा सका है।

यह लेख साल 2013 की गर्मियों में छह रिसर्चरों की एक टीम द्वारा लगातार पांच महीने तक इलाके में किए गए कर्इ दौरों का नतीजा है। साल 2014 की गर्मियों में भी कुछ कार्य किया गया। यहां प्रस्तुत की गर्इ सूचना बस्ती के विभिन्न लोगों से हमारे साक्षात्कारों पर आधारित है। इसके लिए कुछ विशेष मुद्दों को ध्यान में रखते हुए प्रश्नों की एक सूची तैयार की गर्इ। जवाब देने वाले लोगों का चयन स्नोबालिंग सैम्पलिंग विधि से किया गया। इसमें इंदिरा कल्याण विहार के निवासी, रेसिडेंट्स वेलफेयर एसोसिएशन (आर.डब्ल्यू.ए.) के सदस्य, निर्वाचित प्रतिनिधि, और सरकारी एजेंसियों के स्टाफ-कर्मचारी आदि शामिल थे। कर्इ मामलों में लोगों द्वारा दी गर्इ जानकारियां परस्पर-विरोधी पार्इ गर्इं और उन्हें ज्यों का त्यों प्रस्तुत किया गया है। बाकी जो भी निष्कर्ष दिए गए हैं, वे ऐसी बातों पर आधारित हैं, जिनका ज़िक्र लोगों ने अपने जवाबों के दौरान कर्इ बार किया है। सभी निष्कर्ष क्वालिटेटिव रिसर्च के मानकों पर आधारित हैं।

स्थान

इंदिरा कल्याण विहार के निवासी बताते हैं कि इस रिहायशी इलाके की स्थापना साल 1978 में हुर्इ थी, लेकिन साल 1984 में हुए दंगों (जो कि प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के हत्या के बाद हुए थे) के बाद इलाका तेज़ी से फैलने लगा। दक्षिण-पूर्व दिल्ली के ओखला औद्योगिक क्षेत्र के फेज़-1 में स्थित इंदिरा कल्याण विहार दो समानांतर सड़कों के बीच में बसा हुआ है। इन समानांतर सड़कों पर फैक्ट्रियां और औद्योगिक इकाइयां हैं। इन दोनों सड़कों से बस्ती में पहुंचने के लिए कर्इ रास्ते हैं।

बस्ती बहुत घनी बनी हुर्इ है और ए से लेकर र्इ तक पांच ब्लाकों में बंटी हुर्इ है। रिहायशी इलाके की ज़्यादातर झुग्गियां दो या तीन मज़िला पक्के ढांचे हैं। लगभग चार फीट संकरी गलियां झुग्गी-झोपड़ी बस्ती के बीचों बीच से गुज़रती हैं, हालांकि कर्इ गलियां दो फीट संकरी भी हैं, जहां से गुज़रने वालें लोगों को अक्सर इमारतों के किनारे से जाना पड़ता हैं। छोटी खुली नालियां इन गलियों के साथ जुड़ी हुर्इ हैं, जिनसे कचरा बहता हुआ एक बड़े नाले (खुला सीवर) में जाकर गिरता है। यह बड़ा नाला रिहायशी इलाके को दो हिस्सों में बांटता है। नाले से लगातार बदबू आती है। यह नाला कर्इ जगहों पर संकरा हो जाता है और कर्इ जगहों पर फैल जाता है। इस नाले पर से दो पुल गुज़रते हैं।

दिल्ली शहरी आश्रय सुधार बोर्ड (डी.यू.एस.आर्इ.बी.) के अनुमानों के अनुसार, इस रिहायशी इलाके में 5,500 झुग्गियां हैं। हालांकि निवासियों के अनुसार बस्ती में झुग्गियों की संख्या इससे ज़्यादा है। निवासियों का अनुमान है कि बस्ती में 6,000-10,000 के बीच झुग्गियां हैं। बस्ती में बहुत से लोगों ने हमें बताया कि बस्ती की आबादी एक लाख के करीब है।7 रिहायशी इलाके में हमने जितने दौरे किए उनके आधार पर ये अनुमान सही लग रहे थे। ज़्यादातर झुग्गियां 2-3 मज़िला ऊंची हैं और इनमें कर्इ परिवार रहते हैं। यह आंकड़ा बस्ती के दो व्यक्ति प्रति वर्ग मीटर जैसी बेहद घनी बुनावट के अनुरूप है।

बस्ती की आबादी की बुनावट को समझने के लिए हम लोगों की धारणाओं और बातों पर निर्भर है। निवासी बताते हैं कि बस्ती में अधिकांश लोग बिहार से हैं, और बाकी उत्तर प्रदेश, राजस्थान, उत्तराखंड, नेपाल, पंजाब और महाराष्ट्र से हैं। समुदाय के सदस्यों ने हमें बताया कि लगभग आधे से अधिक निवासी दलित हैं, 20 फीसदी ऊंची जाति के हिन्दू और 20 फीसदी मुस्लिम हैं। इलाके के ज़बरदस्त घना होने के बावजूद, निवासियों ने बस्ती के बीच में एक मस्जिद और एक मंदिर- दोनों ही बनाने के लिए जगह ढूंढ निकाली हैं।

बहुत से निवासी ओखला औद्योगिक क्षेत्र में ठेके पर काम करते हैं। इन कामगारों ने हमें बताया कि उन्हें लगभग तीन महीने के लिए ठेके पर रखा जाता है और बदले में बेहद कम मज़दूरी मिलती है। कुछ निवासी काम के लिए फरीदाबाद और गुडगांव तक भी जाते हैं। बहुत से ठेले वाले बस्ती में रहते हैं और वे अपने ठेले कॉलोनी की सीमा से जुड़ी सड़को पर खड़े करते हैं।

इंदिरा कल्याण विहार में कर्इ तरह की (आकार के अनुसार) झुग्गियां हैं। सामान्य तौर पर इनका साइज़ 50-100 वर्ग फुट के बीच हैं। एक महिला निवासी ने हमें बताया कि कुछ झुग्गियां इतनी छोटी हैं कि अगर इनमें एक बिस्तर डाल दिया जाए, तो खाना बनाने के लिए कोर्इ जगह नहीं बचेगी। बहुत से परिवारों ने समाधान के तौर पर निचली मज़िल के ऊपर अधिक मंज़िलों का निर्माण किया हैं। इलाके के किनारे पर बनी झुग्गियों के निचली मज़िल पर कुछ छोटी-छोटी दुकानें हैं, जिनमें खाना, फल, सब्ज़ी, इलेक्ट्रानिक्स का छोटा-मोटा सामान मिलता है और ऑटो रिपेयर जैसे काम किए जाते हैं।

हालांकि बस्ती में कुछ निवासियों की अपनी झुग्गियां हैं, आधे से ज़्यादा निवासी 800 से 2,000 रुपये प्रति माह किराया देकर रहते हैं। निवासियों का कहना है कि किराये पर दिए हुए कुछ झुग्गियों के मालिक झुग्गी-झोपड़ी बस्ती से बाहर रहते हैं। बस्ती के बहुत से निवासियों के पास वी.पी.सिंह टोकन हैं। साल 1989 में, प्रधानमंत्री वी.पी.सिंह के कार्यकाल के दौरान ये टोकन झुग्गी-झोपड़ी निवासियों को औपचारिक निवास प्रमाण ( रेसिडेंस प्रूफ) के तौर पर दिए गए थे।8ये टोकन दर्शाते हैं कि झुग्गी-झोपड़ी बस्ती की आबादी का एक बड़ा हिस्सा कम से कम पिछले पचीस वर्षों से यहां रह रहा हैं।

इस झुग्गी-झोपड़ी बस्ती में हाल में जबरन खाली कराने की कोर्इ बड़ी घटना नहीं हुर्इ है और निवासियों को रोज़ाना घर ढहाये जाने का खतरा महसूस नहीं होता हैं। हालांकि निवासी यह जानते हैं कि इंदिरा कल्याण विहार डी.डी.ए. की ज़मीन पर बना है और घरों को खाली कराने और ढहाने की घटना संभव है। एक निवासी (जो एक पार्टी का कार्यकर्ता है और खुद को क्षेत्र के विधायक का करीबी बताता है) ने कहा “यह निश्चित है कि हमारे घर हटाए जाएंगे, ये आज या कल होगा, वही तय करना है।” झुग्गियों को जबरन खाली कराने की एक छोटी सी घटना साल 2008 में घटी थी, जब मंदिर के एक किनारे की झुग्गियों को सड़क बनाने के लिए तोड़ दिया गया था। निवासियों ने बताया कि इन घरों में रहने वाले लोगों को कोर्इ पुनर्वास नहीं दिया गया, एक ऐसा तथ्य जिसने निवासियों के मन में उनके प्रति राज्य की उपेक्षा की भावना को और बढ़ा दिया। एक महिला ने हमें बताया- “कोर्इ हमारे लिए कुछ नहीं करता, लोग आते हैं और सर्वे (सर्वेक्षण) करते हैं और फिर कुछ नहीं होता। हम बहुत परेशान ज़िंदगी बिता रहे हैं।”

बस्ती के आबादी में विभिन्ताओं के बावजूद निवासी बताते हैं कि समुदाय बड़े स्तर पर राजनीतिक तौर पर बंटा हुआ है। हमने अब तक जिन झुग्गी-झोपड़ी बस्तियों का अध्ययन किया था, इंदिरा कल्याण विहार की स्थिति उनसे अलग थी। इंदिरा कल्याण विहार में कोर्इ एक प्रधान (अनौपचारिक तौर पर बस्ती का प्रतिनिधि माना जाने वाला) नहीं है। बस्ती में रहने वाली एक महिला ने हमें बताया- “सब प्रधान हैं।” अन्य निवासियों ने कम से कम दस लोगों को प्रधान बताया, जिनमें से ज़्यादातर लोग कुछ खास राजनीतिक पार्टियों से जुड़े हुए थे। एक अन्य महिला ने अपनी बात को कुछ इस तरह समझाया- “बस्ती का कोर्इ एक प्रधान नहीं है। ऐसा है कि कोर्इ भी अपने आप को प्रधान बता सकता/सकती है।”

निवासी बताते हैं कि इंदिरा कल्याण विहार में स्वास्थ्य और शिक्षा के मुद्दों पर पांच गैर-सरकारी संगठन (एन.जी.ओ.) सक्रिय हैं। हालांकि हमें इलाके में चार एन.जी.ओ. ही दिखार्इ दिए -सेव द चिल्ड्रन, नवज्योति डेवलपमेंट सोसाइटी, लोकराज संगठन और किरन। निवासी खास तौर पर सी.ए.एस.पी. (कम्युनिटी ऐड एंड स्पॉन्सरशिप प्रोग्राम) के योगदान को याद करते हैं, जो कि फिलहाल इंदिरा कल्याण विहार में मौजूद नहीं है, लेकिन एक समय इस संगठन ने निवासियों को झुग्गियां बनाने के लिए दो हजार र्इंटें दी थी।

बुनियादी सुविधाएं

पानी

दिल्ली की झुग्गी-झोपड़ियों में स्त्रोत, कीमत, मात्रा और गुणवत्ता के आधार पर पानी का वितरण बदलता रहता है। झुग्गी-झोपड़ी बस्तियों के निवासी दिल्ली जल बोर्ड के पानी टैंकरों, पाइप द्वारा आने वाला पानी जों कर्इ परिवार मिलकर इस्तेमाल करते हैं, और सार्वजनिक या निजी बोरवेल9 समेत विभिन्न स्त्रोतों से अपनी पानी की आवश्यकता पूरी करते हैं। इसके अलावा निवासी जन शौचालय केन्द्रों पर लगे पानी के नल, निजी कंपनियों के पानी टैंकर, आस-पास के इलाकों में लगे बोरवेल, और आस पास की नियोजित कॉलोनियां के घरों से भी पानी की ज़रूरतों को पूरा करते हैं।

पानी के वितरण की देख-रेख और व्यवस्था दिल्ली जल बोर्ड (डी.जे.बी.)10 के ज़िम्मे है। यह झुग्गी-झोपड़ियों (जे.जे.सी.) समेत दिल्ली के तीन नगर निगमों के कार्यक्षेत्र के तहत आने वाले इलाकों में पानी की आपूर्ति सुनिश्चित करने वाली नोडल एजेंसी है। वास्तव में, दिल्ली जल बोर्ड यह दावा करता है कि वह हर इलाके में पानी आपूर्ति सुनिश्चित करेगा, भले ही कानूनन वह इलाका वैध हो या अवैध।11 लेकिन इस प्रावधान को लागू करने की व्यवस्था का विवरण उसकी नीति में कहीं भी नहीं है। किसी निश्चित ढांचे और कार्यप्रणाली के नहीं होने के कारण दिल्ली जल बोर्ड स्टाफ कर्इ तरह की व्यवस्थाओं/तरीकों के ज़रिए शहर के झुग्गी-झोपड़ी बस्तियों में पानी वितरण का इंतजाम करता है।

पंद्रह-सोलह साल पहले तक इंदिरा कल्याण विहार के निवासी हैण्ड पम्प के ज़रिए पानी लेते थे। वर्तमान में, इंदिरा कल्याण विहार के निवासी कर्इ स्त्रोतों से पानी लेते हैं; यहां पाइपों, ट्यूब वेल्स, मुख्य वॉटर लाइन से अवैध रूप से पानी की टैपिंग करके और पानी टैकरों के ज़रिए पानी मिलता है। दिल्ली के बाकी हिस्सों की तरह ही इंदिरा कल्याण विहार में भी पानी भरने की ज़िम्मेदारी महिलाओं और लड़कियों की है। एक महिला के अनुसार पानी के इतने सारे स्त्रोत होने के बावजूद भी, “लड़ार्इ-झगड़ा होता है पानी के लिए।”

आमतौर पर, झुग्गी झोपड़ी बस्तियों में दिल्ली जल बोर्ड टैंकर सेवा के ज़रिए पानी की आपूर्ति की ज़िम्मेदारी पूरा करती हैं। लेकिन इंदिरा कल्याण विहार के एक हिस्से में दिल्ली जल बोर्ड ने पाइपों के ज़रिए पानी आपूर्ति की व्यवस्था की है। इन पाइपों का नेटवर्क बस्ती के दक्षिणी हिस्से में हैं, ओखला के डी ब्लॉक के सामने, और लगभग बस्ती के आधे से ज़्यादा हिस्से में फैला हुआ है। यहां हर घर से पानी का पाइप सीधे नहीं जुड़ा है। इसके बजाय पानी बस्ती के संकरे नालों की अंदरुनी दीवारों में फिट पाइपों से होकर गुज़रता है। कोर्इ नल नहीं है, बल्कि पाइप में कहीं-कहीं पर छेद कर दिए गए हैं; जब पाइपों में पानी बहता है तो वह इन छेदों से बाहर निकल आता है। इन छेदों से पानी लेने के लिए निवासी कर्इ तरीकों का इस्तेमाल करते हैं और उनकी कोशिश रहती है कि नाले से कोर्इ संपर्क नहीं हो। इन तरीकों में मेकशिफ्ट कंटेनर (जो कि अस्थायी रूप से नालों में फिट हो जाते हैं) जैसे साधारण तरीकों से लेकर तकनीकी तौर पर आधुनिक तरीके शामिल हैं, जैसे कि मोटर पम्प, जो कि रबर ट्यूब के ज़रिए पानी खींचते हैं। पानी आपूर्ति का नाली के इतने करीब होने से निवासियों के स्वास्थ्य के लिए खतरा पैदा करता हैं, जिसके बारे में निवासी जानते भी हैं। एक निवासी ने पानी इकठ्ठा करने का तरीका दिखाते हुए हमसे कहा, “हम नर्क में रह रहे हैं।”

बस्ती में दो स्त्रोतों से पानी के वितरण के लिए करीब चार से पांच साल पहले ये वॉटर पाइप लगाए गए थे। ये दो स्तोत्र हैं: बस्ती के दक्षिण-पूर्वी किनारे पर दिल्ली जल बोर्ड का बूस्टर स्टेशन और दिल्ली जल बोर्ड का सोनिया विहार प्लांट। एक महिला निवासी ने विस्तार में समझाया कि-

असल में यहां 446 पानी के नल लगाए गए थे। बस्ती में हर घर के बाहर एक नल लगाया गया था। मैंने एक गैर सरकारी संगठन के साथ काम किया था और हमने बस्ती के कुल नलों का एक सर्वे (सर्वेक्षण) किया था, इसलिए मुझे पानी के नलों की संख्या पता है। लेकिन इन नलों में पानी धीमे आता था, इसलिए बहुत से निवासियों ने इनको हटा दिया और इनकी जगह इन पॉइंट्स से (नाले के पास पाइपों के खुलने की जगहें की ओर दिखाते हुए) सीधे पानी लेने लगे। अब ऐसे पॉइंट्स की संख्या 150 हैं और एक पॉइंट से बहुत से घरों के लोग पानी भरते हैं।

वर्तमान में ऐसे एक पॉइंट को पांच से आठ झुग्गियां इस्तेमाल करती हैं। पानी का कोर्इ शुल्क नहीं है। पाइपों में अलग-अलग समय पर दो अलग-अलग तरह का पानी आता है। एक तरह का पानी पीने लायक है, जिसे निवासी मीठा पानी कहते हैं। दूसरे को वे खारा पानी कहते हैं जो कपड़े, बर्तन आदि धोने व अन्य कामों के लिए इस्तेमाल होता है। हम इस बात की पुष्टि नहीं कर पाए कि इन दोनों तरह के पानी में सिर्फ स्वाद में अंतर है या फिर इनकी शुद्धता और स्वच्छता में भी कोर्इ अंतर है, लेकिन अंतर की बात को इलाके में व्यापाक तौर पर सही माना जाता है। तय समय के अनुसार, निवासी बताते हैं कि खारा पानी प्रति दिन आधे घंटे के लिए- सुबह 7.30 से 8.00 बजे तक या 8.00 से 8.30 तक आता है, लेकिन असल में इसके आने का कोर्इ समय नहीं है। इंदिरा कल्याण विहार में एक दौरे के दौरान हमने देखा कि यह पानी सुबह के 9.45 बजे तक भी नहीं आया था; दूसरे दौरे के दौरान निवासियों ने हमें बताया कि उस दिन दिल्ली जल बोर्ड के बूस्टर में किसी तकनीकी खामी के चलते उन्हें केवल पांच मिनट के लिए पानी मिल सका। इन्हीं पाइपों में सामान्य तौर पर प्रति सप्ताह 3-6 बार मीठापानी आने की उम्मीद भी रहती थी। सामान्य तौर पर इसका समय दोपहर 2.30 से 5.00 बजे के बीच में होता था। निवासियों का कहना था कि खारे पानी की आपूर्ति पर भरोसा किया जा सकता था, लेकिन मीठे पानी की आपूर्ति पर निर्भर नहीं हुआ जा सकता। निवासी बताते हैं कि कभी-कभी 8-10 दिनों तक मीठापानी नहीं आता है, लेकिन चुनाव से ठीक पहले पानी की आपूर्ति नियमित हो जाती है।

बस्ती के उत्तरी हिस्से (जो कि बस्ती को ओखला औद्योगिक क्षेत्र के सी ब्लॉक से अलग करने वाली चौड़ी सड़क के पास है) में बसे घरों को दिल्ली जल बोर्ड के इन पाइपों की सेवा नहीं मिल पाती है। इन घरों के निवासी फैक्ट्रियों में पानी की आपूर्ति के लिए लगार्इ गर्इ पाइपलाइनों (ट्रंक पाइपलाइन) से अवैध रूप से टैपिंग कर पानी हासिल करते हैं। इलाके के इस हिस्से की गलियां पानी की आपूर्ति करने वाले छोटे-छोटे मेटल पाइपों से भरी पड़ी है। हर परिवार के लिए मेटल पाइप में एक कनेक्शन लगा रहता है। लेकिन ये इंतजाम काफी महंगा पड़ता है। घर तक इन पाइपों को लगाने के लिए करीब 30,000 रुपये का खर्चा आता है। एक निवासी ने हमें बताया कि लागत कैसे बढ़ती है- “आपको पुलिस वालों को पैसा देना पड़ता है, इसके अलावा कांट्रेक्टर (ठेकेदार) और पाइपों का खर्चा अलग से उठाना पड़ता है।” इस खर्च का मतलब है कि बहुत से निवासी अवैध तरीके से आपूर्ति होने वाले इस पानी को अपने घरों तक नहीं लातें हैं। ऐसी स्थिति में, एक नजी ठेकेदार पानी को एक ऐसे नल से जोड़ देता है जिसका उपयोग दूसरे परिवार भी करतें हैं।

पानी का एक अन्य विश्वसनीय स्त्रोत ट्यूब वेल है, जो इलाके की सीमा के किनारे एक सड़क के पास एक पीपल के पेड़ के नज़दीक स्थित है। इस ट्यूब वेल से एक हैण्ड पम्प के ज़रिए पानी खींचा जा सकता है। ट्यूब वेल से आने वाला पानी गंदा होता है, लेकिन फिर भी लोग इसे पीते हैं। जब इलाके में पानी की कमी होती है तो बस्ती के निवासी पड़ोस के फैक्ट्री मालिकों से पानी का निवेदन करते हैं। खास तौर एक कंपनी ने निवासियों को पानी देने के लिए इच्छा दिखार्इ है।

यह कहना कठिन है कि बस्ती के कितने निवासी दिल्ली जल बोर्ड के वॉटर टैकरों का इस्तेमाल करते हैं। निवासियों के साथ हुर्इ बातचीत से यह साफ हैं कि ज़्यादातर निवासी दिल्ली जल बोर्ड के टैंकरों को, पानी के लिए, प्राथमिक अथवा भरोसेमंद स्त्रोत के रूप में नहीं देखते हैं। कर्इ निवासी बताते हैं कि दिल्ली जब बोर्ड के टैंकर बस्ती में कभी-कभार आते हैं और जब वे आते हैं तो बस्ती में अफरा-तफरी फैल जाती है। बाकी निवासी कहते हैं कि झुग्गी-झोपड़ी बस्ती में दिल्ली जल बोर्ड का कोर्इ भी टैंकर नहीं आता, हालांकि हमने एक विज़िट के दौरान बस्ती में एक टैंकर को देखा।

साफ-सफार्इ: शौचालय, नालियां और कूड़ा निपटान प्रबंधन

दिल्ली के झुग्गी-झोपड़ी समूहों में साफ-सफार्इ का इंतजाम तीन सरकारी एजेंसियां करती हैं। दिल्ली में सीवर लाइनों के निर्माण और उनकी देख-रेख का ज़िम्मा दिल्ली जल बोर्ड का है। झुग्गी-झोपड़ी समूहों में निवासियों के लिए शौचालयों के निर्माण और देख-रेख की ज़िम्मेदारी डी.यू.एस.आर्इ.बी. की है। नालियों का निर्माण डी.यू.एस.आर्इ.बी. करता है, जबकि उनकी देख-रेख नगर निगम परिषद करता है। कूड़ा प्रबंधन का काम सम्बंधित दिल्ली नगर निगम के कार्यक्षेत्र में आता है (उत्तरी, दक्षिणी या पूर्वी)।

हालांकि बस्ती के बीचों-बीच से एक नाला उसे दो बराबर हिस्सों में बांटता है, इसके बावजूद इंदिरा कल्याण विहार में सीवरेज का कोर्इ प्रावधान नहीं है। बस्ती में शौचालयों का प्रावधान निवासियों के लिए चिंता का विषय है। कुछ समय पहले तक निवासी एक ही सामुदायिक शौचालय सेवा (सी.टी.सी.) पर निर्भर थे। यह सी.टी.सी. इलाके के उत्तरी-पश्चिमी किनारे पर ट्रैफिक सिग्नल के पास है। इसको 10-12 साल पहले बनाया गया था और इसमें कुछ ही लैट्रिन सीट काम करते हैं। इस शौचालय की देखभाल एक निजी ठेकेदार करता है। यह ठेकदार शौचालय इस्तेमाल करने, नहाने और पानी भरने का शुल्क इकठ्ठा करता है।12 कुछ निवासी बताते हैं कि रिहायशी इलाके के निगम पार्षद को भी इस शुल्क का कुछ हिस्सा मिलता है। निवासियों ने दो अन्य सामुदायिक शौचालय सेवाओं का ज़िक्र किया, जो कि साल 1988 और 2002 में बनवार्इ गर्इ थी। निवासियों ने बताया कि इन दोनों शौचालयों का रख-रखाव इतना खराब है कि बहुत कम लोग इनका इस्तेमाल करते हैं।

हाल में डी.यू.एस.आर्इ.बी. और कुछ गैर सरकारी संगठनों ने बस्ती में नए सामुदायिक शौचालय बनवाने शुरू किए। अप्रैल 2013 में एक फील्ड विज़िट के दौरान हमने देखा कि एक समुदाय संचालित शौचालय की आधारशिला रखी हुर्इ थी। इस आधारशिला पर 15 फरवरी 2013 की तारीख थी और इस पर जिन संगठनों के नाम लिखे थे उनमें- डी.यू.एस.आर्इ.बी., नवज्योति डेवलपमेंट सोसाइटी, और सेव द चिल्ड्रन शामिल थे। इस सामुदायिक शौचालय की शुरुआत अगस्त 2014 में हुर्इ, जिसमें पुरुष और महिला वर्ग- दोनों में 10 लैट्रिन सीटें और 3 बाथरूम हैं।

अक्टूबर 2013 में हमने देखा कि बस्ती के दो किनारों पर दो अतिरिक्त सामुदायिक शौचालयों का निर्माण शुरू हुआ। निवासियों ने हमें बताया कि 18 सितम्बर 2013 को विधायक और नगर निगम अधिकारियों ने इन शौचालयों की आधारशिला रखी और अगले दिन से इनका निर्माण कार्य शुरू हो गया। हालांकि ये शौचालय मर्इ 2014 तक खुले नहीं। पहले सामुदायिक शौचालय में प्रत्येक वर्ग (महिला और पुरुष) में 12 लैट्रिन सीटें हैं, जबकि दूसरे सामुदायिक शौचालय में पुरुष वर्ग में 11 और महिला वर्ग में 9 लैट्रिन सीटें हैं। दोनों शौचालयों में प्रत्येक वर्ग (महिला और पुरुष) में 4 बाथरूम हैं। दोनों शौचालयों में शौच का खर्च 1 रुपया और नहाने का खर्च 2 रुपये है।

निवासी मानते हैं कि झुग्गी-झोपड़ी बस्ती में ज़्यादा से ज़्यादा शौचालय बनाने की कोशिशें की गर्इ हैं। हालांकि इनमें से बहुतों ने हमें बताया कि इन शौचालयों में जाने का खर्च कामचलाऊ शौचालय बनवाने और उनका इस्तेमाल करने से भी ज़्यादा खर्चीला है। उन्होंने बताया कि छह सदस्यों वाले एक परिवार को शौचालय इस्तेमाल करने के लिए प्रति दिन कम से कम छह रुपये देने पड़ेंगे। इस तरह हर रोज़ के हिसाब से एक माह का खर्च उनके बस के बाहर हो जाता है।

बस्ती से गुज़रने वाले बड़े नाले के साथ में बसी कुछ झुग्गियों के अन्दर निजी शौचालय बने हुए हैं। इन शौचालयों के आउटलेट (निकास) नालों के ऊपर खुलते हैं। बस्ती के अंदरूनी हिस्से में बसी झुग्गियों में से किसी में भी आंतरिक शौचालय नहीं है, लेकिन कुछ निवासियों ने आपस में मिलकर 15 बाह्यगृह (आउट-हाउस) बनाए हुए हैं। ये शौचालय बम्बू और लकड़ी की मदद से बनाए गए हैं, और इनका निकास एक छोटे नाले में गिरता है, जो कि बड़े नाले के दक्षिण से निकलकर झुग्गी-झोपड़ी बस्ती के एक किनारे से गुज़रती है।

बहुत से निवासियों के अनुसार, शौचालयों की खराब व्यवस्था और उनके महंगे होने के चलते लोग बाहर जंगलों में या बस्ती के चारों ओर खुले में शौच करते हैं। एक निवासी ने हमें बताया कि बहुत से लोग पॉलिथीन बैग में शौच या पेशाब करते हैं और उसे नाले में फेंक देते हैं।

बस्ती में इस बड़े नाले के अलावा गलियों के बहुत से हिस्सों से एक संकरा बहता हुआ ‘स्टॉर्म वॉटर ड्रेनेज सिस्टम’ भी गुज़रता है (ये वे नाले हैं जिनसे इलाके के दक्षिणी हिस्से में लगे पानी के पाइप गुज़रते हैं)। निवासियों ने बताया कि इन नालों को 1990 के दशक के मध्य में बनाया गया था। हालांकि ऐसा कम ही होता है जब ये नाले कचरे के चलते जाम न दिखार्इ दें। फील्ड विज़िट के दौरान हमने देखा कि कर्इ निवासियों ने अपने घरों से बाहर गुज़रने वाले नालों को ढक दिया है, लेकिन जहां पर ये नाले खुले हैं, वहां इनमें ज़्यादातर कचरा फंसा रहता है।

निवासियों ने बस्ती में काम करने के लिए निर्धारित किए गए सफार्इ कर्मचारियों और बस्ती में वास्तव में सफार्इ के लिए आने वाले कर्मचारियों की संख्या के बारे में अलग-अलग अनुमान जताएं। एक निवासी ने दावा किया कि इंदिरा कल्याण विहार में नगर निगम के 38 कर्मचारी लगाए गए हैं, लेकिन असल में इलाके में अपना काम करने केवल 8 कर्मचारी आते हैं। एक अन्य निवासी ने दावा किया कि 2 सफार्इ कर्मचारी नालों को साफ करने के लिए नियमित तौर पर आते हैं। उसने आगे बताया कि अगर नाले बहुत गंदे होते हैं तो ये कर्मचारी छुट्टियों के दिन भी आते हैं। वहीं दूसरी ओर, नगर निगम के एक कर्मचारी के अनुसार, इलाके के लिए 55 कर्मचारी तय किए गए हैं, लेकिन असल में सिर्फ एक या दो ही काम करते हैं।

निवासियों ने यह भी बताया कि सफार्इ कर्मचारियों की संख्या भले ही कितनी हो, घरों से कचरा उठाने के लिए कोर्इ वाहन नहीं है। लोग प्लास्टिक बैगों से लेकर सब्ज़ी आदि का कचरा घरों के बाहर बने नालों में फेंकते हैं। इससे और ज़्यादा समस्याएं खड़ी होती हैं। निवासियों ने बताया कि स्वीपर नालों से कचरा हटाकर उन्हें नालों के सामने सूखने के लिए इकठ्ठा कर देते हैं, लेकिन सूखने के बाद वे कूड़े को हटाना अक्सर भूल जाते हैं। ऐसी स्थिति में कचरा नालों में वापस गिर जाता है।

निवासी अक्सर अपना कचरा पास में स्थित नगर निगम के ढलाव में डालते हैं, जो कि बस्ती के एक किनारे पर है। इस जगह से नगर निगम का वाहन कचरा इकठ्ठा करता है।

बिजली

साल 2002 में दिल्ली में बिजली वितरण में निजी भागीदारी की शुरुआत हुर्इ और सरकार की बिजली वितरण कंपनी, दिल्ली विद्युत बोर्ड को, तीन हिस्सों में बांट दिया गया। इनमें से प्रत्येक हिस्से के 50 फीसदी नियंत्रण की ज़िम्मेदारी निजी कंपनियों को दे दी गर्इ। इस तरह तीन साझा वितरण कंपनियां बनी (जिन्हें सामान्य तौर पर डिस्कॉम्स कहा जाता है)- टाटा पावर डेल्ही डिस्ट्रीब्यूशन लिमिटेड (टी.पी.डी.डी.एल.), बी.एस.र्इ.एस. राजधानी पावर लिमिटेड (बी.आर.पी.एल.) और बी.एस.र्इ.एस. यमुना पावर लिमिटेड (बी.वार्इ.पी.एल.)। बाकी पचास फीसदी पर अभी जी.एन.सी.टी.डी. का नियंत्रण है। 13

निवासियों ने बताया कि प्रधानमंत्री वी.पी.सिंह के प्रयासों के चलते, इंदिरा कल्याण विहार को सबसे पहले बिजली 1980 के दशक के आखरी सालों में मिली। हर झुग्गी को एक बल्ब और पंखे के लिए बिजली दी गर्इ थी। साल 2001 में निजी ठेकेदारों ने 1 रूपया प्रति यूनिट पर अतिरिक्त बिजली मुहैया करवाया। निवासियों ने हमें बताया कि साल 2007 से बी.एस.र्इ.एस. राजधानी पावर लिमिटेड (बी.आर.पी.एल.) ने बस्ती में बिजली के मीटर लगवा दिए हैं; पहले 200 यूनिट के लिए 3.70 रुपये प्रति यूनिट और उसके बाद 4.80 रुपये प्रति यूनिट की दर से इस बिजली का शुल्क लिया जाता है। मीटर लगवाने का खर्च 3,700 रुपये है जिसमें से 400 रुपये मीटर लगवाते समय लिए जाते हैं और बाकी रुपये मासिक किश्तों के रूप में लिए जाते हैं। हालांकि बिजली बहुत कम जाती है, पर निवासी बिल को लेकर शिकायत करते हैं और कहते हैं कि बिजली के मीटर तेज दौड़ते हैं।

पहचान पत्र

भारत में रह रहे किसी भी व्यक्ति के लिए पहचान पत्रों का होना बहुत आवश्यक है। गैस कनेक्शन और मोबाइल फोन से लेकर सरकार द्वारा दिए जा रहे लाभों को उठाने और अन्य रोजमर्रा के कामों के लिए पहचान पत्र आवश्यक है। अपनी पहचान और अपना पता, दोनों के सत्यापन के लिए पहचान पत्र की आवश्यकता पड़ती है। झुग्गी-झोपड़ी बस्तियों (जे.जे.सी.) जैसे अस्पष्ट भू-स्वामित्व वाली ज़मीनों में अक्सर निवास पहचान पत्र हासिल करना सबसे महत्वपूर्ण और सबसे कठिन होता है। बहुत सारी बुनियादी सुविधाएं इसकी वजह से ही बाधित हो जाती हैं।

निवास प्रमाण के लिए तीन तरह के पहचान पत्र स्वीकार किए जाते हैं-

वोटर पहचान पत्र
अट्ठारह वर्ष से ऊपर का भारत का कोई भी निवासी या अनिवासी नागरिक को वोट डालने और वोटर पहचान पत्र रखने योग्य है।

आधार कार्ड
साल 2007 में भारत सरकार ने सोलह अंकों की पहचान संख्या (यू.आर्इ.डी.) वाले बहुउद्देशीय पहचान कार्ड जारी करने शुरू किए। सैद्धांतिक तौर पर आधार कार्ड को धारक की पहचान साबित करने और उसे सभी सरकारी लाभ और सेवाओं को मुहैया कराने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। हालांकि साल 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया है कि किसी भी सेवा को हासिल करने के लिए आधार कार्ड अनिवार्य शर्त नहीं हो सकता।

राशन कार्ड
सब्सिडी दामों पर सार्वजनिक वितरण प्रणाली के ज़रिए अनाज और अन्य आवश्यक सामान लेने के लिये राशन कार्ड इस्तेमाल होते हैं। अनाज और अन्य आवश्यक सामान फेयर प्राइस दुकानों के नेटवर्क के ज़रिए दिया जाता है। आय के अनुसार लोगों को विभिन्न राशन कार्ड वितरित किए गए हैं।

इंदिरा कल्याण विहार के निवासियों के पास कितने आधार कार्ड हैं, इस बारे में अलग-अलग बातें कही गर्इ हैं( लेकिन ये सामान्य धारणा है कि बस्ती की आधी से ज़्यादा आबादी को आधार कार्ड मिल गए हैं। निवासियों ने बताया कि बस्ती के ज़्यादातर वयस्क नागरिकों के पास वोटर आर्इ.डी. कार्ड (पहचान पत्र) हैं और इन्हें हासिल करना काफी आसान भी है। एक महिला निवासी ने हमें बताया कि जो लोग किरायेदार की तरह बस्ती में रहते हैं, उनके लिए भी नए वोटर पहचान पत्र हासिल करना मुश्किल नहीं है। किरायेदार को वोटर पहचान पत्र के लिए आवेदन के साथ झुग्गी के मालिक का बिजली बिल जमा करना होता है। हालांकि अन्य अनियोजित रिहायशी इलाकों में मकान मालिक किरायेदारों से पहचान और आवास प्रमाण साझा करने में हिचकिचाते हैं, इंदिरा कल्याण विहार में मकान मालिकों में ऐसी कोर्इ हिचकिचाहट नहीं देखी गर्इ।

राशन कार्डों का मामला थोड़ा और उलझा हुआ है। कुछ बस्ती निवासियों ने हमें बताया कि सरकार ने शहर भर में साल 2008 और साल 2013 के बीच झुग्गी-झोपड़ी बस्ती निवासियों को राशन कार्ड जारी करने बंद कर दिए थे। एक महिला ने हमें विस्तार से बताया- “जब हम राशन ऑफिस जाते थे और उनसे यह पूछते थे कि हमारे राशन कार्ड काम क्यों नहीं कर रहे हैं और क्या हम नए राशन कार्डों के लिए आवेदन कर सकते हैं, तो वे हमें बताते थे कि झुग्गी निवासियों के राशन कार्डों ने काम करना बंद कर दिया है और नए राशन कार्ड नहीं बनाए जा रहे हैं। वे हमें इसके पीछे की कोर्इ वजह नहीं बताते थे।” एक दूसरी महिला ने बताया- “बस कहते हैं कि झुग्गियों का राशन कार्ड बंद पड़ा हुआ है और नया नहीं बन रहा।”14 हम इन बातों की पुष्टि करने में कामयाब नहीं हो सके, लेकिन ज़्यादातर निवासियों ने यह बात बतार्इ।

तीसरे तरह के नए राशन कार्ड भी हैं- अन्त्योदय अन्न योजना जिनका मकसद निर्धनतम लोगों को राशन देना हैं। निवासियों ने अनुमान जताया कि इलाके के लगभग 10 फीसदी घरों के पास अन्त्योदय अन्न योजना कार्ड है। बातचीत करने वाले कुछ लोगों ने बताया कि ये कार्ड बी.पी.एल. और ए.पी.एल. कार्डों की तरह नहीं हैं, इनसे खाने का राशन बहुत प्रभावी ढंग से मिल जाता है। हालांकि कुछ निवासियों ने आरोप लगाया कि ये कार्ड उन्हीं को दिए जाते हैं जो विधायक के करीबी हैं, अक्सर ये कार्ड उन अमीर निवासियों को भी दे दिए जाते हैं, जिन्हें इनकी आवश्यकता नहीं होती है।

सार्वजनिक सुविधाएं

इंदिरा कल्याण विहार में कोर्इ सामुदायिक केंद्र नहीं है। कर्इ खुली जगहें जैसे सालों से बंद पड़ा एक सामुदायिक शौचालय कॉम्प्लेक्स और मंदिर अनौपचारिक रूप से मिलने-जुलने के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं।

निवासी बताते हैं कि बस्ती में किसी सरकारी अस्पताल और डिस्पेंसरी का नहीं होना एक मुख्य समस्या है, हालांकि कभी-कभार बस्ती में मोबाइल हेल्थ कैम्प लगाए जाते हैं।

नागरिकता का नेगोसिएशन

रहन-सहन की बेहद खराब स्थितियां इंदिरा कल्याण विहार की पहचान हैं। एक बड़े खुले नाले के चारों ओर बसी हुर्इ घनी आबादी के चलते अनियोजित रिहायशी इलाकों की सभी चुनौतियां इस कॉलोनी में अधिक जटिल हो जाती हैं। यह एक ऐसा समुदाय भी है जो कि राजनीतिक तौर पर बंटा हुआ है। यह राजनीतिक बंटवारा सुधार कार्यों को दो स्तरों पर बाधित करता है; पहला, यह समुदाय को आंतरिक तौर पर संगठित होने से रोकता है, और दूसरा, निर्वाचित प्रतिनिधियों को कोर्इ कदम उठाने से। हालांकि राजनीतिक फायदों के लिए सेवाएं देने की इस होड़ से सभी को बेहतर सार्वजनिक सुविधाएं मिल सकती हैं, पर इंदिरा कल्याण विहार में ठोस रूप से बहुत कम सुधार हुआ है।

इंदिरा कल्याण विहार के निवासियों में राजनीतिक बंटवारे के काफी साक्ष्य मिलते हैं। निवासियों के साथ हमारी बहुत सी चर्चाओं में स्थानीय राजनेताओं के बारे में खुले और कर्इ बार तीखे मतभेद दिखार्इ दिए। एक घटनाक्रम इस तरह है: निगम पार्षद (जो बहुजन समाज पार्टी का सदस्य है) से नज़दीकी रिश्ता रखने वाले दो व्यक्तियों से बातचीत के दौरान एक पुलिस अधिकारी ने आकर पूछा कि यहां क्या हो रहा है। कुछ मिनटों के बाद जब वहां एक सफेद स्कार्पियो कार आर्इ, तो दोनों व्यक्तियों और पुलिस अधिकारी ने यह कहते हुए हमसे माफी मांगी कि उन्हें एक मीटिंग में जाना है। तब तक वहां भीड़ जमा हो चुकी थी और कार के जाने के बाद एक महिला ने हमें पास आकर बताया कि जिन लोगों से हम बात कर रहे थे, वे पूरे समुदाय के हित के लिए कोर्इ काम नहीं करते हैं, लेकिन पार्षद से नज़दीकी के चलते वे काफी प्रभावशाली हैं। उसने हमें सचेत किया कि यदि हमने अपने शोध में केवल उनकी बातों को शामिल किया, तो हम अधिकांश समुदाय को समझ ही नहीं सकेंगे। महिला ने उन व्यक्तियों को ‘दल्ले’ (दलाल) कहा। महिला ने बताया कि चुनाव के दौरान राजनेता कुछ वोटरों के लिए उन्हें दलाल के रूप में ठेके पर लेते हैं। ‘दल्ले’ को राजनेताओं से पैसे मिलते हैं और इन पैसों का इस्तेमाल वे लोगों के बीच वोट के बदले शराब और पैसा बाटने में करते हैं; इसका कुछ हिस्सा उनकी जेब में भी जाता है। जो उनका साथ देते हैं, उन्हें तमाम जन सुविधाओं का लाभ मिलता है (राशन कार्ड वाला हिस्सा देखें)। महिला ने दावा किया कि इस राजनीतिक लेन-देन के चलते, सभी जन सुविधाओं का लाभ विधायक के समर्थकों को मिलता है और उन तक नहीं पहुंच पाता जिन्हें वास्तव में इन सुविधाओं की ज़रुरत होती है।

बाद में एक फील्ड विज़िट के दौरान, जब कुछ निवासियों से (जो कि विधायक के समर्थक हैं) हमारी बातचीत हो रही थी, तो उसी महिला ने फिर हमें रोका और गुस्से में कहा कि हम उन लोगों (विधायक और उसके समर्थकों) की बातों को न सुने और उनके द्वारा बतार्इ गर्इ बातें गलत हैं। बाद में जब हम उस महिला का इंटरव्यू ले रहे थे तो एक पुरुष निवासी ने हमें चेताया कि महिला द्वारा विधायक की खुली आलोचना खतरनाक हो सकती है, और कहा कि विधायक और उसके समर्थक महिला को नुकसान पहुंचा सकते हैं। उसने हमें आगे बताया कि- “यहां की राजनीति इतनी गंदी है कि इसके चलते खून-खराबा भी हो चुका है।”

दिसंबर 2013 में दिल्ली में हुए चुनाव के दौरान हमने पाया कि ये महिला कांग्रेस पार्टी की कार्यकर्ता थी। हालांकि जो शिकायतें महिला ने कीं, वे शिकायतें बाकी निवासियों ने भी हमसे कीं। सभी निवासी बरसों से सरकार द्वारा की जा रही अनदेखी और उपेक्षा से निराश थे। निवासी मानते हैं कि चुनावी प्रक्रिया में हिस्सेदारी के बदले उन्हें बेहतर सरकारी सुविधाएं मिलनी चाहिए। एक व्यक्ति ने हमें बताया- “हम लोग 10-15 साल से वोट दे रहे हैं और सरकार हमारे लिए क्या कर रही है?”; एक दूसरे व्यक्ति ने हमें बताया- “अगर कोर्इ किसी जगह पर 30 वर्षों से रह रहा है, तो उसे बिजली और पानी जैसी बुनियादी सुविधाएं तो मिलनी चाहिए।”

झुग्गी-झोपड़ी बस्तियों में अपर्याप्त शौचालयों की समस्या दशकों पुरानी है। इंदिरा कल्याण विहार में हुर्इ तकरीबन हर बातचीत में इसका ज़िक्र किया गया है। यह उस राजनीतिक मतभेद का सीधा उदाहरण है जो सुविधाओं को लोगों तक पहुंचने से रोकता रहता है। निर्वाचित जनप्रतिनिधि तीस सालों से भी अधिक समय तक सामुदायिक शौचालयों और बाकी साफ-सफार्इ सुविधाओं की योजनाओं को लागू करवा पाने में असफल रहे हैं। सरकार में विभिन्न स्तरों पर अधिकारी और निवासी इन असफलताओं के बहुत से कारण साझा करते हैं। निगम पार्षद जो बहुजन समाज पार्टी का सदस्य है और जिसके कार्यक्षेत्र में साफ-सफार्इ का काम आता है, इसके लिए क्षेत्र के विधायक को दोषी ठहराता है। विधायक भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का सदस्य है। पार्षद ने हमें बताया कि वह शौचालय बनवाने के लिए काफी सक्रिय रहा है, लेकिन काम पूरा हो जाने में विधायक की कोर्इ दिलचस्पी नहीं रही है और इसके रास्ते में हमेशा राजनीति आ जाती है। पार्षद ने आगे यह भी दावा किया कि उसने पिछले साल बस्ती का नाला साफ करवाया था लेकिन यह काम बार-बार नहीं हो सका क्योंकि इसके लिए नाले पर से बने हुए पुलों को तोड़ना पड़ता। बस्ती के एक किनारे पर रह रहे निवासियों ने हमें बताया कि निगम पार्षद अक्सर बस्ती में आता है। उन्होंने बताया कि एक बार पार्षद ने सबके सामने एक सफार्इ कर्मचारी को डांटा था। हालांकि निवासियों ने पार्षद को कोर्इ ढांचागत सुधार लागू करवाते नहीं देखा। बातचीत के दौरान पार्षद के समर्थक एक स्वर में पार्षद की बात का ही समर्थन करते हैं और दावा करते हैं कि इस रिहायशी इलाके में विधायक वास्तविक विकास कार्यों को बाधित करता है।

विधायक के प्रति बस्ती के निवासियों का नज़रिया अलग-अलग तरह का है। बहुत से निवासी सेवाओं में सुधार के लिए विधायक को श्रेय देते हैं और बताते हैं कि अपेक्षाकृत रूप से पानी की सही आपूर्ति विधायक की कोशिशों का ही नतीजा है। बाकी निवासी अपनी असहमति जताते हुए विधायक पर भ्रष्टाचार और काम को रोकने का आरोप लगाते हैं – “जब से एम.एल.ए. बना है, काम नहीं हुआ है…ये सब खा लिए है।”

जब भी कोर्इ विकास कार्य पूरा होता है, पार्षद और विधायक में उसका श्रेय लेने की होड़ मच जाती है। इंदिरा कल्याण विहार में एक फील्ड विज़िट के दौरान हमने देखा कि विधायक ने बस्ती में अंदरुनी गलियों के निर्माण जैसे प्रोजेक्टों की ज़िम्मेदारी लेने का दावा करते हुए कर्इ सारे बोर्ड लगा रखे थे। इनमें से एक बोर्ड पर लिखा था- “इंदिरा कल्याण विहार साइड… की गलियों में सीमेंट, कंक्रीट तथा नालियों का कार्य माननीय विधायक… के अथक प्रयासों से कराया जा रहा है।” निगम पार्षद ने हमें बताया कि “सच तो ये है कि अगर विधायक किसी इलाके में चार र्इंटें भी लगवाता है, तो वह इलाके में बोर्ड लगवा देता है, जिस पर यह लिखा होता है कि उसने इस काम के लिए पैसे दिए हैं।” पार्षद ने यह कहते हुए अपना बचाव किया- “मैं वहीं काम करता हूँ, जिसे करने की आवश्यकता होती है। मैं अलग-अलग जगहों पर (जहां मैंने काम करवाया है) ऐसे बोर्ड नहीं लगवाता।”

लगातार बने रहने वाले इस तनाव के चलते इंदिरा कल्याण विहार के निवासियों को ऐसा लगता हैं कि उनके निर्वाचित प्रतिनिधि उनका प्रतिनिधित्व नहीं कर रहे हैं। हालांकि वे जानते हैं कि उनका रिहायशी इलाका अवैध है, इसके बावजूद उन्हें अन्य झुग्गी-झोपड़ी बस्तियों की तरह लगातार घर ढहाये जाने जैसे खतरे महसूस नहीं होते। एक व्यक्ति ने हमें बताया- “कभी-कभी पुलिस कहती है कि झुग्गियों को तोड़ देंगे पर कुछ नहीं होता।” कुछ निवासी इस बात को एक अलग प्रकार की आश्वस्ति से जोड़ते हैं, जो कि चुनावी मुद्दों से नहीं, बल्कि मज़दूरी से सम्बंधित है। एक स्थानीय गैर सरकारी संगठन द्वारा आयोजित सार्वजनिक सभा में बस्ती के एक निवासी ने ज़ोर देकर बताया- “उद्योगपति बस्ती के पुनर्वास के पक्ष में नहीं हैं क्योंकि अगर हम यहां नहीं होंगे तो उन्हें खुद नहीं मालूम कि उनकी फैक्ट्रियों में काम करने के लिए सस्ते मज़दूर कहां से मिलेंगे।”

चुनाव

साल 2013 के विधान सभा चुनाव ने हमें यह समझने का अवसर दिया कि इंदिरा कल्याण विहार के निवासियों के लिए प्रमुख चुनावी मुद्दे क्या हैं। इस दौरान हमें बस्ती में विभिन्न राजनीतिक दलों और उनके प्रतिनिधियों द्वारा अपनार्इ जा रही रणनीतियों और प्रचार के तरीकों को भी दर्ज करने का अवसर मिला। नीचे दिए गए विवरण और रिपोटिर्ंग 24 अक्टूबर से 24 दिसंबर 2013 के बीच इंदिरा कल्याण विहार में सात रिसर्चरों द्वारा किए गए छह दौरों पर आधारित है; साथ-साथ तुगलकाबाद विधान सभा क्षेत्र में आप, भाजपा, कांग्रेस, और बसपा के स्थानीय कार्यलयों में पार्टी कार्यकर्ताओं से हुर्इ बातचीत को भी विवरण का आधार बनाया गया है।

इंदिरा कल्याण विहार में बड़ी आबादी और निवासियों के कुछ राजनीतिक पार्टियों के प्रति ज़बरदस्त वफादारी के चलते चुनाव के समय वोटों की खरीददारी निजी और सामुदायिक स्तर पर व्यापक है। निवासियों ने हमें बताया कि चुनाव से पहले भारी मात्रा में पैसा और शराब बांटे जाते है। एक नौजवान ने हमें बताया कि उसे पिछले चुनाव में एक पार्टी से 500 रुपये मिले थे; बाकी निवासी भी इस बात की पुष्टि करते हैं और बताते हैं कि सभी पार्टियां चुनाव से एक या दो दिन पहले बस्ती में आती हैं और शराब व पैसा बांटती हैं। एक व्यक्ति की कीमत इस बात से तय होती है कि समुदाय में उसकी हैसियत कैसी है और उसके नियंत्रण में कितने वोट हैं।

लोगों को मिलने वाले इन उपहारों की झलक इलाके के स्तर पर दिखार्इ पड़ती है – झुग्गी-झोपड़ी बस्तियों में शौचालयों और साफ-सफार्इ के काम को लेकर जो उदासीनता और निष्क्रियता बनी हुर्इ थी, उसमें साल 2013 का विधान सभा चुनाव आते ही ब्रेक लग गया। सालों की रुकावट के बाद, अक्टूबर और नवम्बर में बस्ती के दो अलग-अलग हिस्सों में सामुदायिक शौचालयों का निर्माण शुरू हो गया। निवासियों ने बताया कि उनके विधायक (जो भाजपा का सदस्य है) और नगर निगम अधिकारियों ने 18 सितम्बर को सामुदायिक शौचालयों की आधारशिला रखी और अगले दिन से उनका निर्माण कार्य शुरू हुआ।

इंदिरा कल्याण विहार के कुछ निवासियों ने इन उपहारों और सुविधाओं की बेहतरी को सीधे तौर पर अपने वोट के लेन-देन के रूप में स्वीकार किया। एक निवासी के शब्दों में, “वोटर मतदान से पहले ही बिक जाते हैं और वे पैसों के आधार पर वोट करते हैं।” दूसरे ने कहा- “जिसने पिलार्इ व्हिस्की, वोट है उसकी।” वहीं दूसरी तरफ कुछ निवासियों ने बताया कि इस तरह मिलने वाले पैसों का कोर्इ ठोस असर नहीं पड़ता है। वोटर किसी खास पार्टी को समर्थन देने के नाम पर कर्इ पार्टियों से पैसे लेते हैं। एक नौजवान ने कहा- “हम पैसे और बाकी चीजें लेने से मना क्यों करें… हम हर वो चीज लेते हैं जो बंटती है…लेकिन हम वोट उसी उम्मीदवार को देते हैं जो हमें लगता हैं कि हमारे लिए अच्छा होगा।” बस्ती में निवासियों के एक छोटे समूह ने हमें एक ऐसी स्तिथि का विवरण किया, जो कि राजनीतिक तौर पर बंटी हुर्इ बस्ती के सामान्य विवरण से काफी अलग है। उन्होंने बताया कि वे आपस में चर्चा कर यह तय करते हैं कि कौन सा उम्मीदवार उनके हित में काम करेगा और उसके बाद वे एक सामूहिक निर्णय पर पहुंचते हैं, ताकि उनके वोट बेकार नहीं जाए। यह सिर्फ एक उदाहरण है, लेकिन इससे निवासियों के चुनाव के प्रति एक नपे-तुले नज़रिये और रणनीति की झलक मिलती है; हालांकि निवासी चुनाव से पहले किसी भी पार्टी की ओर से दिए जाने वाले उपहार आदि स्वीकार कर लेते हैं, वे अपना वोट स्वतंत्र रूप से और साझा हित के आधार पर देते हैं।

साल 2013 विधान सभा चुनाव में आम आदमी पार्टी राजनीतिक तौर पर शुरुआत ही कर रही थी, पर इसके बावजूद उम्मीद थी कि बेहतर सुविधाएं मुहैया कराने के उनके वादे इंदिरा कल्याण विहार और बाकी झुग्गी-झोपड़ी बस्तियों में लोकप्रिय होंगे। इंदिरा कल्याण विहार के निवासियों ने हमें बताया कि बहुत से वोटरों ने आम आदमी पार्टी का समर्थन किया, लेकिन वे बाकी उम्मीदवारों से डरे हुए थे इसलिए उन्होंने चुपचाप रहकर अपना समर्थन जताया। बस्ती में आप के एक कार्यकर्ता ने हमें बताया – “वे दिल से हमारे साथ हैं और वे हमें ही वोट देंगे।” कुछ आप कार्यकर्ताओं ने दावा किया कि मौजूदा विधायक ने उन निवासियों को धमकाया जो कि बाकी पार्टियों को समर्थन देने की बात सोच रहे थे।

आप पहली पार्टी थी जिसने इलाके में खुले तौर पर अपना प्रचार करना शुरू किया, तकरीबन चुनाव के एक महीने से भी पहले से। पार्टी ने लोगों के घर-घर जाकर अपना प्रचार किया और अपने नज़रिये और मुख्य वादों के बारे में लोगों से चर्चा की। इसके अलावा शाम को और रात में प्रचार की गतिविधयां चलीं। कुछ निवासियों ने इन गतिविधियों को ‘गुप्त’ गतिविधियां भी कहा। जब चुनाव में केवल दो हफ्ते बच गए तब जाकर दिन में भी प्रचार कार्य होने लगे; कांग्रेस, बसपा और भाजपा ने सार्वजनिक तौर पर प्रचार करना शुरू कर दिया। ये प्रचार मुख्य रूप से पदयात्राओं (पैदल यात्राएं जिनमें नारे लगाते हुए और पर्चे बांटते हुए प्रचार किया जाता है) के रूप में थे। बसपा एक मात्र पार्टी थी जिसने इंदिरा कल्याण विहार के निवासियों के साथ जनसभा की।

इंदिरा कल्याण विहार बस्ती तुगलकाबाद विधान सभा क्षेत्र का हिस्सा है। तुगलकाबाद विधान सभा सीट भारतीय जनता पार्टी ने लगभग 39 फीसदी वोटों के साथ जीती। दूसरे स्थान पर 32 फीसदी से कुछ अधिक वोटों के साथ बसपा रही, जबकि आम आदमी पार्टी को सिर्फ 14.29 फीसदी वोट मिले। जिन पोलिंग बूथों पर इंदिरा कल्याण विहार के निवासियों ने वोट डाला, उनका एक विश्लेषण बताता है कि कुल मतदाताओं में से 28 फीसदी ने भाजपा को वोट किया, जो कि विधान सभा क्षेत्र में भाजपा को मिले कुल वोट प्रतिशत 39 से काफी कम है। 45 फीसदी से कुछ अधिक लोगों ने बसपा को वोट दिया और 16 फीसदी से कुछ अधिक लोगों ने आम आदमी पार्टी को वोट दिया; केवल 7.25 फीसदी लोगों ने कांग्रेस को वोट दिया।

निष्कर्ष

इंदिरा कल्याण विहार दिल्ली की सबसे बड़ी, पुरानी और घनी आबादी वाली झुग्गी-झोपड़ी बस्तियों में से एक है, लेकिन सरकारी सुविधाओं तक पहुंच के मामले में इसकी हालत शहर के छोटे और नए बसे हुए रिहायशी इलाकों जैसी है। अपने फील्डवर्क के दौरान हमने पाया कि पूरा समुदाय अंदरूनी रूप से असंगठित, राजनीतिक तौर पर बिखरा हुआ और अधिकारहीन है। जहां बहुत सी झुग्गी-झोपड़ी बस्तियों को प्रधान के प्रतिनिधित्व के रूप में जो एकजुट आवाज़ हासिल है; वहीं इंदिरा कल्याण विहार में ऐसी आवाज़ की अनुपस्थिति में लोगों को अपनी चिंताएं व्यक्त करने का कोर्इ रास्ता हासिल नहीं है। सभी राजनीतिक पार्टियों के प्रतिनिधि अपने चुनावी वादों को पूरा किए बगैर बिचौलियों और पार्टी कार्यकर्ताओं का इस्तेमाल वोट हासिल करने के लिए करते हैं। इससे समुदाय में राजनीतिक बिखराव तथा रहन-सहन की खराब स्थितियां और गहरा जाती हैं। हालांकि निर्वाचित प्रतिनिधियों के बीच सुविधाओं में होने वाले थोड़े से भी सुधार का श्रेय लेने की होड़ मच जाती है, पूरे बस्ती में सुविधाओं के स्तर में कोर्इ बड़ा सुधार दिखार्इ नहीं पड़ता।

इंदिरा कल्याण विहार के निवासी रोज़ दर रोज़ घर ढहाये जाने के डर के बीच जीवनयापन नहीं करते और न ही उन्हें बाकी झुग्गी-झोपड़ी निवासियों की तरह अपने आवासों को कायम रखने के लिए जूझना पड़ता हैं। इसके बावजूद उनकी कहानी दिल्ली के बाकी अनौपचारिक रिहायशी इलाकों के समान, राज्य और राज्य द्वारा मुहैया करार्इ गर्इ सेवाओं से गहरी दूरी की मौजूदगी बयान करती है।